छोटी कविता कक्षा 8 के बच्चों के लिए : सोने री चिडकली रै

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सोने री चिडकली रै, प्यारो म्हारो देसड़ो,
नर वीरां री खान जगत अगवानी रै ||
दूध दही री अठै नदियाँ बहती, रिध सिद्ध साथै नव निध रहती,
होती अठै मौकली गाया, रहती फलफुला री छाया,
करसा अन्न घंणों निपजाता, बानै देख देव हरषाता,
सस्य श्यामला रै भारत भोम हैं,

ई रो अन्नपूर्णा रूप, दुनियाँ जाणी रै || सौने री ||
आ घरती नाहर जाया, नारया भी रण में हाथ दिखाया,
सूरा लड़ता सीस कटयुड़ा, देख्या पीछे नही हटयुड़ा,
रण में सदा विजय ही पाई, सारै धर्म ध्वजा फहराई,
आ’ तो करम भौम हैं रै, श्री भगवान् री,
लियो बार-बार अवतार, अमर कहानी रै || सौने री|
आ धरती हैं ऋषि मुनिया री, चिंता करती सब दुनिया री,
गूंजी अठै वेद री वाणी, गीता रण में पड़ी सुनाणी,
विकस्यो हो विज्ञान अठै ही, जलमी सारी कला अठै ही ?
आ’ तौ जगत गुरु ही रै, भारत-भारती,
अब तन मन जीवण वार, बा’ छवि ल्याणी रै | सौने री |

छोटी कविता (बूढी पृथ्वी का दुःख )

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क्या तुमने सुना हैं
सपनो में चमकती कुल्हाडियो के भय से
पेड़ो की चीत्कार?
कुल्हाडियो के वार सहते
किसी पेड़ की हिलती टहनियों में
दिखाई पड़े हैं तुम्हे
बचाव के लिए पुकारते हजारो-हजारो हाथ?
क्या होती हैं, तुम्हारे भीतर घमस
कटकर गिरता हैं जब कोई पेड़ धरती पर?
सुना हैं कभी
रात के सन्नाटे में अँधेरे से मुह ढाप
किस कदर रोती हैं, नदियाँ?
इस घाट अपने कपड़े और मवेशियाँ धोते
सोचा हैं कभी कि उस घाट
पी रहा हैं, कोई प्यासा पानी

या कोई स्त्री चढ़ा रही होगी किसी देवता को अर्ध्य?
कभी महसूस किया हैं कि किस कदर दहलता हैं
मौन समाधि लिए बैठा पहाड़ का सीना
विस्फोट से टूटकर बिखरते पत्थरों की चीख?
खून की उल्टियाँ करते
छेदे हैं कभी हवा को, अपने घर के पिछवाड़े?
थोड़ा सा वक्त चुराकर बतिया या हैं कभी
कभी शिकायत न करने वाली
गुमसुम बूढी पृथ्वी से उसका दुःख?
अगर नही, तो क्षमा करना!
मुझे तुम्हारे आदमी होने पर संदेह हैं !!

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