वीर दुर्गादास राठौड़ का इतिहास | Veer Durgadas Rathore History In Hindi

वीर दुर्गादास राठौड़ का इतिहास | Veer Durgadas Rathore History In Hindi: मारवाड़ के वीर दुर्गादास राठौड़ में देशभक्ति और स्वामिभक्ति कूट कूट कर भरी हुई थी. ऐसें महान देशभक्त का जन्म 1638 ई. में महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री आसकरण के यहाँ हुआ था. आसकरण दुनेरा का जागीरदार था. पत्नी से नाराजगी के कारण आसकरण ने दुर्गादास व पत्नी को अकेला छोड़ दिया.

वीर दुर्गादास राठौड़ का इतिहास | Veer Durgadas Rathore History In Hindi

दुर्गादास अपनी माँ के साथ लुणा के गाँव में रहने लगा. शिवाजी की माँ की तरह दुर्गादास की माँ ने भी उनमे मारवाड़ के प्रति देशभक्ति की भावना कूट कूट कर भर दी तथा गाँव में ही खेती बाड़ी करने लगे.

वीर दुर्गादास राठौड़ ने अपनी प्रतिभा के बल पर स्वामी भक्ति की मिसाल कायम की. 1878 में जमरुद में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु हो गई, उस समय उनके कोई पुत्र नही था, लेकिन उनकी पत्नी गर्भवती थी. औरंगजेब मारवाड़ के उतराधिकार के प्रश्न पर हस्तक्षेप करके वहाँ पर इन्द्रसिंह को अपनी कठपुतली शासक बनाना चाहता था. इसी बिच 19 फरवरी 1679 को महारानी के पुत्र अजीतसिंह का जन्म हुआ.

अजीत सिंह और वीर दुर्गादास राठौड़ (Ajit Singh and Veer Durgadas Rathod)

अजीत सिंह के जन्म की सुचना बादशाह तक पहुच गई लेकिन इस सम्बन्ध में औरंगजेब की नियति साफ़ नही थी. उसने जोधपुर पर अधिकार कर लिया. विभिन्न स्थानों पर खजानों की तलाशी ली और 36 लाख रूपयें के बदले अपने चाटुकार इन्द्रसिंह को जोधपुर दे दिया.

औरंगजेब ने मनसब के बहाने रानियों सहित राजपरिवार को दिल्ली बुला दिया. औरंगजेब कुअर अजीत सिंह को बुलाकर अपना बनाना चाहता था. राठौड़ सरदार औरंगजेब की इस कार्यवाही से प्रसन्न नही थे. उन्हें बादशाह की नियत में खोट दिखाई दे रही थी. वे चाहते थे कि अजीत सिंह राजपरिवार सहित जोधपुर पहुच जाए.

अजीत सिंह को सुरक्षित मारवाड़ पहुचाने का दायित्व राठौड़ दुर्गादास, पंचोली केसरीसिंह, भाटी रघुनाथ, रणछोड़दास, गोयय्ददासोत राठौड़, सूरजमल आदि को यह जिम्मेदारी सौपी. ये सरदार बादशाह का सीधा विरोध नही कर सकते थे, इसलिए उन्होंने कूटनीति से काम लिया.

वीर दुर्गादास की योजनानुसार सरदारों ने संकल्प किया कि वे अपने प्राणों की आहुति देकर भी राठौड़ राजपरिवार की रक्षा करेगे और उन्हें सकुशल मारवाड़ पहुचाएगे. कुछ सारदार बादशाह को धोखे में रखने के लिए अपनी जागीर छोड़ गये, कुछ सरदार दिल्ली के आस पास के क्षेत्र में रहे ताकि अजीत सिंह को मारवाड़ के लिए निकाल कर ले जाने वाले दल की मुग़ल सेना से रक्षा कर सके तथा वे दल का पीछा करने वाली मुग़ल सेना से लड़कर मर मिटेगे. इस सम्पूर्ण योजना और सुझबुझ के पीछे वीर दुर्गादास राठौड़ का ही हाथ था. जिन्हें औरंगजेब की धूर्तता को उचित उतर देने की तरकीब सोची.

