गबन उपन्यास पर निबंध मूल समस्या कथावस्तु | Essay On gaban Novel In Hindi

Essay On gaban Novel In Hindi : आज के लेख में दोस्तों आपका स्वागत है यहाँ हम जानेगे गबन उपन्यास किसने लिखा, इसके लेखक कौन है, गबन की विषयवस्तु अथवा कथावस्तु, पात्र, मुख्य समस्या आदि के बारें में गबन उपन्यास पर निबंध में हम विस्तार से जानेगे, चलिए इस निबंध, लेख, अनुच्छेद, भाषण को आरम्भ करते हैं.

Essay On gaban Novel In Hindi गबन

गबन उपन्यास निबंध समस्या कथावस्तु Essay On gaban Novel In Hindi

गबन उपन्यास की कथावस्तु संक्षेप में (The contents of the Gaban novel briefly)

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद का गबन उपन्यास एक यथार्थवादी रचना हैं. इसमें भारतीय समाज की प्रमुख समस्या नारी के आभूषण प्रेम एवं नवयुवकों की मौज मस्ती व विलासिता की प्रवृत्ति को चित्रित किया गया हैं.

गबन उपन्यास की कथा कहानी (Story of gaban novel)

संक्षेप में कथा इस प्रकार हैं. उपन्यास में दयानाथ के परिवार के इर्द गिर्द कथावस्तु का ताना बाना बुना गया हैं. उपन्यास के प्रारम्भ में दीनदयाल, जो जमीदार के मुख्त्यार है, उनकी पुत्री जालपा के बचपन की घटनाओं का चित्रण हैं. वह तीन भाइयों के मरने के बाद हुई थी, इसीलिए बेटी की हर इच्छा पूरी करते थे. परिवार समृद्ध नहीं था, किन्तु कोई आर्थिक तंगी नहीं थी. ऐसी स्थिति में जालपा बचपन में ही गहनों से खेलती थी.

एक बार वर्षा ऋतु में झूले पर झूलती हुई गाँव की स्त्रियों और लड़कियों के मध्य एक बिसाती आ पहुंचा. जालपा ने एक चन्द्रहार पसंद करके माता से उसे खरीदने को कहा, माता के यह कहने पर कि चार दिन में तो बिटिया को असली चन्द्रहार मिल जाएगा, जालपा के चन्द्रहार प्राप्त करने की लालसा उस समय और भी बलवती हो उठती है, जब उसके पिता उसकी माता के लिए चन्द्र हार लाते हैं. जालपा हार लेने की इच्छा व्यक्त करती है, लेकिन माता उससे संकेत में कह देती है कि तेरे लिए चन्द्रहार ससुराल से आएगा. यह घटना जालपा के ह्रदय में चन्द्रहार प्राप्त करने की लालसा और तीव्र प्रतीक्षा उत्पन्न कर देती हैं.

समय आने पर जालपा का विवाह दयानाथ के पुत्र रामनाथ से होना निश्चित हो गया. दयानाथ ईमानदार और सज्जन पुरुष थे. कचहरी में ऊपर की आमदनी की अनेक सुविधाएँ रहते हुए भी वे अपने पचास रूपये के वेतन से संतुष्ट थे. और किसी से रिश्वत लेना बहुत बुरा समझते थे. परिणामतः धन की कमी के कारण रमानाथ को दो महीने बाद कॉलेज की पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी. अपने पुरुषार्थ से पढ़ने की लग्न उसमें न थी. वह दो साल से बेकार बैठा था और अपने मित्रों की चीजे मांगकर आनन्द करता और शतरंज खेलने में व्यस्त रहता. [शोर्ट गबन स्टोरी]

दयानाथ अपने इस निकम्मे बेटे का रिश्ता लेने को बिलकुल तैयार न थे, परन्तु उनकी पत्नी जोगेश्वरी ने उन्हें जालपा वाला रिश्ता लेने को विवश कर दिया. दीनदयाल दयानाथ की सज्जनता से बहुत प्रभावित थे. उन्होंने दयानाथ को एक हजार रूपये टीके में दिए. दीनदयाल के टीके को देखकर पचास रूपये मासिक पाने वाले कचहरी के क्लर्क दयानाथ ने तीन हजार के गहने बनवा लिए.

