इल्तुतमिश का इतिहास | Iltutmish History In Hindi

Iltutmish History In Hindi : इस लेख  में  हम  इल्तुतमिश का इतिहास जीवनी हिस्ट्री  बायोग्राफी  फैक्ट्स  के  बारे  में विस्तार से जानेगे.मिनहाज ए सिराज के अनुसार इल्तुतमिश इलबारी सरदार आलमखां का लड़का था.  बचपन से  इल्तुतमिश अत्यधिक सुंदर और होनहार था. और उसका पिता अपने अन्य पुत्रों की अपेक्षा उसे अधिक प्यार करता था. इससे कुपित होकर उसके भाइयों ने बालक इल्तुतमिश को घोड़ो के एक व्यापारी को बेच दिया. घोड़ों के व्यापारी ने इल्तुतमिश को प्रधान काजी को बेच दिया. काजी के पुत्रों ने उसे एक दास व्यापारी जमालुद्दीन को बेच दिया.  अंत में गोरी के कृपा पात्र ऐबक  ने इल्तुतमिश  को खरीद लिया.

इल्तुतमिश का इतिहास

Iltutmish History In Hindi इल्तुतमिश

Iltutmish History In Hindi

achievements & Life history of Iltutmish in Hindi:  इल्तुतमिश ने अपनी योग्यता, पराक्रम और स्वामी भक्ति से ऐबक का विश्वास प्राप्त कर लिया और धीरे धीरे उन्नति की ओर बढनेलगा. प्रारम्भ में उसे सर जानदार पद पर नियुक्त किया गया. इसके बाद अमीर ए शिकार बनाया गया. 1205 ई में जब गोरी ने पंजाब के खोखरों के विरुद्ध अभियान किया था. उसमें इल्तुतमिश ने असाधारण पराक्रम का परिचय दिया. जिससे प्रसन्न होकर गोरी ने ऐबक को उसके साथ अच्छा व्यवहार करने तथा दासता के बंधन से मुक्त करने को कहा.

जब ऐबक ने ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया तो इल्तुतमिश को वहां का दुर्गरक्षक नियुक्त किया गया. कुछ दिनों बाद ऐबक ने अपनी पुत्री का विवाह इल्तुतमिश के साथ कर दिया और बाद में उसे बदायूँ का हाकिम नियुक्त किया गया. इस पद पर रहते हुए उसने गहड्वाल राजपूतों का दमन किया और अपनी रण निपुणता के लिए ख्याति अर्जित की.

ऐबक की मृत्यु के बाद जब लाहौर के अमीरों ने आरामशाह को सुल्तान बना दिया तो दिल्ली के तुर्क अमीरों ने अली इस्माइल के माध्यम से इल्तुतमिश को दिल्ली आकर सुल्तान बनने के लिए आमंत्रित किया. तदनुसार इल्तुतमिश बन गया और आराम शाह को परास्त करके अपने सुल्तान पद को सुद्रढ़ बना दिया.

इल्तुतमिश की कठिनाईयाँ (history of sultan altamash in urdu Hindi)

इल्तुतमिश सुल्तान तो बन गया परन्तु उसके सामने अनेक कठिनाईयाँ तथा समस्याएं आ खड़ी हुई. उनमें से मुख्य इस प्रकार थी.

तुर्क अमीरों की समस्या– ऐबक को भारत में नवस्थापित तुर्क राज्य कोसंगठित करने का समय नहीं मिल पाया था. अत उसकी मृत्यु के बाद विभिन्न क्षेत्रों में नियुक्त तुर्क अमीर दिल्ली के सिंहासन को हथियाने अथवा अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने की उधेड़बुन में लगे हुए थे. बहुत से तुर्क सरदार जो गोरी एवं ऐबक के समय में इल्तुतमिश से कहीं अधिक महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त थे. इल्तुतमिश को सुल्तान बना देने से असंतुष्ट थे.

और वे किसी राजवंशीय सरदार को दिल्ली के सिंहासन पर बैठाना चाहते थे. इन तुर्क सरदारों की मांग भी थी. कि प्रशासन के सभी महत्वपूर्ण पदों पर केवल तुर्क सरदारों को ही नियुक्त किया जाए और भारतीय मुसलमानों को ऊँचे पद नहीं दिए जाए. सिंध और मुल्तान के सूबेदार कुबाचा ने ऐबक की मृत्यु के बाद अपने आपकों स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया और भटिंडा, सुरसती, कुहराम, लाहौर आदि क्षेत्रों पर अधिकार जमा दिया था.