अजीत सिंह को दिल्ली से मारवाड़ लाना (Bring Ajit Singh from Delhi to Marwad)

वीर दुर्गादास अपनी सहयोगी राठौड़ सरदारों के साथ रूपसिंह की हवेली से बड़ी चालाकी से अजीत सिंह को लेकर मारवाड़ की ओर निकल पड़े. स्त्रियों को भी पुरुष भेष में ले जाया गया. बादशाह को इसकी जानकारी मिली तो शाही सेना ने उसका पीछा किया. राठौड़ रणछोड़दास ने इस दल से संघर्ष किया और अपने 70 सहयोगियों के साथ मारा गया.

तब तक दुर्गादास काफी आगे निकल गये, शाही दल भी आगे बढ़ा. इस बार स्वयं दुर्गादास ने शाही दल को रोके रखा. तब तक राजपरिवार आगे बढ़ चूका था. संध्या होते होते दुर्गादास शत्रुओं से बचकर अजीत सिंह से जा मिला. शाही सेना कम संख्या में रह गई और दिल्ली लौट गई. इस प्रकार दुर्गादास राठौड़ की सुझबुझ एवं राठौड़ सरदारों के बलिदान के बल पर अजीत सिंह को सुरक्षित जोधपुर पंहुचा दिया गया.

दुर्गादास राठौड़ की जीवनी (Biography of Durgadas Rathod)

मारवाड़ मुग़ल संघर्ष में भी दुर्गादास की महत्वपूर्ण भूमिका रही. वीर दुर्गादास ने अपनी कूटनीति के माध्यम से मारवाड़ तथा मेवाड़ के सहयोग से औरंगजेब के पुत्र अकबर को बादशाह बनने का प्रलोभन देकर अपनी ओर कर लिया. अकबर ने मारवाड़ के नाडौल नगर में स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया.

औरंगजेब ने अकबर के विद्रोह को दबा दिया, लेकिन मुगलों के विरुद्ध राठौड़ो का संघर्ष जारी रहा. 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मारवाड़ के राठौड़ों का एक बार पुनः मारवाड़ पर अधिकार हो गया. इस अधिकार को प्राप्त करने में दुर्गादास ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

दुर्गादास राठौड़ ने अकबर के पुत्र बुलंद अख्तर पुत्री सफ्मुतिन्न्सा को अपने पास रखकर धार्मिक सहिष्णुता का परिचय दिया. उनके लिए मुस्लिम शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था की. और उन्हें ससम्मान बादशाह के पास पहुचाया. मारवाड़ के अजीत सिंह से भी ज्यादा सम्मान दुर्गादास का था.

सरदारों की परिषद भी अजीत सिंह से ज्यादा दुर्गादास की सलाह का आदर करती थी. इससे अजीत सिंह दुर्गादास से इर्ष्या करने लगा और उनसे अप्रसन्न रहने लगा.

दुर्गादास राठौड़ की मृत्यु (Durgadas Rathore dies)

अजीतसिंह दुर्गादास की युद्ध निति व अच्छे सुझावों का भी विरोध करने लगा. यदि अजीत सिंह दुर्गादास के सिद्धांतो पर चलता तो मुग़ल मारवाड़ संघर्ष में मारवाड़ की गौरवपूर्ण स्थति होती. अजीत सिंह के नाराज हो जाने पर दुर्गादास जोधपुर छोड़कर मेवाड़ उदयपुर आ गया. यहाँ महाराणा ने वीर दुर्गादास राठौड़ को सम्मान के साथ रखा.

इन्हें विजयपुर की जागीर दी और पांच सौ रूपये प्रतिदिन देने की व्यवस्था की. उसे रामपुरा का हाकीम भी बनाया गया. वही रहते हुए दुर्गादास की मृत्यु हो गई. और उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर उनका दाह संस्कार किया गया.

राठौड़ इतिहास में दुर्गादास का योगदान (Durgadas’ contribution in Rathore history)

वीर दुर्गादास राठौर मारवाड़ के इतिहास में एक उज्वल नाम है. ठाकुर आसकरण जी राठौर के पुत्र दुर्गादास का जन्म १३ अगस्त १९६८ (श्रावण शुक्ल १४ , संवत १६९५)को सलवा कलन नमक गांव में हुआ था. उनकी निर्भीकता से प्रभावित होकर एक बार महाराजा जसवंत सिंह ने कहा था “ यह बालक भविष्य में मारवाड राज्य का संरक्षक बनेगा“. १७वि शताब्दी में महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद राठौर वंश की संरक्षा का श्रेय वीर दुर्गादास को ही जाता है.