दयानाथ की आर्थिक स्थिति अच्छी न होनने पर भी वे जेवर ऋण लेकर खरीद गये थे. बरात बड़ी धूमधाम से चढ़ी फिर भी चन्द्रहार न दिया जा सका. जालपा की चिर संचित चन्द्रहार प्राप्त करने की लालसा पर भी पानी फिर गया और चन्द्रहार के अभाव में जालपा व सहेलियों के लिए विवाह का कोई आनन्द न रहा एक सहेली शाहजादी ने जालपा को चन्द्रहार प्राप्त करने के लिए पति के सामने मना करने का गुरु मंत्र सिखाया.

दीनदयाल ने दयानाथ को विवाह में जितना रूपया दिया था. वह सब नाच तमाशे, नेग चारे में खर्च हो गया. अतः धन के आभाव में दयानाथ सर्राफ के रूपये न चुका सके. इधर चन्द्रहार न मिलने के कारण असंतुष्ट जालपा को संतुष्ट करने के लिए रमानाथ अपने धनवान होने की बड़ी बड़ी डींगे मारना लगा और अपनी हैसियत को बढ़ाकर कहने लगा. तीन महीने बीतने पर एक दिन सर्राफ दयानाथ से अपने रूपये मांगने आया और यह वायदा कराकर ही हटा कि परसों रूपये की अदायगी हो जायेगी. ऋण को चुकाने के लिए दयानाथ जोगेश्वरी और रमानाथ में परामर्श हुआ और दयानाथ ने यह निश्चय किया कि जालपा के कुछ गहने सर्राफ को लौटा दिए जाए.

परन्तु रमानाथ जालपा से गहनें मांगने के पक्ष में नहीं था. क्योंकि वह जालपा से पहले से ही अपने धनी होने की बात खूब बढ़ा चढ़ाकर कह चूका था. और इस प्रकार गहनें मांगने से उसकी पोल खुल जाती. ऐसी स्थिति में दयानाथ द्वारा छल किया जाने का विरोध करने पर भी रमानाथ जालपा के गहनों की चोरी करने की सोचता है. इसके लिए उसने भाँग व मिठाई मंगवाई ताकि जालपा को रात्रि में नशे में चूर कर सके.

अपनी योजना के अनुसार रमानाथ रात्रि में गहने चुराने का अवसर देखता रहा. जब जालपा प्रेमालाप करके सो गई, तब रमा नाथ चुपके से उसके गहने की सन्दूकची लेकर दयानाथ के पास जा पहुंचा. इसी बीच जालपा के स्वप्न देखा, रमानाथ के पुनः लौटने पर जालपा के स्वप्न की बात कहते ही वह चिल्ला पड़ा चोर, चोर और फिर सब चिल्ला उठे. जालपा गहने चले जाने से बहुत दुखी हुई. उसे गहनों के अतिरिक्त संसार में अन्य किसी वस्तु से प्रेम न था, क्योंकि वह बचपन से ही आभूषणप्रिय परिवार में पली थी, गहनों के चोरी में चले जाने पर वह खोई खोई सी रहने लगी.

आभूषण चोरी होने के बाद रमानाथ नौकरी प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगा. उसकी मित्रता रमेश बाबू नाम के एक क्लर्क से थी. जिसके सहयोग से रमानाथ को म्युनिसिपल्टी में चुंगी की नौकरी मिल गई, उसे तीस रूपया मासिक मिलता था और इसके अतिरिक्त कुछ ऊपर की आमदनी भी हो जाती थी. पति को नौकरी मिलते ही जालपा का स्वाभिमान सजग हो गया और उसे आशा हो गई कि शीघ्र ही उनके नयें गहनें आ जायेगे. इसी बीच गहनों की चोरी की घटना सुनकर जालपा की माता ने अपना चन्द्रहार उसके पास भेजा, किन्तु जालपा के स्वाभिमान ने पति की कमाई में से ही गहने लेने को उचित समझ कर अपनी माता के हार को लौटा दिया.

रमानाथ को अपनी नौकरी की आमदनी देखकर यह विशवास हो गया कि जालपा के लिए शीघ्र ही गहने बनवा देगा, परन्तु जब उसे जालपा द्वारा अपनी सहेलियों को लिखे पत्र से पता चला कि उसकी माँ गहनों के लिए कितनी व्याकुल है तो उसने आभूषण उधार लाने का निश्चय किया. रमानाथ इससे पहले भी जालपा के लिए गहने लाने का विचार कर रहा था और उसने रमेश बाबू के घर जाकर उनके सम्मुख ऋण पर गहने खरीदने की बात की थी, पर रमेश बाबू के उपदेशों से वह खाली हाथ लौट आया था, अंत में रमानाथ ने गहने उधार लाने का निश्चय कर ही लिया.