वह अपने आपकों ऐबक का उत्तराधिकारी समझता था. गजनी ने ताजुद्दीन यल्दौज ने भारतीय प्रदेशों पर पुनः गजनी का दावा प्रस्तुत किया और इल्तुतमिश को अपना सूबेदार मानते हुए उसके लिए राजकीय चिह्न भिजवा दिए. परिस्थतियों की विवशता देखते हुए उस समय इल्तुतमिश को अपमान सहन कर उनके चिह्नों को स्वीकार करना पड़ा.

ऐबक की मृत्यु के बाद बंगाल के अलीमर्दान ने भी अपने आपकों स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया और उसने सुल्तान अलाउद्दीन की उपाधि धारण की. बिहार के खलजी सरदार मलिक ने भी अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी. इस प्रकार इल्तुतमिश की सबसे मुख्य कठिनाई इन तुर्क सरदारों को परास्त करके उन्हें दिल्ली शासन के अंतर्गत लाना हैं.

सेना का विश्वास प्राप्त करना– दूसरी समस्या तुर्क सेना का विश्वास प्राप्त करना था. यह संयोग की बात हैं कि दिल्ली मे तैनात तुर्क सेना जिस सेनानायक अली इस्माइल ने इल्तुतमिश को आमंत्रित किया था. वह अब इल्तुतमिश का विरोधी बन गया था और तुर्क सेना अभी भी उसके नियंत्रण में थी.

हिन्दू सरदारों की समस्या– ऐबक के शासनकाल में बहुत से हिन्दू सरदारों ने दिल्ली की अधीनता मानकर वार्षिक कर चुकाने का वचन दिया था. परन्तु ऐबक की मृत्यु के बाद उनमें से बहुत से सरदार विरोधी हो गये और कर भेजना बंद कर दिया. कई क्षेत्रों के सरदारों ने संगठित होकर अपने अपने क्षेत्रों से तुर्क अधिकारियों को खदेड़ दिया. जालौर, रणथम्भौर, ग्वालियर आदि क्षेत्र दिल्ली से स्वतंत्र हो गये. उनकी स्वतंत्रता दिल्ली के तुर्क राज्य के लिए गंभीर संकट थी. दोआब क्षेत्र में भी तुर्क शासन लड़ खड़ाने लगा था.

उत्तर पश्चिमी सीमा की समस्या–  इल्तुतमिश के सामने उत्तर  पश्चिमी  सीमा की सुरक्षा भी एक गंभीर  चुनौती थी.   मध्य एशिया की राजनीति में मंगोलों के प्रवेश से भारी उथल पुथल मची हुई थी.मंगोलों ने ख्वारिज्म के शाह को परास्त कर दिया था. ख्वारिज्म का राजकुमार जलालुद्दीन भागकर सिन्धु तट पर आ पंहुचा और मंगोल नेता चंगेज खां उसका पीछा करताहुआ किसी भी समय भारत में प्रवेश कर सकता था.मंगोलों के संभावित आक्रमण से दिल्ली सल्तनत को बचाने की समस्या इल्तुतमिश के लिए अग्नि परीक्षा के समान थी.

खोखरों की समस्या– झेलम और सिंध के मध्य में आबाद लड़ाकू खोखरों की प्रारम्भ से ही शत्रुता चली आ रही थी. खोखरों की शत्रुता के कारण उत्तर पश्चिमी सीमा की सुरक्षा असुरक्षित प्रतीत हो रही थी. क्योंकि ख्वारिज्म के शाह ने खोखरों से मैत्री करके दिल्ले के अधीन वाले क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया था.

दुर्बल राज्याधिकार– इल्तुतमिशएक दास का दास था. अतः विशुद्ध तुर्क सरदारों की दृष्टि में उसका साम्राज्य पर अधिकार अनु चित बात थी और उसको सुल्तान मानने को तैयार नहीं थे. इस्लामी कानून के हिसाब से भी इल्तुतमिश की स्थिति कमजोर थी. और धार्मिक नेताओं का व्यवहार भी उसके पक्ष में नहीं था. अतः इल्तुतमिश के लिए अपने राज्याधिकार को सुद्रढ़ बनाना अति आवश्यक कार्य था.