वीर दुर्गादास राठौर, सूर्यवंशी राजपूत (राठौर) वंश के करनोत शाखा से थे. वे आसकरण राठौर के पुत्र थे , जो मारवाड़ में राठौर वंश के शासक महाराजा जसवंत सिंह की सेना में सेनापति थे. दुर्गादास का लालन पालन उनकी माता के द्वारा ही एक छोटे से गाँव में हुआ क्योकि उनकी माता उनके पिता से अलग रहती थी.

जब दुर्गादास छोटे थे, एक दिन एक चरवाहा, जो महाराज का ऊट चरा रहा था, ऊट लेकर उनके खेतो में घुस गया. ऊटों ने पूरा फसल बर्बाद कर दिया. दुर्गादास ने चरवाहे से अपने जानवर बाहर ले जाने और उनका फसल बर्बाद न करने को कहा. चरवाहे ने उनकी बात को अनसुना कर दिया.

इस पर दुर्गादास ने क्रोधित होकर अपना तलवार निकला और चरवाहे को वही मौत के घाट उतार दिया. यह बात जब महाराज को पता चली तो उन्होंने दुर्गादास को अपने दरबार में बुलाया और उनसे पुछा की क्यों उसने चरवाहे को मार डाला. इस पर दुर्गादास ने कहा ” महाराज ! राज चरवाहा आम लोगो का फसल बर्बाद कर के आपके नाम पर कलंक लगा रहा था.” महाराज इस उत्तर से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने दुर्गादास को अपनी सेना में खास स्थान दिया.

महाराज अजीत सिंह की सुरक्षा

१६७९ में जब महाराज जसवंत सिंह की मृत्यु हुई तब उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था. परन्तु उनकी दो रानिया गर्भवती थी. तत्कालीन मुग़ल शासक औरंगजेब ने इस परिस्थिति का लाभ लेकर एक मुस्लिम को मारवाड़ पर शाषण के लिए नियुक्त कर दिया. इस घटना ने पुरे राठौर वंश को बहुत प्रभावित और क्रोधित कर दिया. इसी बीच दोनों महारानियो में से एक ने पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम अजीत सिंह रखा गया. एक वैधानिक उत्तराधिकारी के जन्म के बाद, बालक अजीत सिंह को शाषण के कुछ खास मंत्रियो (जिनमे दुर्गादास भी थे) के साथ दिल्ली में औरंगजेब के सामने प्रस्तुत किया गया.

औरंगजेब से कहा गया कि वो अजीत सिंह को उसके पिता का राज्य और उपाधि दे दे. औरंगजेब ने पूरी तरह मन नहीं किया परन्तु उसने शर्त रखी कि अजीत सिंह का पालन उसके सामने ही अर्थात दिल्ली में ही मुस्लिम महल में हो. राठौर वंश के महाराजा का पालन एक मुस्लिम के यहाँ हो ये बात राठौर वंश को स्वीकार नहीं था. उससे कहा गया कि राजकुमार अजीत सिंह महारानी के साथ ‘भूली भटियारी’ नमक एक जगह (जो कि अभी आधुनिक दिल्ली में झंडेवाला के पास है) में रुक रहे हैं .

दुर्गादास और समूह के अन्य राजपूतो ने तय कर लिया की राजकुमार अजीत सिंह को गुप्त तरीके से दिल्ली से बहार निकालेंगे. वीर दुर्गादास और उनके ३०० राजपूत योध्हा जिनमे ठाकुर मोकम सिंह बलुन्दा और मुकुंददास खिची भी थे, सभी ने मिलकर एक योजना बनायीं. योजना के अनुसार मोकम सिंह बलुन्दा की पत्नी बघेली रानी ने अपनी नवजात पुत्री को अजीत सिंह के स्थान पर रख दिया.

राजपूतो के अविस्मरनीय बलिदानों में एक माँ का ये बलिदान महान है . जैसे ही दुर्गादास शहर की बाहरी सीमा पर पहुचे मुग़ल सैनिको को इस बात की भनक लग गयी और उन्होंने हमला बोल दिया . दुर्गादास और उनके समूह को अब मुग़ल सेना से लड़ना था जो संख्या में उनसे कही ज्यादा थे. परन्तु वे लड़े और अजीत सिंह को सीमा से बहार ले जाने में सफल हो गये. किसी भी मुग़ल हमले को असफल करने के लिए प्रत्येक निश्चित दुरी पर १५ २० राजपूत योध्हा रुकते गए और वीरगति को प्राप्त करते भी गये.

