झीलों की नगरी उदयपुर पर हिंदी में निबंध लेखन

लेख के शीर्षक झीलों की नगरी उदयपुर में राजस्थान के इस जिले की सुदरता भव्यता और इनके आकर्षक दर्शनीय स्थलों पर यह निबंध लेखन तैयार किया गया हैं, मध्यप्रदेश की राजधानी ” भोपाल ” को भी झीलों की नगरी / नगर  (Lakes city) कहा जाता हैं. हम यहाँ बात कर रहे हैं, उदयपुर शहर की जिन्हें राजस्थान का कश्मीर भी कहा जाता हैं. लीजिए मित्रो बढ़ते हैं हमारे हिंदी निबंध लेखन की तरफ-

झीलों की नगरी उदयपुर : निबंध लेखन

मै भरत हु, उदयपुर शहर में रहता हु. चलिए आज आपकों मै झीलों की नगरी उदयपुर के बारे में बताता हु. उदयपुर नगर अरावली पर्वतमाला के बिच स्थित हैं. इस नगर के चारों ओर झीले ही झीले हैं. पिछोला, स्वरूप सागर, फतहसागर, उदयसागर, दूधतलाई, जनसागर आदि झीले हैं. इनके कारण ही उदयपुर को झीलों की नगरी कहा जाता हैं.

बरसात के मौसम में इन झीलों की छटा और सौदर्य और बढ़ जाता हैं. ये झीले कश्मीर की होड़ करती हैं, इसी कारण कई लोग इस नगर को राजस्थान का कश्मीर कहते हैं.

फतह सागर के बिच बना हैं, नेहरू उद्यान. इन झीलों के पानी में जगनिवास और जगमंदिर नाम से जलमहल भी हैं.

इन झीलों में पर्यटक नौका विहार का आनंद लेते हैं. रात्री के समय जब ये उद्यान तथा ये महल विद्युत के प्रकाश में जगमगाते हैं तो इनकी शोभा देखते ही बनती हैं. एक विशेष बात यह हैं ,कि ये झीले इस प्रकार बनी हैं कि एक झील का पानी दूसरी झील में आता हैं, अत: ये झीले जल सरक्षण का उत्कर्ष्ट उदाहरण हैं.

इस झील में ही उत्तर की ओर एक सौर वेधशाला (सोलर ऑब्जर्वेटरी) बनी हुई हैं.

इसमे वैज्ञानिको द्वारा सूर्य की गतिविधियों का अध्ययन किया जाता हैं. उदयपुर नगर में कई एतिहासिक तथा दर्शनीय स्थल हैं. पिछोला झील के किनारे महाराणा प्रताप के वंशजो का भव्य स्मारक और महल बने हुए हैं, इनमे कांच का काम तथा चित्रकारी अद्वित्य हैं. फतहसागर के किनारे पूर्व की ओर मोती मगरी नाम का प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल हैं, इस पर चेतक घोड़े पर सवार महाराणा प्रताप की विशाल प्रतिमा हैं.उसी परिसर में महाराणा प्रताप के सहयोगी हकीम खां सूरी, भामाशाह, भीलूराणा पूंजा, मन्ना, झाला आदि की प्रतिमाए भी हैं. ध्वनि प्रकाश कार्यक्रम के माध्यम से मेवाड़ की गौरव गाथा को दर्शाया जाता हैं, इससे दर्शको में राष्ट्रप्रेम की भावना का संचार होता हैं.

यहाँ दिन रात पर्यटकों का आना जाना बना रहता हैं.

फतहसागर के पास ही उत्तर में स्थित एक पहाड़ी पर नीमज माता का सुंदर मन्दिर हैं,

यहाँ प्रतिवर्ष श्रधालुओं का ताँता लगा रहता हैं. इस पहाड़ी के पीछे ही ‘प्रताप गौरव केंद्र बना हुआ हैं, यहाँ महाराणा प्रताप की 57 फिट ऊँची प्रतिमा हैं. यह प्रतिमा उनके 57 वर्ष की आयु में स्वर्गवास होने की याद दिलाती हैं.यहाँ एक थियेटर भी हैं.इसमे महाराणा प्रताप के जीवन सघर्ष से जुड़ी एक डोक्युमेंटरी फिल्म भी दिखाई जाती हैं. इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ अन्य प्रतिमाए भी लगी हुई हैं, उनके साथ उनका सक्षिप्त परिचय भी लिखा हुआ हैं. यह एक प्रेरणा स्थल हैं.

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जहा विशाल भारत गरिमामय राजस्थान और गौरवपूर्ण मेवाड़ के दिग्दर्शन होते हैं.

फतहसागर के पश्चिम में एक पहाड़ी पर सज्जनगढ़ का किला हैं, इसे महाराणा सज्जनसिंह ने बनवाया था.

हाल ही में राजस्थान सरकार द्वारा इस वन्य क्षेत्र को अभ्यारण्य घोषित कर दिया हैं.

इससे कुछ ही दुरी पर पश्चिम में शिल्पग्राम हैं,

यहाँ लोक कलाओं के विकास के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं.

यहाँ प्रतिवर्ष दिसम्बर महीने में एक मेला भरता हैं.

इस मेले में देश-विदेश से कई कलाकार अपनी कलाओं का प्रदर्शन करते हैं.

झीलों की इस नगरी में गुलाब बाग़ तथा सहेलियों की बाड़ी नाम से दो सुंदर बगीचे हैं.

गुलाब बगीचे में भांति-भांति के फूल खिलते हैं.

इनकी भीनी महक से दर्शको का दिल बाग़-भाग हो जाता हैं. यहाँ एक चिड़ियाघर भी हैं.

रंग-बिरंगी चिड़ियाओ का चहकना सबको आनन्दित कर देता हैं.

यहाँ बच्चों की रेलगाड़ी भी हैं, आप चाहो तो इसमे यात्रा कर सकते हो, मगर टिकट जरुर लेना.

इसके अलावा यहाँ पहले भालू, शेर, चीते,बन्दर आदि थे.

यहाँ शेर की दहाड़ सुनी जा सकती हैं. हिरन को कुचाले भरता देखकर बच्चे गदगद हो जाते थे.

किन्तु जब से सज्जनगढ़ को अभयारण्य घोषित किया हैं,

सारे जानवरों को वहा स्थानातरित कर दिया हैं.

सहेलियों की बाड़ी में जब फव्वारे चलते हैं, जन्नत का नजारा लगता हैं.

इन झीलों के किनारे वर्ष में दो बार मेले लगते हैं.

हाँ हरियाली अमावस्या तथा गणगौर के अवसर पर इन मेलों में सारा शहर उमड़ पड़ता हैं.पास-पड़ोस के लोगों की भीड़ जमा हो जाती हैं.

पाँव रखने तक की जगह नही बचती हैं.

इन मेलों में यदि आप आओ तो चकरी डोलर और झूलो में जरुर बैठना.

हाँ इतिहास में प्रसिद्ध इस नगर में ‘ भारतीय लोककला मंडप भी हैं, यहाँ भी लोक कलाओं के विकास पर योजनाए बनाई जाती हैं. इस संस्था की देश विदेश में अनूठी पहचान हैं. यहाँ कई प्रकार की कठपुतलीयाँ हैं, उनका नाच और करतब देखकर सभी दर्शक आनन्दित हो जाते हैं.

ये सभी बाते इस झीलों की नगरी उदयपुर की सांस्कृतिक धरोहर हैं.

यदि आप इन सबका आनन्द लेना चाहते हैं, तो निवेदन हैं- पधारो म्हारे देश .

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