जाति व्यवस्था और इसका इतिहास | Caste System & Category

Caste System & Category आज हम एक ऐसे विषय पर आपकों कुछ जानकारी देने जा रहे है. जिनसे आप बचकर भी नही निकल सकते और ऐसा भी नही कह सकते कि मै किसी जाति को नही मानता. चलिए जो भी हो वो आपका स्वतंत्र विचार है. जाति व्यवस्था/वर्ण व्यवस्था का इतिहास जानने की कोशिश की जाए तो हमे सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति और मानव इतिहास तक जाना होगा. कुछ लोग भारत में जाति व्यवस्था की शुरुआत वैदिक काल से मानते है मगर सभी विद्वान इस पर एक मत नही है.

जाति व्यवस्था और इसका इतिहास | Caste System & Category In India And World

हिन्दू समाज के विभाजन के आधार को जातियता का नाम दिया है जैसे-क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, यादव, जाटव, केवट आदि। परन्तु वास्तव में ये जातियाँ नहीं है अपितु समाज मे इनका क्या स्थान है और क्या महत्व है? इन सब बातों को आधार बनाकर विभाजन हुआ है। एक तरह से ये जाति विभाजन लोगों की पहचान का आधार है। मनुष्यों के कार्यों के आधार पर यह विभाजन हुआ है। वास्तव में समस्त संसार में स्त्री और पुरुष दो जातियाँ हैं। इसके अतिरिक्त और कोई तीसरी जाति नहीं है।

जाति शब्द का अर्थ और उत्पति

यह एक संस्कृत भाषा का शब्द है जिन्हें संस्कृत की व्याकरण में आकृति ग्रहण जातिलिंगनांचनसर्वं भाक्‌ सकृदाख्यातनिर्गाह्या गोत्रंच चरणै: सह सूत्र से परिभाषित किया गया है. इसका हिंदी में अर्थ होता है वह समूह/वर्ग या आकृति को पृथक किया जा सके. जिसका आधार जन्मजात होता था.

व्यक्ति के पूर्वजो को पूर्व निर्धारित कार्यो के अनुसार एक वर्ग में रखा जाता था. जिन्हें अपने पैतृक धंधे के सिवाय कोई कार्य करने की इजाजत नही होती थी. साथ ही जिस व्यक्ति का जिस जाति में जन्म हुआ उसे कभी बदला नही जाएगा. जैसे यदि कोई क्षत्रिय जाति/कुल में जन्मा व्यक्ति युद्ध या शासन के कार्यो में भी भाग ले सकता था.

प्राचीन भारत में जाति प्रथा (Caste system in ancient India)

प्रसिद्ध ग्रन्थ मनु स्मृति में श्रम के आधार पर भारतीय समाज को ब्राहमण , क्षत्रिय , वेश्य और शुद्र इन चार वर्गो में विभाजित किया गया था. आज की जाति व्यवस्था और छुआछुत, दलित, उच्च वर्ग, निम्न वर्ग यह सब इसी वर्गीकरण का बिगड़ा हुआ रूप है. जो समाज में इंसान इंसान के बिच भेद करता है. भारत में इस जाति व्यवस्था की बुराई के चलते कई वर्ग शिक्षा, चिकित्सा तथा आधारभूत मानवीय मानको से आज तक वंचित है. तो दूसरी तरफ उच्च जाति के लोगों का हर क्षेत्र में आज भी काफी हद तक दबदबा कायम है.

भारत के साथ साथ मिस्र ,यूरोप जैसे देशों के इतिहास में भी जाति व्यवस्था का वर्णन मिलता है. आरम्भ के समय में सामाजिक कार्यो में आसानी के लिहाज से सभी वर्गो को अलग अलग जातियों में बाटा गया था. जिनमे कुशलता के आधार पर लोग एक जाति से दूसरी जाति में आ सकते थे. अपने विवाह सम्बन्ध स्थापित कर सकते थे. मगर धीरे धीरे समय परिवर्तन और लोगों की संकीर्ण सोच ने जाति का अर्थ संकीर्ण रूप में लेना शुरू कर दिया तथा एक व्यक्ति को जन्म से ही एक जाति विशेष की लक्ष्मण रेखा में बाँध दिया गया जिसके बाहर कदम भी रखना वर्जित तथा वेदों के विरुद्ध समझा गया.

वर्तमान भारत में जाति व्यवस्था (Caste system in present India)

वर्तमान समय में जाति व्यवस्था का एक और संकीर्ण रूप और विचारधारा चलन है जिसको जातिवाद के रूप में परिभाषित किया जाता है. केवल अपनी जाति को वरीयता देना या उच्च मानना जातिवाद कहलाता है. चाहे राजनीति हो या शिक्षा इन क्षेत्रों में वीभत्स रूप विशेष रूप से सामने आ रहा है.

जिसके कारण कुछ वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व कम या पहुच कम होने के कारण वो पिछड़ जाते है. आरक्षण को भारत में लागू करना भले ही निम्न और पिछड़े लोगों को उत्थान के रूप में बताया जाता है. मगर इसने अप्रत्यक्ष रूप से जाति व्यवस्था को फिर से खड़ा करने का प्रयत्न किया है.

अब वो समय आ चूका है जब भारत से इस कुरीति को दूर किया जाना चाहिए. क्युकि अब हर घटना, या मौत को जाति विशेष के नजरिये से लोगों को देखने की लत लग चुकी है. इसके कई उदहारण हाल ही के दिनों में देखने को मिल रहे है.

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