इस प्रकार इल्तुतमिश के लिए दिल्ली सिंहासन फूलों की सेज सिद्ध नहीं हुआ. उसके सामने कठिनाइयों का अम्बार था. दिल्ली सल्तनत की नीव भी सुद्रढ़ और स्थायी नहीं हो पाई थी. परन्तु अवसर के अनुकूल सिद्ध हुआ और अपनी योग्यता, पराक्रम और कूटनीति से समस्याओं पर विजय पाने में सफल रहा.

इल्तुतमिश की समस्याओं का समाधान (iltutmish history in urdu)

विरोधी तुर्क अमीरों का दमन– इल्तुतमिश ने आरामशाह पर निर्णायक विजय प्राप्त की थी. फिर भी बहुत से विरोधी तुर्क अमीरों ने उसे सुल्तान मानने से इंकार कर दिया और उन्होंने दिल्ली के समीप अपने सैनिक दस्ते एकत्रित कर दिए. इल्तुतमिश ने इन सरदारों पर अचानक आक्रमण करके उनकी शक्ति को छिन्न भिन्न कर दिया. अधिकांश विरोधियो को मौत के घाट उतार दिया. जो बच गये उन्होंने इल्तुतमिश की अधीनता स्वीकार कर ली. इसके बाद इल्तुतमिश ने बदायूँ, अवध, वाराणसी तथा तराई के क्षेत्रों में स्थित तुर्क और हिन्दू सरदारों का दमन करके उन्हे अपनी अधीनता मानने के लिए विवश किया.

चालीसा मंडल का गठन–  तुर्क अमीरों के भावी विद्रोह को रोकने तथा अपनी स्थिति को सुद्रढ़ बनाने की दृष्टि से इल्तुतमिश ने बड़ी कूटनीति से काम लिया. अपने प्रति निष्ठावान दासों का एक नया दल संगठित किया. चूँकि इसमें चालीस लोग सम्मिलित किये गये थे. इसलिए इसे चरगान अथवा चालीस दास अमीरों का दल कहा जाने लगा. इन लोगों को प्रशासन के मुख्य पदों पर नियुक्त किया गया. चूँकि दल के सदस्यों की उन्नति इल्तुतमिश की कृपा पर निर्भर थी, अतः वे लोग हमेशा उसके प्रति निष्ठा वान बने रहे.

यल्दौज का दमनजब इल्तुतमिश सुल्तान बना ही था तब गजनी के शासक ताजुद्दीन यल्दौज ने इसे गजनी राज्य के अंतर्गत भारतीय प्रदेशों का शासक मानते हुए उसके लिए राजकीय चिह्न भिजवाएं थे. चूँकि उस समय इल्तुतमिश यल्दौज से शत्रुता मोल लेने की स्थिति में नहीं था, अतः उसने राजकीय चिह्न स्वीकार कर लिए थे. परन्तु अपमान का प्रतिशोध लेने की ताक में रहा. उधर यल्दौज ने कुबाचा पर आक्रमण करके लाहौर तथा पंजाब के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार जमा लिया. इल्तुतमिश ने इस अवसर पर तटस्थता की नीति अपनाई और अवसर पाकर सुरसती, कुहराम और भटिंडा पर अपना अधिकार जमा लिया.

1215 ई में ख्वारिज्म के शाह ने यल्दौज को परास्त करके गजनी से खदेड़ दिया. यल्दौज लाहौर भाग आया और उसने थानेश्वर तक पंजाब पर अधिकार जमा लिया. उसका इरादा दिल्ली पर आक्रमण करने का था. अतः इल्तुतमिश ने आगे बढ़कर उसका सामना करने का निश्चय किया. तराइन के ऐतिहासिक मैदान पर दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ जिसमें यल्दौज पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया. कुछ दिनों बाद यल्दौज का वध कर दिया गया. इस विजय से इल्तुतमिश को दोहरा लाभ हुआ. एक, उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वन्द्वी और सिहांसन का दावेदार समाप्त हो गया. दूसरा, भारत में मुस्लिम राज्य गजनी के प्रभुत्व से हमेशा के लिए मुक्त हो गया.

कुबाचा का दमन– नसीरुद्दीन कुबाचा गोरी का एक दास था. ऐबक की भांति उसने भीअपने स्वामी की सेवा की और गोरी ने उसे तुच्छ सूबेदार नियुक्त किया था. कुबाचा ने अपनी योग्यता तथा पराक्रम से मुल्तान, सिबिस्तान तथा समस्त सिंध प्रदेश पर अपना अधिकार जमा लिया था. उसने सुल्तान ऐबक की दो पुत्रियों से विवाह किया और ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली थी. ऐबक की मृत्यु के बाद उसने अपने आपकों स्वतंत्र घोषित करके राजचिह्न प्राप्त कर लिया. इल्तुतमिश के लिए वह प्रबल प्रतिद्वन्द्वी था. गजनी के शासक यल्दौज ने उससे लाहौर छीन लिया. परन्तु जब यल्दौज इल्तुतमिश के हाथों पराजित हो गया तो स्थिति का लाभ उठाकर कुबाचा ने लाहौर पर पुनः अधिकार जमा लिया.