वह गंगू सर्राफ से गहने उधार ले आया, जिन्हें पाकर जालपा की खुशी का ठिकाना न रहा. रमानाथ के गहने की बात सारे सर्राफ में फ़ैल गई और एक दिन दलाल चरनदास गहने लेकर रमानाथ के घर आ पहुंचा. जालपा की गलतफहमी के कारण कि इन गहनों के रूपये तो माताजी देगी, सात सौ के दो गहने उधार ले लिए. इस प्रकार झूठी आन और संकोच के कारण रमानाथ के ऊपर तेरह सौ रूपये से भी अधिक ऋण हो गया.

उधार के बोझ के कारण रमानाथ प्रतिदिन चिंतित रहने लगा और जालपा गहनों के प्राप्त होते ही समाज में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के उद्देश्य से सहेलियों में घूमने लगी और नयें लोगों से मेल जोल बढ़ाना आरम्भ कर दिया. सहेलियों के लिए धान, इलायची, जलपान आदि का सारा व्यय जालपा द्वारा किया जाने लगा. रमानाथ जालपा के साथ सिनेमा आदि देखने जाने लगा. एक पार्टी में सम्मिलित होने के लिए एक बढ़िया साड़ी और एक घड़ी खरीद ली गई. रमानाथ और जालपा हाईकोर्ट के एक एडवोकेट के यहाँ पार्टी में गये.

वहां जालपा का परिचय वकील साहब की पत्नी रतन से होता हैं. रतन को जालपा के कंगन बहुत पसंद आते हैं. और वह रमा नाथ को वैसा ही कंगन बनवाने के लिए छः सौ रूपये पेशगी दे देती हैं. रमानाथ इन छः सौ रूपये को गंगू सर्राफ की दूकान पर अपने हिसाब में जमा कर देता हैं. इसके साथ ही वह गंगू सर्राफ को कंगन की नई जोड़ी बनाने को कहता हैं. गंगू ने पहले तो हाँ कर ली पर धीरे धीरे इंकार कर दिया. पेशगी दिए बिना कंगन की जोड़ी बनाने को तैयार नहीं हुआ. रमानाथ इन सारी बातों को छिपाता रहा. रतन अपने कंगनों के लिए बराबर मांग करती रही, परन्तु रमानाथ उनके बनने में देर का बहाना करके बात टालता रहा.

अंत में रतन को शंका हो गई और उसने कहा कि यदि कंगन नहीं बनते तो मेरे रूपये वापिस ला दो. रमानाथ रतन के रूपये चुकाने के लिए मित्रों से रूपये उधार मांगता है, पर रूपयें नहीं मिल पाते. रमेश बाबू रमानाथ को समझाते भी है कि मित्रों से रूपये का व्यवहार मनमुटाव उत्पन्न कर देता हैं. [गबन फुल स्टोरी]

रूपये लौटाने के लिए रतन द्वारा दी गई मोहलत का अंतिम दिन भी आ पहुंचा, किन्तु रमानाथ छः सौ रूपये एकत्रित न कर सका. उसी समय दफ्तर में चुंगी के हिसाब में आए हुए साठ सौ रूपयों को देखकर उसे इस समस्या के समाधान का एक उपाय सूझा. रूपये खंजाची के चले जाने के बाद आठ सौ रूपये की थैली घर ले आया. घर आकर उसने थैली को जालपा को देते हुए कहा कि रतन के रूपये लाया हैं. शाम को जब वह घूमने गया तो उसके पीछे रतन अपने पैसे लेने आई. जालपा ने आठ सौ रूपये की थैली ज्यों की त्यों रतन को पकड़ा दी. रमानाथ जब घूमकर वापिस आया तब उसे ज्ञात हुआ कि रतन को आठ सौ रूपये की थैली दे दी गई हैं. वह उसे वापिस लाने के लिए रतन के घर गया पर संकोचवश नहीं ला सका.

