देवनारायण का इतिहास | History Of God Devnarayan In Hindi

God Devnarayan History Story In Hindi: देवनारायण की गिनती प्रमुख लोकप्रिय लोकदेवताओं में होती है. देवनारायण बगडावत वंश के थे. वे नाग वंशीय गुर्जर थे जिनका मूल स्थान वर्तमान में अजमेर के निकट नाग पहाड़ था. गुर्जर जाति एक संगठित, सुसंस्कृत वीर जातियों में गिनी जाती है. जिनका आदिकाल से गौरवशाली इतिहास रहा है.

देवनारायण

devnarayan bhagwan history in hindi

समाज में प्रचलित लोक कथाओं के माध्यम से गुर्जर जाति के शौर्य पुरुष देवनारायण के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी मिलती है. देवनारायणजी महागाथा में इनकों चौहान वंश से सम्बन्धित बताया है.

देवनारायण की फड़ के अनुसार मांडलजी के हीराराम, हीराराम के बाघसिंह और बाघसिंह के 24 पुत्र हुए जो बगडावत कहलाए. इन्ही में से बड़े भाई सवाई भोज और माता साडू (सेढू) के पुत्र के रूप में विक्रम संवत् 968 (911 ईस्वी) में माघ शुक्ला सप्तमी को आलौकिक पुरुष देवनारायण का जन्म मालासेरी में हुआ.

देवनारायण पराक्रमी यौद्धा थे. जिन्होंने अत्याचारी शासकों के विरुद्ध कई संघर्ष एवं युद्ध किये. वे शासक भी रहे उन्होंने अनेक सिद्धिया प्राप्त की. चमत्कारों के आधार पर धीरे धीरे वे गुर्जरों के देव स्वरूप बनते गये एवं अपने इष्टदेव के रूप में पूजे जाने लगे. देवनारायण को विष्णु के अवतार के रूप में गुर्जर समाज द्वारा राजस्थान व दक्षिण पश्चिमी मध्यप्रदेश में अपने लोकदेवता के रूप में पूजा होती है.

उन्होंने लोगों के दुखो व संकटों का निवारण किया. देवनारायण महागाथा में बगडावतों और राण भिणाय के बिच रोचक युद्ध का वर्णन है. देवनारायणजी का अंतिम समय ब्यावर तहसील से 6 किमी दुरी पर स्थित देह्माली (देमाली) स्थान पर गुजरा. भाद्रपद शुक्ला सप्तमी को वहीँ उनका देहावसान हुआ था. देवनारायण से पीपलदे द्वारा सन्तान विहीन न छोड़ जाने के आग्रह पर बैकुठ जाने से पूर्व पीपलदे से एक पुत्र बीला व पुत्री बीली उत्पन्न हुई. उनका पुत्र ही देवनारायण जी का प्रथम पुजारी हुआ.

कृष्ण की तरह ही देवनारायण भी गायों के रक्षक थे. उन्होंने बगडावतों की पांच गायें खोजी, जिनमे सामान्य गायों से विशिष्ट लक्ष्ण थे. देवनारायण जी प्रातकाल उठते ही सरेमाता गाय के दर्शन करते थे. यह गाय बगडावतों के गुरु रूपनाथ ने सवाई भोज को दी थी. देवनारायण जी के पास 98000 पशुधन था जब ये देवनारायणजी की गायें राण भिणाय का राणा घेर ले जाता है तो देवजी गायों की रक्षार्थ खातिर राणा से युद्ध करते है और गायों को छुड़ाकर वापिस लाते है.

देवनारायण की सेना में ग्वाले अधिक थे. 1444 ग्वालों का होना बताया जाता है, जिनका काम गायों को चराना और गायों की रक्षा करना था. देवनारायण ने अपने अनुयायियों को गायों की रक्षा करने का संदेश दिया.

इन्होने जीवन में बुराइयों से लड़कर अच्छाइयों को जन्म दिया. आतंकवाद से संघर्ष कर सच्चाई की रक्षा की एवं शान्ति स्थापित की. हर असहाय की रक्षा की. राजस्थान में जगह जगह इनके अनुयायियों ने देवालय बनाए है जिनको देवरा भी कहा जाता है. ये देवरे अजमेर, चितोड़, भीलवाड़ा व टोंक में काफी संख्या में है. देवनारायण का प्रमुख मन्दिर भीलवाड़ा जिले के आसींद कस्बे के निकट खारी नदी के तट पर सवाई भोज में है. देवनारायण का एक प्रमुख देवालय निवाई तहसील के जोधपुरिया गाँव में वनस्थली से 9 किमी दूर स्थित है.

देवनारायण जी की फड़ (Devnarayan ji ki Phad)

सम्पूर्ण भारत में गुर्जर समाज का यह सर्वाधिक पौराणिक तीर्थ स्थल है. देवनारायण की पूजा भोपाओं द्वारा की जाती है. ये भोपा विभिन्न स्थानों पर जाकर गुर्जर समुदाय के मध्य फड़ (लपेटे हुए कपड़े पर देवनारायण जी की चित्रित कथा) के माध्यम से देवजी की गाथा का वाचन करते है.

देवनारायण जी की फड़ में 335 गीत है. जिनका लगभग 1200 पृष्ट में संग्रह किया गया है एवं लगभग 15000 पंक्तियाँ है. ये गीत परम्परागत भोपाओं को कंठस्थ याद रहते है. देवनारायण की फड़ राजस्थान की फडों में सर्वाधिक लोकप्रिय व सबसे बड़ी है.

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