1217 ई में इल्तुतमिश ने कुबाचा पर आक्रमण करके उससे लाहौर छीन लिया. पराजित कुबाचा ने उस समय इल्तुतमिश की अधीनता स्वीकार कर ली थी और वार्षिक कर चुकाने का वचन दिया. फिर भी कुबाचा एक स्वतंत्र शासक की भांति व्यवहार करता रहा और इल्तुतमिश को भी उससे भय बना रहा. इस बीच चंगेज खान से पराजित होकर ख्वारिज्म का जलालुद्दीन मंगबरनी भाग कर पंजाब आ पंहुचा. उसने कुबाचा के राज्य में लूटमार करके भारी क्षति पहुचाई.

उधर मंगोलों ने मुल्तान में लूटमार करके उसको क्षति पहुचाई. जलालुद्दीन और मंगोलों की वापसी के बाद इल्तुतमिश ने कुबाचा की कमजोर स्थिति का लाभ उठाते हुए एक और उच्च और मुल्तान पर आक्रमण कर दिया. कुबाचा निराश हो गया, उसने भागकर सिंध के दुर्ग में आश्रय लिया. उच्छ और मुल्तान पर इल्तुतमिश का अधिकार हो गया. इसके बाद सेनानायक जुनैदी को भक्कर का घेरा डालने का काम सौपा गया. दो मास की घेराबंदी ने कुबाचा की स्थिति को दयनीय बना दिया.

उसने संधि की याचना की परन्तु इल्तुतमिश ने बिना शर्त आत्मसमर्पण करने को कहा. इससे कुबाचा को संदेह उत्पन्न हो गया और वह एक नाव में बैठकर भाग निकला. परन्तु उसकी नाव डुबो दी गई और कुबाचा का अंत हो गया. इस प्रकार इल्तुतमिश को अपने दूसरे प्रतिद्वंदी से छुटकारा मिल गया और सिंध उच्छ, मुल्तान तथा पंजाब जैसे विस्तृत क्षेत्र पर उसका अधिकार हो गया. इससे दिल्ली सल्तनत की शक्ति और साधनों का विकास हुआ.

मंगोल आक्रमण का संकट1221 ई में इल्तुतमिश के सामने मंगोल आक्रमण का भयंकर संकट आ खड़ा हुआ. जिसे उसने अपनी कुटनीतिक प्रतिभा के द्वारा दूर करने में सफलता प्राप्त की. मध्य एशिया के रेगिस्तान में बसने वाली मंगोल जाति को चंगेज खां ने संगठित करके चीन, तुर्किस्तान, ईराक, मध्य एशिया और फारस को पदाक्रांत करके एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की.

इतिहासकारों के विवरणों से पता चलता हैं कि मंगोलों में भयानक बर्बरता तथा रक्त पिपासा विद्यमान थी. चंगेज की मंगोल सेना के सामने ख्वारिज्म का शक्तिशाली साम्राज्य भी ध्वस्त हो गया. ख्वारिज्म का शाह कैस्पियन सागर की तरफ भाग गया और उसका युवराज जलालुद्दीन मंगबरनी भारत की ओर चला आया. युवराज का पीछा करते हुए मंगोल भी भारत आ धमके. जलालुद्दीन ने कुबाचा के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और बाद में पंजाब के खोखरों से मित्रता करके पंजाब में अपना राज्य स्थापित कर दिया.

इसके बाद उसने इल्तुतमिश की सेवा में अपना राजदूत भेजकर मंगोलों के विरुद्ध सैनिक सहायता की अपील की. जलालुद्दीन ने इल्तुतमिश की धार्मिक भावनाओं को उभारने का प्रयास किया. इल्तुतमिश के सामने दुविधापूर्ण स्थिति आ खड़ी हुई. एक स्वधर्मी शरणार्थी युवराज को सहायता न देने से मुस्लिम जगत में उसकी बदनामी होना निश्चित था. परन्तु सहायता देने का अर्थ था बर्बर चंगेज खां को दिल्ली पर आक्रमण के लिए भड़काना.