अब रमानाथ बड़ी मुश्किल में फंस गया वह सोचने लगा कि यदि कल रूपया खजाने में जमा न हुआ तो उस पर गबन का मुकदमा चलेगा और उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाएगा. उसनें सवेरे कहार भेजकर रतन से रूपये मंगवाने का प्रयत्न किया. पर रतन ने थैली से अधिक अर्थात दो सौ रूपये ही भेजे. जालपा को रूपये मंगवाने का पता चल गया. रमानाथ को इतनी जल्दी ही रूपये मंगवाने के लिए कोसते हुए अपने पास ही दो सौ रूपये होने का संकेत देकर जालपा ने कहा कि मुझसे ले लिए होते. इसी बीच चरणदास का नौकर रमानाथ से आभूषण के रूपये मांगने लगा.

जिसके कारण पिताजी के सामने ऋण का राज खुल गया. दफ्तर जाते समय रमानाथ को जालपा ने दो सौ रूपये दिए. रमा नाथ के पास सौ रूपये अपने थे और दौ सौ रतन के यहाँ से मंगवाए थे. इस प्रकार दफ्तर के आठ सौ में से पांच सौ तो रमानाथ ने इक्कठे कर लिए परन्तु शेष तीन सौ का प्रबंध न हो सका. रमानाथ दफ्तर पहुँचते ही रमेश बाबू से मिला और उससे जेब से तीन सौ के नोट गायब होने की बात कही, रमेश बाबू ने कहा कि रूपये कल जमा करा देना वर्ना हथकड़ियाँ पड़ जाएगी.

रमानाथ शेष तीन सौ रूपये के प्रबंध के लिए रतन से मिला पर सफलता न मिली. रतन के घर से निराश लौटते हुए उसने संकल्प किया कि सारी स्थिति जालपा को बताकर उससे गहनें मांगकर उन्हें गिरवी रखकर रूपये जमा कर लेगा. घर पहुंचते ही रमानाथ का दृढ संकल्प ढीला पड़ गया. उसने पहले की भांति रात को गहने चोरी कर लेने की सोची पर उसके लिए भी साहस न हुआ, प्रातःकाल उठकर वह रमेश बाबू के घर गया पर वहां भी उसे सफलता नहीं मिली. मार्ग में उसने निश्चय किया कि वह जालपा को एक पत्र लिखकर सारी परिस्थति से परिचित कराएगा और उसके गहनों की मांग करेगा.

घर आकर रमानाथ ने पत्र लिखा, पर देने का साहस न हुआ. उधर जालपा ने कुछ रूपया निकालने के लिए रमानाथ की जेब में हाथ डाला तो वह पत्र उसके हाथ लग गया. रमानाथ ने पत्र छिनने का प्रयास किया पर जालपा ने नहीं दिया. जालपा द्वारा पत्र को लिखे हुए देखकर रमानाथ ने लज्जा का अनुभव किया. क्योंकि पत्र पढ़ते ही जालपा को रमानाथ की वास्तविक स्थिति ज्ञात हो जाती. अतः वह तत्काल सीढ़ियों से उतरकर घर से बाहर चला गया और सीधा स्टेशन पहुंचकर कलकत्ता जाने वाली गाड़ी में बिना टिकट ही बैठ गया.

उधर जालपा पत्र पढकर सब कुछ समझ जाती है और अपने गहने बेचकर म्युनसिपालिटी में रूपये जमा करा देती हैं. गाड़ी में रमानाथ की भेट बूढ़े खटीक देवीदीन से हुई. रमानाथ की असहाय अवस्था देखकर उसने अपने यहाँ ठहरा लिया. कलकत्ते में उसकी सब्जी की दूकान थी जिस पर प्रायः उसकी बुढ़िया काम करती थी.

रमानाथ देवीदीन के घर ही रहने लगा, परन्तु पुलिस के डर से वह दिनभर भी कहीं नहीं निकलता था. संध्या के समय वह एक वाचनालय में जाने लगा एक दिन वाचनालय में दयानाथ द्वारा प्रकाशित एक विज्ञप्ति उसे पढ़ने को मिली. जिसमें रमानाथ को घर पहुंचाने पर पांच सौ रूपये का ईनाम देना लिखा था. एक दिन उसे अचानक रतन वाचनालय में दिखाई दी, पर वह उससे नहीं मिला. इसी प्रकार दो महीने और बीत गये. सर्दी के मौसम में सेठ किरोड़ीमल की ओर से भिखमंगों को कम्बल बांटे जा रहे थे, वहां पहुंचकर मुनीम के आग्रह पर वह भी एक कम्बल ले आया, पर इस कार्य से उसकी जन्म जन्मांतर की संचित मर्यादा आहत हो उठी. [गबन पीडीऍफ़]

