करवा चौथ क्यों मनाया जाता है कहानी इतिहास एवं पूजन विधि

करवा चौथ क्यों मनाया जाता है कहानी इतिहास एवं पूजन विधि : हिन्दुओं के मुख्य त्योहारों एवं व्रतों में करवा चौथ (चतुर्थी) की गिनती भी की जाती हैं. भारत के उत्तरी राज्यों मुख्य रूप से पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान आदि में यह बड़ी धूम धाम के साथ मनाया जाता हैं. वर्ष 2020 में 7 नवम्बर यानि आज करवा का व्रत हैं इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने पति की लम्बी आयु के लिए सौभाग्यवती व्रत रखा जाता हैं. इस व्रत की शुरुआत भौर के चार बजे से ही हो जाती हैं जो देर रात चन्द्र दर्शन के साथ समाप्त होता हैं.

करवा चौथ क्यों मनाया जाता है Why Karva Chauth is celebrated, story history and worship method Pooja Vidhi In Hindi

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करवा चौथ कब हैं क्यों मनाते है, करवा चौथ कथा, करवा चौथ पूजन विधि, करवा चौथ इतिहास हिंदी में– यह एकमात्र ऐसा पर्व है जो भारत के अधिकतर क्षेत्रों की विवाहित स्त्रियों द्वारा किया जाता हैं. चाहे देहात की स्त्री हो या शहर की पढ़ीलिखी नारी सभी इसे बड़ी श्रद्धा के साथ करती हैं. कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन यह व्रत रखा जाता हैं. इसे चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता हैं. इस दिन गणपति जी की पूजा होती हैं संकष्टीगणेश चतुर्थी की तरह ही करवा चौथ का व्रत निर्जला रखा जाता हैं तथा इस दिन सभी सुहागन बिना अनाहार किये देर रात तक चन्द्रोदय का इन्तजार करती हैं.

क्यों मनाते है करवा चौथ का व्रत

इस व्रत को करने के अपने कुछ नियम भी है जिनमे पहला नियम यह है कि यह केवल विवाहित सुहागन स्त्रियों द्वारा ही किया जाता हैं. अविवाहित कन्याएं या विधवाओं द्वारा इस व्रत को नही किया जाता हैं. अपने पति की आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य के लिए ये गणेश जी से कामना करती हैं. सच्चे मन से भक्त की पुकार भगवान गणपति अवश्य सुनते हैं.

करवा चौथ का व्रत लगातार सोलह वर्षों तक किये जाने का प्रावधान हैं अंतिम वर्ष में उद्यापन विधि के साथ इसका समापन किया जाता हैं. हालांकि इस सम्बन्ध में कोई बाध्यता नही हैं चाहे तो इसे उम्रः भर रखा जा सकता हैं. सुहागिन स्त्रियाँ अपने सुहाग  की रक्षा के लिए भारत में हिन्दू महिलाओं द्वारा मनाएं जाने वाले त्योहारों में करवा चौथ का व्रत सबसे बड़ा एवं सौभाग्यशाली व्रत हैं.

करवा चौथ की कथा मेला व मान्यताएं

राजस्थान में यह पर्व बड़ी धूमधाम एवं धार्मिक रीती रिवाजों के अनुरूप मनाया जाता हैं. राज्य में इस दिन सवाईमाधोपुर के बरवाड़ा गाँव में चौथ माता का मेला भी भरता हैं. बरवाड़ा में चौथ माता एक एतिहासिक मंदिर भी बना हुआ हैं. इस मंदिर से जुडे इतिहास के साक्ष्यों के अनुसार इसके निर्माण का श्रेय शासक महाराजा भीमसिंह चौहान को दिया जाता हैं.