क्योंकि चंगेज खां एक तटस्थ राज्य पर आक्रमण नहीं करना चाहता था और इसलिए अभी तक उसने सिन्धु नदी को पार नहीं किया था. ऐसी स्थिति में इल्तुतमिश ने कुटनीतिक सुझबुझ से काम लिया और विनम्रतापूर्वक जलालुद्दीन को कहला भेजा कि भारत की गर्म जलवायु आपके निवास के अनुकूल नहीं है, अतः आप पंजाब खाली करके वापिस लौट जाए. इसके साथ ही इल्तुतमिश ने भावी युद्ध की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए जोर शोर से सैनिक तैयारियां शुरू कर दी.

जलालुद्दीन ने सम्पूर्ण स्थिति को परख कर इल्तुतमिश से टकराना उचित नहीं समझा और कुबाचा के राज्य में लूटमार करके 1224 ई में  फारस की तरफ भाग गया. उसके लौटते ही  मंगोलों ने भी भारत छोड़ दिया.  इस प्रकार इल्तुतमिश  ने  दिल्ली सल्तनत को मंगोलों के विनाश से बचा लिया. कुबाचा की शक्ति के कमजोर हो जाने से उसे अपने राज्य का विस्तार करने का सुअवसर मिल गया.

बंगाल विजय:ऐबक की मृत्यु के बाद बंगाल का सूबेदार अलीमर्दान एक स्वतंत्र शासक बन बैठा और उसने दिल्ली को वार्षिक कर भेजना बंद कर दिया. उसने सुल्तान अलाउद्दीन की उपाधि धारण की और अपने नाम का खुतबा पढ़वाया. अपनी सत्ता को मजबूत बनाने की दृष्टि से उसने अनेक खलजी सरदारों का क्रूरता के साथ दमन किया और बहुतों को मौत के घाट उतार दिया.

परिणामस्वरूप अधिकांश खलजी सरदार उसके शत्रु बन गये और दो वर्ष के भीतर ही उन्होंने अलीमर्दान का वध कर दिया. इसके बाद उन्होंने हिसामुद्दीन इवाज को अपना शासक बनाया. इवाज ने सुल्तान गयासुद्दीन की उपाधि धारण की. इवाज ने बिहार पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कायम किया. इसके बाद उसने पड़ौसी राज्यों जाजनगर, तिरहुत तथा कामरूप के विरुद्ध अभियान किये. इन विजयों से उसकी स्थिति सुद्रढ़ हो गई और उसकी महत्वकक्षाएं बढने लगी हैं.

इल्तुतमिश प्रारम्भ से ही पूर्वी भारत पर निगाह रखे हुए था. परन्तु उत्तर पश्चिमी सीमान्त संकट के कारण कोई कार्यवाही नहीं कर पाया. चंगेज खां की वापसी से राहत मिलते ही उसने एक शक्तिशाली सेना के साथ पूर्व की ओर अभियान किया. बिना किसी प्रतिरोध के दक्षिणी बिहार पर उसने अधिकार कर लिया. इसके बाद वह बंगाल की तरफ बढ़ा. यदपि इवाज ने युद्ध की तैयारियां कर रखी थी परन्तु ठीक समय पर उसने अपना निर्णय बदल दिया और इल्तुतमिश के साथ संधि कर ली.

संधि के अनुसार इवाज ने इल्तुतमिश की अधीनता स्वीकार कर ली, बिहार का क्षेत्र इल्तुतमिश को सौप दिया गया, वार्षिक कर चुकाने का वचन दिया और स्वतंत्र शासक के राजकीय चिह्नों और उपाधियो को भी त्याग दिया. इससे संतुष्ट होकर सुल्तान इल्तुतमिश वापिस लौट गया. लौटते समय वह मलिक जानी को बिहार का सूबेदार नियुक्त कर गया.

परन्तु इल्तुतमिश के लौटते ही इवाज ने बिहार पर आक्रमण कर दिया और मलिक जानी को खदेड़ कर बिहार को पुनः अपने अधिकार में ले लिया. इससे क्रोधित होकर इल्तुतमिश ने अपने लड़के नसीरुद्दीन महमूद शाह को जो कि अवध का सूबेदार भी था. इवाज के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने का आदेश दिया. महमूद शाह एक योग्य पराक्रमी युवक सेनानायक था और अवध के हिन्दू सरदारों का दमन करके काफी यश कमाया था.