उसने दृढ निश्चय कर लिया कि वह निश्चित रूप से कल काम की खोज में निकलेगा. दूसरे दिन रमानाथ ने गबन का हाल देवीदीन को बता दिया. पुलिस द्वारा पकड़े जाने की आशंका उसे सदैव बनी रही. देवीदीन भी पहले पुलिस से भयभीत हुआ पर यह सोचकर कि रूपये में बड़ा जोर है उससे अपने भय पर विजय पा ली. देवीदीन ने रमानाथ को साथ लेकर घट जाने का विचार किया, रमानाथ पहले तैयार हो गया पर बाद में मना कर दिया.

उधर जालपा ने रामनाथ को ढूढ़ने के लिए शतरंज की एक पहेली छपवाई और उसका हल करने वाले को पचास रूपये का ईनाम देने की घोषणा की. एक दिन पुस्तकालय से लौटते समय रमानाथ ने कुछ युवकों से इसी शतरंज की पहेली के सम्बन्ध में बात चीत करते देखा. उसने उस पहेली की नकल कर ली और उसका हल निकालकर देवीदीन के हाथ उस अखबार के दफ्तर भेजा, जिसमें वह छपी थी. रमानाथ को उस हल पर पचास रूपये ईनाम में मिले.

इन रूपयों के द्वारा उसने देवीदीन की सहायता से एक चाय की दूकान खोल दी. धीरे धीरे उसके परिश्रम से दूकान चल पड़ी, पैसा हाथ में हो तो विलास भी सूझता है. इसी विलास के फेर में रमानाथ को बाहर निकलने पर विवश कर दिया. वह प्रारम्भ से ही पुलिस के भय से छिप छिपकर सावधानी और सतर्कता से रहता था, लेकिन एक दिन जब वह ड्रामा देखकर लौट रहा था तो पुलिस वालों ने उसे व्यर्थ ही भय के कारण अपनी नजरों से ओझल होते देखा. उसके इस संदेहास्पद आचरण के कारण पुलिस वालों ने उसे गिरफ्तार कर लिया और रमानाथ ने थाने में जाकर स्वयं ही म्युनिसिपल्टी के रूपये गबन करने की बात कह दी.

पुलिसवालों ने टेलीफोन द्वारा इलाहबाद पुलिस और म्युनिसिपल्टी से बात की तो उन्हें पता चला कि रमानाथ चुंगी में मुंशी जरुर था, पर उसने गबन नहीं किया. कारण जालपा ने पैसे जमा करा दिए थे. पुलिसवालों ने रमानाथ को यह ज्ञात न होने दिया कि वह निर्दोष है, क्योंकि पुलिस ने उसे ऐसे समय में पाया जबकि उसे एक मुकदमे में गवाही देने के लिए पढ़े लिखे आदमी की आवश्यकता पड़ रही थी. [गबन नॉवेल हिंदी में ]

पुलिस वालों ने देशभक्त क्रांतिकारियों पर झूठा मुकदमा बना रखा था. उन्होंने रमानाथ को उसमें वादा मुआफ गवाह बनकर क्रांतिकारियों के विरुद्ध अपना पढ़ाया हुआ बयान देने को कहा. रमानाथ पहले तो पुलिस की बात मानने को तैयार न हुआ, लेकिन बाद में जेल जाने के भय तथा घुटने के मोह से पुलिस वालों की बात मानने को तैयार हो गया. देवीदीन और जग्गो ने रमानाथ को छुड़ाने का प्रयत्न भी किया पर रमानाथ ने स्वयं ही कहा कि उसे जेल न होगी, केवल एक मुकदमे में शहादत देनी होगी. तब देवीदीन व जग्गो उसे वही छोड़कर चले गये. रमानाथ ने पुलिस का पढ़ाया हुआ बयान अदालत में दे दिया. जिसके आधार पर क्रांतिकारियों को लम्बी लम्बी सजाएं हो गई, रमानाथ के इस व्यवहार से देवीदीन उससे घ्रणा करने करने लगा.