करवा चौथ की पूजन विधि एवं व्रत विधि

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को जिस दिन व्रत किया जाता है उस रात चार पहर पर चाँद के दर्शन होते हैं. इस दिन प्रातः चार बजे से स्त्रियाँ (पति) की आयु, आरोग्य, सौभाग्य का संकल्प के लिए करवा का व्रत रखने का संकल्प कर लेवे. इस व्रत को करने का तरीका तथा पूजा विधि यहाँ बताई गई हैं,

  • सफ़ेद बालू मिटटी की शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा की मूर्तियाँ बनाकर शुभ मुहूर्त में इनका पूजन किया जाना चाहिए
  • शक्कर तथा गेहूं के आटे को मिलाकर प्रसाद के लिए घर पर ही लड्डू तैयार करे.
  • इस दिन कई स्थानों पर काली मिटटी तथा शक्कर की चासनी से कर्वे भी बनाए जाने की प्रथा हैं. अपनी परम्परा के अनुसार दस बारह करवे पूजा सामग्री के साथ रखे.
  • करवा चौथ का व्रत रखने के सम्बन्ध में किसी जाति धर्म या पन्त का कोई भेद नही हैं सभी सौभाग्यवती स्त्रियों को यह व्रत रखना चाहिए.
  • यदि आप शिव पार्वती गणेश एवं चन्द्रमा की मूर्ति का प्रबंध नही कर पाती हो तो सुपारी पर नाड़ा बाँधकर भी मूर्ति का संकेत तैयार किया जा सकता हैं.

करवा चौथ की कथा हिंदी में

एक समय की बात हैं पांडवों में सबसे ज्येष्ठ अर्जुन एक बार तपस्या के लिए घर से निकल गये. काफी समय बीतने के बाद भी उनकी कोई सुध बुध नही मिलने थे. द्रोपदी को चिंता होने लगी, तभी उन्होंने अपने पति के बारे में भगवान श्रीकृष्ण से विनती की. तो कृष्ण जी ने उन्हें करवा चौथ व्रत कथा सुनाई जो भगवान शिव द्वारा पार्वती को सुनाई गई थी.

क्रष्ण जी कहते है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तिथि को बिना कुछ खाएं पीए सुहागन स्त्रियों को अपने सुहाग की रक्षा के लिए निर्जला व्रत रखना चाहिए. चन्द्रोदय पर यह व्रत तोडा जाता है जिसमें  सोने, चाँदी या मिट्टी के करवे को लेती देती है जिससे पति पत्नी के बिच हमेशा प्यार का अटूट रिश्ता बना रहे.

इस दिन वधुओं द्वारा अपने सास ससुर से सुहागन का आशीर्वाद लिया जाता हैं. वों एक प्राचीन कथा के द्वारा करवा चौथ व्रत के बारे में बताते हुए कहते हैं, एक समय की बात है एक ब्राह्मण था उसके चार बेटे और एक बेटी थी. जब बहिन का विवाह हो गया तो उस वर्ष उसने करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा, भाइयों को अपनी बहिन की ये हालत देखि नही गई. बार बार आग्रह करने पर भी वह चन्द्र उदय के बाद ही जल ग्रहण करने का तर्क देती रही.

उन भाइयों से बहिन का दर्द देखा नही गया, एक को विचार आया क्यों न घर के पास ही खड़े वृक्ष पर दीपक रखकर छलनी की रोशनी को चन्द्रमा की रोशनी बताकर बहिन का व्रत तुड़वा लिया जाए. दोनों ने ऐसा ही किया. बहिन ने जैसे ही व्रत को तोडा व भोजन ग्रहण करने लगी, उसी वक्त उनके पति की म्रत्यु का संदेशा उन्हें मिला.

बहिन का रो रोकर बुरा हाल था, तभी घर के आगे की राह से इन्द्राणी गुजरी तो उस ब्राह्मण पुत्री ने उसके पैर पकड़ लिए तथा उन पर आई विपत्ति का कारण पूछने लगी.इस पर इन्द्राणी बोली- बहिन तूने चन्द्र उदय से पूर्व ही करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया था यही तेरे दुःख का कारण हैं. यदि तू हर साल नियम के अनुसार करवा चौथ का व्रत करेगी तो पुनः सौभाग्यवती हो सकेगी.

इन्द्रानी के कहे अनुसार ही हुआ. इसलिए हर साल करवा चौथ के दिन हर विवाहित स्त्री को अपने सुहाग के लिए करवा चौथ का व्रत रखना चाहिए. इसी व्रत कथा के कारण आज भी हिन्दू स्त्रियाँ करवा चतुर्थी का व्रत रखती हैं.

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