1226 ई में जब इवाज पूर्व की ओर किसी अन्य युद्ध में उलझा हुआ था, नसीरुद्दीन महमूद ने अचानक तेजी के साथ इवाज की राजधानी लखनौती पर आक्रमण कर उस पर अधिकार जमा लिया. इवाज ने पलट कर नसिरूद्दीन पर आक्रमण किया, परन्तु वह युद्ध में मारा गया और बंगाल पर दिल्ली सल्तनत का अधिकार हो गया. इल्तुतमिश ने बंगाल का शासन भी महमूद को सौप दिया.

परन्तु 1229 ई में अचानक इस प्रतिभावान राजकुमार महमूद की मृत्यु हो गई और खिलजी सरदारों ने बंगाल में विद्रोह का झंडा फहरा दिया. उनमे से एक मलिक इख्तियारूद्दीन बलका बंगाल का सुल्तान बन बैठा. अतः 1230 ई में इल्तुतमिश को पुनः बंगाल पर अभियान करना पड़ा. युद्ध में बल्का मारा गया और बंगाल पर पुनः दिल्ली का शासन कायम हो गया. मलिक जानी को बंगाल का सूबेदार नियुक्त करके सुल्तान वापिस लौट आया.

 पंजाब के खोखरों का दमन– ख्वारिज्म का जलालुद्दीन मंगबरनी पंजाब से वापिस लौटते समय सैफुद्दीन करगुल को पश्चिमी पंजाब में अपना अधिकारी नियुक्त कर गया था. सैफुद्दीन ने पंजाब के खोखरों से मैत्री करके अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने का प्रयास किया. दूसरी तरफ इल्तुतमिश  कुबाचा से पंजाब का अधिकांश क्षेत्र जीत लिया था. परन्तु सैफुद्दीन और खोखरों की लूटमार तथा धावों से पंजाब में अव्यवस्था फ़ैल गई थी. अतः इल्तुतमिश ने उसका दमन करने के लिए एक शक्तिशाली सेना भेजी. डॉ पाण्डेय ने लिखा हैं कि भयंकर संघर्ष के बाद खोखरों का दमन कर दिया गया. और स्यालकोट जालन्धर तथा नंदना के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया. खोखरों पर नियंत्रण रखने की दृष्टि से इन क्षेत्रों में नई सैनिक चौकियाँ कायम की गई और नासिरुद्दीन एतिगीन को नंदना में नियुक्त किया गया. खोखरों के गाँव तुर्क अमीरों को जागीर में दे दिए. इससे शांति और व्यवस्था कायम हो गई.

राजपूत एवं हिन्दू शासकों से युद्ध– गोरी की मृत्यु के बाद राजपूत एवं हिन्दू शासक पुनः शक्तिशाली बन बैठे क्योकि ऐबक को अपने अल्प शासनकाल में उनके विरुद्ध ठोस कार्यवाही करने का समय नहीं मिल पाया. इल्तुतमिश भी 1225 ई तक विभिन्न समस्याओं में फंसा रहा, परन्तु इसके बाद उसने उनके राज्यों को जीतकर दिल्ली सल्तनत की सीमाओं का विस्तार करने का निश्चय किया. 1226 ई में उसने राजपूतों के शक्तिशाली दुर्ग, रणथम्भौर पर अधिकार कर लिया. 1230 ई तक उसकी सेनाओं ने जालौर, अजमेर, बयाना, तहनगढ़ और साम्भर को भी जीत लिया. इनमें से कुछ राज्यों को दिल्ली की अधीनता स्वीकार करने तथा वार्षिक कर चुकाने की शर्त पर उनके शासकों को वापिस लौटा दिया.

इन विजयो से उत्साहित होकर 1231 ई में इल्तुतमिश ने ग्वालियर पर आक्रमण किया. ग्वालियर के राजा मंगलदेव ने एक वर्ष तकसामना किया परन्तु अंत में थककर ग्वालियर दुर्ग से भागकर दूसरे दुर्ग में शरण ली. उसके भागते ही मुस्लिम सेना का ग्वालियर पर अधिकार हो गया. रशीदुद्दीन को ग्वालियर दुर्ग का प्रधान अधिकारी नियुक्त किया गया. इसके बाद कालिंजर पर आक्रमण किया गया. सुल्तान की सेना के आते ही राजा कालिंजर से भाग गया और दिल्ली की सेना पर दुर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया. परन्तु उसका नियंत्रण अस्थायी रहा. कालिंजर रहा. कालिंजर के चंदेलों ने शीघ्र ही तुर्क अधिकारियों को खदेड़ कर दुर्ग पर पुनः कब्जा कर लिया.