रमानाथ की गिरफ्तारी से पहले जालपा ने रतन की सलाह से शतरंज का एक नक्शा समाचार पत्रों में प्रकाशित करके घोषित किया कि उसे हल करने वाले को पचास रूपये का इनाम दिया जाएगा. रमानाथ ने नक्शा भरकर वह इनाम प्राप्त किया था जिससे घर वालों को मालूम हो गया कि रमानाथ कलकत्ते में हैं. इसी आधार पर जालपा ने रमानाथ की खोज में कलकत्ता आई और प्रजामित्र समाचार पत्र जिसमें शतरंज का नक्शा छपा था, के दफ्तर द्वारा रमानाथ का पता लगाकर देवीदीन के घर पहुँच गई.

जालपा को यह जानकर बहुत दुःख हुआ कि रमानाथ एक झूठे मुकदमें में पुलिस का मुखबिर बन गया हैं. वह देवीदीन को साथ लेकर रमानाथ का बंग्ला देखने गई जहाँ पुलिस ने उन्हें ठहराया था. वहां पहुँचने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि रमानाथ पन्द्रह दिनों के लिए वह स्थान देखने गया है जहाँ वारदात हुई थी, रमानाथ के लौटते समय जालपा ने उसे मोटर में बैठे देख लिया. उसने निश्चय कर लिया कि या तो रमानाथ से हाईकोर्ट में बयान बदलवा लूंगी या मैं स्वयं अदालत में जाकर सारी घटनाओं को सच सच बता दूंगी.

जालपा ने रमानाथ के नाम उसी रात एक पत्र लिखकर बड़ी कठिनता से उसके पास पहुचाया गया. रमानाथ रात को चुपके से निकलकर देवीदीन के घर आया और जालपा से मिला. जालपा ने उसे सारी स्थिति से परिचित करा कर उसे अपना बयान बदलने को बाध्य किया. रमानाथ पहले तो तैयार नहीं हुआ पर जालपा के समझाने बुझाने के बाद वह जज के सामने अपना बयान बदलने को तैयार हो गया, किन्तु पुलिस के अफसरों के धमकाने और उसे बढ़िया नौकरी दिलाने के लालच में जालपा के प्रयत्नों पर पानी फिर गया और पुनः क्रांतिकारियों के विरुद्ध गवाही देने के लिए तैयार हो गया.

इसी बीच रतन अपने बूढ़े पति की बिमारी का इलाज कराने के लिए कलकत्ता आई. वकील साहब मृत्यु शैय्या पर लेटे जान पड़ने लगे. पर रतन को आश्वासन दिलाते रहे कि वे ठीक होते जा रहे हैं. उन्होंने रतन को एक दिन रमानाथ का पता लगाने के लिए भेजा पर पता न लगा सकी. इसी बीच रतन के वृद्ध पति की मृत्यु हो गई. दाह क्रिया के लिए उनके भतीजे मणिभूषण को बुलाया गया. [गबन स्टोरी इन हिंदी]

मणिभूषण रतन को लेकर घर पहुंचा और धीरे धीरे वकील साहब का सारा लेन देन अपने हाथों में ले लिया. मणिभूषण ने बंगला और मोटर बेच दिए और रतना के लिए पन्द्रह हजार रूपये का मकान किराए पर ले लिया और दिया. रतन क्रोध के आवेश में बिना कुछ सामान लिए जालपा के घर की ओर चली. रमानाथ ने पुलिस के प्रभाव में आकर क्रांतिकारियों के विरुद्ध गवाही दे दी.

जालपा भी रमानाथ का बयान सुनने आई और उसने बयान न बदलने के कारण कोर्ट से लौटते समय रमानाथ को मन ही मन कोसने लगी. मुकदमें का निर्णय हो गया और उसकी गवाही के कारण स्कूल मास्टर दिनेश को फांसी की सजा मिली और शेष क्रांतिकारियों को कारावास. जालपा को जब मुकदमे का फैसला ज्ञात हुआ उसका ह्रदय कम्पित हो उठा. वह यह सोचकर काँप उठी कि रमानाथ के कारण एक व्यक्ति को फांसी होगी और अन्य को कारावास. उसने देवीदीन को दिनेश के घर का पता लगाने के लिए भेजा.