इस युध्ह में मोकम सिंह बलुन्दा और उनके पुत्र हरिसिंह बुरी तरह घायल हो गए परन्तु किसी तरह वो दुर्गादास और मुगल सैनिको में दुरी बनाये रखने में सफल रहे. मोकम सिंह की पत्नी ने संध्या तक युध्ह जारी रखा. अंत में दुर्गादास केवल ७ राजपूतो के साथ रह गए परन्तु वे राजकुमार को बलुन्दा नगर की सुरक्षा में पहुचने में सफल हो चुके थे. राजकुमार अजीत सिंह लगभग १ वर्ष तक बगेली रानी की सुरक्षा में बलुन्दा में ही रहे.

बाद में उनको मारवाड़ की सुदूर दक्षिणी सीमा से लगे, अरावली की पहाडियों में एक गाँव आबू सिरोही में भेज दिया गया जहा वे बड़े हुए.

इस घटना के बीस साल बाद तक मारवाड़ मुग़ल शाषण के अधीन रहा. इस दौरान दुर्गादास ने मुग़ल सेना खिलाफ अथक संघर्ष किया. राज्य से गुजरने वाले व्यापारिक रास्तो पर लगातार गुर्रिल्ला लुटेरो के हमलों से मुग़ल साम्राज्य को बहुत आर्थिक नुकसान का सामना करना पडा. जिससे मुग़लो की आर्थिक व्यवस्था खराब हो गयी . १७०७ में औरंगजेब की मृत्यु हो गयी . दुर्गादास ने इस स्थिति का लाभ लेते हुए मुग़ल सेना को विस्थापित कर दिया और जोधपुर को अपने कब्जे में लेकर मारवाड़ राज्य को पुनह स्थापित किया. अजीत सिंह को जोधपुर का महाराजा घोषित किया गया . इसके बाद दुर्गादास ने पुरे राज्य में मुसलमानों द्वारा खंडित किये गए मंदिरों का पुनः निर्माण कराया .

चरित्र

औरंगजेब के पुत्र सुल्तान मुहम्मद अकबर ने अपने पिता के खिलाफ बगावत कर दिया. इस बगावत में दुर्गादास ने उसका साथ दिया. इसी दौरान मुहम्मद अकबर की मृत्यु हो गयी और उसकी संतान दुर्गादास के पास ही रह गयी . औरंगजेब अपने नाती पोतो को वापस पाने के लिए व्याकुल हो गया. उसने दुर्गादास जी से विनती की और वे सहमत हो गये. जब बच्चे औरंगजेब के पास पहुचे तो उसने एक काजी से उनको कुरान सिखाने को कहा. यह सुनते ही उसकी छोटी सी नतीन कुरान के आयत पढ़ने लगी. औरंगजेब यह सुनकर आश्चर्य चकित रह गया. बच्चे से पूछे जाने पर उसने बताया कि जब वो दुर्गादास के संरक्षण में थे तब उनको कुरान कि शिक्षा देने और उसके धार्मिक गुणों को बनाये रखने के लिए के लिए एक काजी रखा गया था. ऐसे थे वीर दुर्गादास राठौर.
आज भी उनके सम्मान में ये गया जाता है :
माई एह्ड़ा पूत जन, जेह्ड़ा दुर्गादास.
बांध मुन्दासो रखियो, बिन थाम्बे आकाश.
(माता यदि तुझे पुत्र जन्म देना है तो ऐसा दे जैसा दुर्गादास जिसने अकेले बिना किसी सहायता के मुगलों को इतने दिन बांध रखा)

अंतिम श्वास

सफलता पूर्वक अपना कर्तव्य निभाने और महाराज जसवंत सिंह को दिया वचन पूरा करने के बाद वीर दुर्गादास जोधपुर छोड़ कर कुछ समय सादरी, उदयपुर , रामपुर में रहे और बाद में भगवान महाकाल की आराधना करने उज्जैन चले गये. २२ नवम्बर १७१८ (मार्गशीर्ष शुक्ल ११ , संवत १९७५ ) को ८२ वर्ष कि उम्र में, शिप्रा नदी के किनारे उनका स्वर्गवास हो गया. लाल पत्थर से बना उनका अतिसुंदर छत्र आज भी उज्जैन में चक्रतीर्थ नमक स्थान में शुशोभित है. जो सभी राजपूतो और देशभक्तों के लिए तीर्थ स्थान है . वीर दुर्गादास राजपूती साहस , पराक्रम और वफादारी का एक उज्वल उदाहरण है.

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