1233-34 ई की अवधि में इल्तुतमिश ने नागदा के गुहिलोतों और गुजरात के सोलंकियों के विरुद्ध भी सैनिक अभियान किये परन्तु उसे सफलता नहीं मिला. मुस्लिम इतिहासकारों ने इन अभियानों का विस्तृत विवरण नहीं दिया हैं. परन्तु राजपूत साधनों से पता चलता हैं कि सुल्तान को परास्त होकर लौटना पड़ा. 1234-35 ई में इल्तुतमिश ने मालवा पर अभियान किया और भिलसा का नगर और दुर्ग जीत लिया. भिलसा में सुल्तान ने 300 वर्ष प्राचीन एक भव्य मंदिर को भूमिसात करवा दिया.

इसके बाद उसने उज्जैन पर आक्रमण किया और बिना किसी विशेष प्रतिरोध के इस नगर पर अधिकार कर लिया. सुल्तान ने उज्जैन में स्थित महाकाल के विख्यात मंदिर को नष्ट कर दिया. उज्जैन की लूटमार से सुल्तान को पर्याप्त धन मिला.

कटहर, दोआब, अवध तथा बिहार में भी हिन्दुओं के अनेक छोटे बड़े ठिकाने थे और उनके शासक समय समय पर मुस्लिम अधिकारीयों को तंग करते थे. अतः उनके विरुद्ध भी कई कई बार सैनिक अभियान किये गये और उन्हें दिल्ली सल्तनत की अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया. इल्तुतमिश का अंतिम अभियान बानियाना पर हुआ परन्तु मार्ग में ही उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया और वह वापिस आ गया.

खलीफा द्वारा सम्मान प्राप्त करना- यदपि इल्तुतमिश ने अपनी सैनिक शक्ति के बल पर सिंहासन के अन्य दावेदारों को परास्त करके दिल्ली के सिंहासन पर अपनी स्थिति को सुद्रढ़ बना लिया था. फिर भी इस्लामी कानून के हिसाब से उसका राज्याधिकार निर्बल था. क्योंकि वह दास रह चुका था. अतः उसने बगदाद के खलीफा जिसे मुस्लिम जगत का सर्वोच्च धर्माधिकारी और शासनाधिकारी माना जाता था, से अपने राज्य की वैधानिक मान्यता प्रदान करने का निवेदन किया. बग़दाद के तत्कालीन खलीफा अल इमाम मुस्तसिर बिल्ला ने इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का सुल्तान स्वीकार कर लिया और उसको नासिर उल मौमनीत की उपाधि प्रदान की. तथा उसके खिल्लत भी भेजी इसका घटना का अत्यधिक राजनीतिक महत्व हैं. खलीफा की स्वीकृति से उसका वैधानिक पक्ष मजबूत हो गया और मुसलमानों के लिए उसकी आज्ञाओं की अवज्ञा धर्म की अवहेलना के समान हो गई. अब लोगों का मुहं बंद हो गया उसे दास मानकर उसके राज्याधिकार की आलोचना किया करते थे. खलीफा द्वारा प्रदत्त सम्मान से मुस्लिम संसार में भी इल्तुतमिश का मान सम्मान बढ़ गया.

इल्तुतमिश की मृत्यु (iltutmish death reason)

बानियाना/बयाना के अभियान के समय इल्तुतमिश बीमार हुआ, उसके बाद वह ठीक न हो सका. उसकी बिमारी बढ़ती गई और अप्रैल 1236 ई में उसकी मृत्यु हो गई. उसने अपनी सैनिक सफलताओं और कूटनीति के द्वारा एक विशाल राज्य की स्थापना की थी. जो उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक और पश्चिम में सिंध से लेकर पूर्व में बंगाल तक फैला था.

इल्तुतमिश की सफलता के कारण

जब इल्तुतमिश दिल्ली के सिंहासन पर बैठा था तो उसके सामने अनेक कठिनाईयाँ तथा अन्य दावेदारों की चुनौतियां थी, उन सब पर विजय प्राप्त करके वह दिल्ली सल्तनत को सुद्रढ़ बनाने में सफल रहा. इल्तुतमिश की सफलता के सन्दर्भ में डॉ आर के त्रिपाठी ने लिखा हैं कि भारत में मुस्लिम संप्रभुता का इतिहास सही अर्थों में इल्तुतमिश से ही आरम्भ होता हैं. डॉ निजामी ने लिखा हैं कि ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की रूपरेखा के बारे में सिर्फ दिमागी तस्वीर बनाई थी पर इल्तुतमिश ने उसे एक व्यक्तित्व पद एक प्रेरणा शक्ति, एक दिशा एक शासन व्यवस्था और एक शासन वर्ग प्रदान किया.