क्रांतिकारियों को सजा हो जाने के बाद रमानाथ के मन में अपने प्रति ग्लानि उत्पन्न हो गई. एक बार पुलिस से मिले आभूषणों को लेकर जालपा के पास आया तो जालपा ने उन्हें घ्रणा के साथ ठुकरा दिया और बुरी तरह फटकारा. रमानाथ देवीदीन के घर लौट आया और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि उसे जज साहब के सामने जाकर सारी पोल खोल देनी चाहिए. पर वह जज साहब के बंगले पहुंचकर भी लौट आया. वह जज साहब से कहने का साहस न कर पाया. वस्तुतः रमानाथ पुलिस वालों के व्यवहार से ऊब चूका था. और उसने उनके सामने बेढंग व्यवहार किया, पुलिस वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि रमानाथ का यह परिवर्तित व्यवहार उसकी पत्नी जालिपा के कारण हैं.

अतः पुलिस वालों ने यह कहकर कि जालिपा प्राउडलेडी प्रतीत होती है. कुछ मिजाजपुरसी करने की जरुरत होगी, रमानाथ को भयभीत कर दिया, उधर जालिपा अपने पति के कार्य के पश्चातापस्वरूप दिनेश की बूढी माता की सेवा करने लग गई. रमानाथ को काबू में करके पुलिस वाले निश्चिन्त हो गये. उनका केस पक्का हो चूका था.फिर भी वे रमानाथ को हाईकोर्ट के फैसले तक छोड़ना नहीं चाहते थे. पुलिस वालों ने रमानाथ को फसाए रखने के लिए उस पर शराब और सुन्दरी का जादू डाला. वेश्या जोहरा को पुलिस वालों ने रमानाथ को चंगुल में फसाए रखने को कहा.

रमानाथ वेश्या जोहरा से प्रेमालाप होने पर धीरे धीरे जालपा को भुलाने का प्रयत्न करने लगा. एक दिन वह पुलिस अफसर के साथ मोटर पर घूमने जा रहा था कि मार्ग में जाती हुई दीन मनील जालपा को देखा. उसका ह्रदय जालपा को ही जानने के लिए तडप उठा. वह सोचने लगा कि कहीं देवीदीन ने जालपा को निकाल तो नहीं दिया. इस रहस्य का पता लगाने के लिए उसने जोहरा की सहायता ली और जालपा का पता लगाने के लिए कहा. जोहरा भी रमानाथ से प्रेम करने लगी थी. अतः वह उसकी बात को अस्वीकार न कर सकी.

जालपा का पता लगाकर वह आठ दिन बाद लौटी. इसी बीच रमानाथ उसकी प्रतीक्षा करते परेशान हो गया. जोहरा ने जालपा से अपने मिलने की घटना सुनाई और बताया कि वह फांसी लगाने वाले दिनेश के घर वालों की सेवा में लगी है, जोहरा स्वयं उसके जालपा के त्याग से इतनी प्रभावित हुई कि उसने भी सादा रहन सहन अपना लिया.

रमानाथ भी जालपा के त्याग की कहानी से बहुत प्रभावित हुआ और दरोगा से एक घंटे की छुट्टी लेकर जालपा, देवीदीन और जग्गो से मिलने लगा. उसने जालपा से वादा किया कि वह इस बार निश्चय ही सारे रहस्य का भांडा फोड़ देगा. लौटते समय वह जज के बंगले पर पहुंचा. रमानाथ ने इस बार साहस करके जज साहब को सारी सत्य घटनाओं से परिचित करवा दिया. इस सत्य के उद्घाटन के अनन्तर कोर्ट में फिर मुकदमा सुना गया और रमानाथ के बयान बदलने पर सारे कैदी रिहा कर दिए गये. यह देखकर पुलिस वाले रमानाथ के पीछे पड़ गये. उन्होंने उस पर झूठी गवाही देने के अपराध में दंडित करने के लिए मुकदमा चलाया लेकिन रमानाथ ने जज की सहानुभूति प्राप्त कर ली और उसे मुक्त कर दिया गया. [गबन इन हिंदी]

कलकत्ता के षड्यंत्र से मुक्ति प्राप्त करके रमानाथ अपने परिवार और रतन, जोहरा व देवीदीन के साथ प्रयाग के एक गाँव में बस गया वे लोग अपने परिश्रम से खेती करके आजीविका चलाकर परोपकार करने लगे. समय व्यतीत होता गया और एक दिन रतन को इस देह से मुक्ति मिल गई. जोहरा भी कुछ समय उपरान्त गंगा में डूबते हुए एक बच्चे और स्त्री को बचाने के फल स्वरूप गंगा में डूब गई. इस प्रकार रमानाथ बीते दिनों की कटु स्मृति लिए हुए अपना जीवन यापन करने लगा.

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