टेलीविजन के नुकसान निबंध | Loss of television

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Television Ke Labh Aur Hani in Hindi (टेलीविजन के नुकसान)

स्वतंत्र व्यवसाय की अर्थनीति के नए वैश्विक वातावरण ने विदेशी पूंजी निवेश को खुली छुट दे रखी है. जिसके कारण दूरदर्शन में में ऐसे विज्ञापन की भरमार हो गई है. जो उन्मुक्त वाँसना हिंसा अपराध लालच और इर्ष्या जैसी हिनतम प्रवर्तियो को आधार मानकर चल रहे है.

यह अत्यंत खेद का विषय है. कि राष्ट्रीय दूरदर्शन ने भी उनकी भौंडी नकल की ठान ली है. आधुनिकता के नाम पर जो कुछ दिखाया जा रहा है. जो सुनाया जा रहा है. उनका भारतीय जीवन और संस्कृति का दूर दूर तक कोई रिश्ता नही है.

वे सत्य से कोसो तक दूर है. नई पीढ़ी जो स्वंय में रचनात्मक गुणों के विकास की जगह दूरदर्शन के सामने बैठकर कुछ सीखना, जानना और मनोरंजन करना चाहती है. उसका तो भगवान् ही मालिक है.

जो असत्य है वो सत्य नही हो सकता. समाज को शिव बनाने का प्रयत्न नही होगा तो वह शव ही होगा. आज तो यह मज़बूरी हो गई है. कि दूरदर्शन पर दिखाएं जा रहे वासनायुक्त असशील युक्त द्रश्य से चार पीढ़िया एक साथ आँखे चार कर रही है. नतीजा आपके सामने है.

बलात्कार, अपहरण, छोटी बच्चियों के साथ निकट सम्बन्धियों द्वारा शर्मनाक यौनाचार की घटनाओं में वृद्धि. ठुमक कर चलते शिशु दूरदर्शन पर दिखाएं जा रहे , सुनाए जा रहे स्वर और भंगिमाओ पर अपनी कमर लचकाने लगे है.

ऐसे कार्यक्रम न शिव है, और न ही इनमे समाज को शिवम सुन्दरम बनाने की ताकत है. फिर जो शिव नही है वो सुंदर कैसे हो सकता है. यदि इस प्रकार की दुष्प्रवृत्तियों से समाज को बचाना है तो एक व्यवस्थित आचार संहिता लागू की जानी चाहिए.

जिसमे यह सम्मलित किया जाए कि समाचार पत्रों, दूरदर्शन व अन्य चैनलों पर प्रसारित सभ्य और मर्यादित कार्यक्रमों को ही प्रचारित किया जाना चाहिए.

समाज के गणमान्य लोगों, माता पिता और अन्य परिवारजनों को आगे आकर एक व्यवस्थित योजना के साथ अपनी वर्तमान पीढ़ी को सुसंस्कारित करने का बीड़ा उठाना होगा. जिससे अश्लित विज्ञापनों, अमर्यादित टीवी कार्यक्रमों पर रोक लगाईं जा सके.

टेलीविजन में आपकों सुबह से शाम तक ऐसे कार्यक्रम बहुत ही सिमित संख्या में ही मिलेगे जिन्हें अपने परिवार के साथ बैठकर देखा जा सके. अधिकतर कार्यक्रम विदेशी संस्कृति को अच्छा दिखाने और उसका अनुसरण करने की सीख देते नजर आते है.

आज के समय में यदि टेलीविजन को ईडीयट बॉक्स या डिब्बा कहा जाए तो गलत नही होगा. लोगों को चीजो को बढ़ा चढ़ाकर दिखाकर अपने झांसे में लेने के अलावा अपराधिक प्रवृतियों को बढ़ाना ही आज टेलीविजन का पर्याय बन चूका है. आज के डिजिटल विश्व में लोगों को जाग्रत होकर टेलीविजन की बजाय इन्टरनेट का सहारा लेना चाहिए.

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