दिल्ली सल्तनत को ठोस आधार प्रदान करने और अपने विरोधियों पर विजय पाने के कारण इल्तुतमिश को सहयोग दिया. इसका पहला कारण निसंदेह उसकी स्वयं की योग्यता, सैनिक पराक्रम और नेतृत्व में दृढ़ता थी. दूसरा कारण उसके विरोधियो में एकता का अभाव था. उसके शत्रु उससे कम शक्तिशाली नहीं थे परन्तु वे इल्तुतमिश के विरुद्ध संगठित नही हो पाए और न ही इल्तुतमिश ने अपनी कूटनीति के द्वारा उन्हें संगठित होने का अवसर दिया. और एक एक करके अपने शत्रुओं का सफाया करने में कामयाब रहा.

तीसरा कारण मध्य एशिया की अराजकता से भाग कर आने वाले अनुभवी शास्नाधिकारियों को अपनी सेवा में नियुक्त करना था. इन अनुभवी लोगों के माध्यम से वह एक उत्तम शासन प्रणाली का सूत्रपात करने में सफल रहा. चौथा कारण उसकी कठोर शासन नीति थी. इसके लिए उसे बर्बरता और क्रूरता का भी सहारा लेना पड़ा, परन्तु परिणाम अच्छा निकला. सैनिक से लेकर सूबेदार और बड़े अधिकारी सभी अनुशासित हो गये. पांचवा कारण खलीफा द्वारा उसके सुल्तान पद और राज्य को मान्यता देना था. अंतिम कारण उसके द्वारा गठित चालीसा मंडल का स्वामिभक्ति के साथ उसका साथ देना था.

इल्तुतमिश का चरित्र व मूल्यांकन

इल्तुतमिश में एक योग्य सुल्तान के सभी गुण विद्यमान थे. मिनहाज ने लिखा हैं कि ऐसा विश्वास किया जाता हैं कि इतना परोपकारी, सहानुभूति रखने वाला तथा विद्वानों और बडो का आदर करने वाला कोई और सुल्तान नहीं था. वास्तव में इल्तुतमिश एक सुंदर स्वस्थ साहसी और पराक्रमी व्यक्ति था. वह एक उदात्त धर्मपरायण शासक था. और अपने इन्ही गुणों के कारण वह एक सामान्य दास की स्थिति से उन्नति करते करते सुल्तान बन गया. उसने भारत में नवोदित मुस्लिम राज्य को छिन्न भिन्न होने की स्थिति से बचा लिया. और उसे एक ऐसा ठोस आधार प्रदान किया जिसके परिणामस्वरूप आने वाली सदियों में भी उसका अस्तित्व बना रहा. उलेमाओं और मौलवियों के प्रभाव के कारण वह अत्यधिक धार्मिक प्रवृति का बन गया कभी कभी गैर मुसलमानों पर अत्यधिक अत्याचार भी कर बैठता परन्तु उसके इन कार्यों से उसे मुस्लिम जनता का सहयोग मिल गया.

इसमें कोई संदेह नहीं हैं कि इल्तुतमिश एक कुशल राजनीतिज्ञ था. जब यल्दौज ने अपनी प्रभुसत्ता का प्रदर्शन करते हुए उसके लिए राजकीय चिह्न भिजवाए तो अपनी स्थिति और परिस्थतियों का मूल्यांकन करके उसने स्वीकार कर लिया. परन्तु अवसर मिलते ही यल्दौज को परास्त करके मौत के घाट उतार दिया. इसी प्रकार कुबाचा का दमन करने में भी जल्दबाजी नहीं की. जलालुद्दीन मंगबरनी की भी विनम्रतापूर्वक परन्तु द्रढ़ता के साथ सहयोग से इनकार करके उसने दिल्ली सल्तनत को मंगोलों के आक्रमण से बचा लिया. इसी प्रकार खलीफा से अपनी सत्ता की मान्यता प्राप्त करना भी उसकी कूटनीति और दूरदर्शिता का प्रमाण हैं.

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