नीति के दोहे अर्थ सहित | niti ke dohe Including the meaning

नीति के दोहे (niti ke dohe) में प्रस्तुत हिंदी दोहे बावजी चतुर सिंह जी की रचना चतुर चिंतामणी से लिए गये हैं. जो इन राजस्थानी कवि की मेवाड़ी हिंदी और ब्रज भाषा के समिश्रण का उत्क्रष्ट उदाहरन हैं. सामान्य लोक व्यवहार से जुड़े इन दोहों में मनुष्य, ईश्वर और संसार के मध्य के सम्बन्ध को समझने में मदद मिलेगी.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

धरम धरम सब एक हैं, पण वरताव अनेक |
ईश् जाणनों धरम हैं, जिरो पन्थ विवेक ||

अर्थ-इस संसार में अनेक धर्म हैं, उन सबका व्यवहार भी अलग-अलग हैं. लेकिन प्रत्येक धर्म का मूल उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति हैं. ईश्वर को जानने का मुख्य मार्ग ज्ञान हैं. व्यक्ति सच्चे ज्ञान के द्वारा ईश्वर को जान सकता हैं प्राप्त कर सकता हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

पर घर पग नी मैल्यो, वना मान मनवार |
अंजन आवै देख नै, सिंगल रो सतकार ||

अर्थ जिस घर में मान-सम्मान नही मिले उस घर में कभी कदम नही रखना चाहिए. व्याहारिक जीवन में देखा जाता हैं,कि रेलवे स्टेशन पर सिग्नल दिखाई नही देता हैं तो इंजन स्टेशन पर नही आता हैं. रेल आने से पूर्व स्टेशन मास्टर सिंग्नल लगाता हैं,जिसे देखकर इंजन प्रवेश करता हैं. जिस प्रकार सिग्नल इंजन का सम्मान हैं तब ही स्टेशन पर आता हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

रेठ फरै चरक्यो फरै, पण फरवा में फेर
वो तो वाड़ हर्यौ करै, यों छुंता रो ढेर ||

अर्थ कुए से पानी निकालने के लिए रहट वैली का उपयोग किया जाता हैं, यह यंत्र उपर से जल की सतह तक जाता हैं. फिर पानी छोटी-छोटी बाल्टियो में भरकर स्वय उपर आता हैं. इसी जल से सिंचाई की जाती हैं, जिससे खेत हरे भरे हो जाते हैं. यह रहट उपर निचे फिरता रहता हैं. इसी प्रकार गन्ना पेरने की चरखी गन्नो के बिच दबकर फिरती हैं. गन्ने का रस निकालकर पात्र में रख देती हैं. तथा छिलकों को निकालकर एक तरफ ढेर निकाल देती हैं, कहने का मतलब यह हैं ,कि रहट और चरखी दोनों उपकरण फिरते हैं परन्तु दोनों के फिरने की क्रिया में अंतर हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

कारट तो केतो फरै, हरकीनै हकनाक |
जीरी व्हे विन्नै कहै, हियै लिफाफों राख ||

अर्थ एक स्थान से दुसरे स्थान पर पत्र भेजने के लिए पोस्टकार्ड और लिफाफे बेहद लोकप्रिय थे. और आज भी हैं. परन्तु व्यवहारिक द्रष्टि से पोस्टकार्ड द्वारा भेजा गया संदेश कोई भी पढ़ सकता हैं. इस कारण इससे संदेश की गोपनीयता नही रहती हैं. क्युकि जिसे हम संदेश देना चाहते हैं. वही पढ़ सकता हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

वी भटका भोगै नही, ठीक समझले ठौर |
पग मेल्या पेला करे, गैला उपर गौर ||

अर्थ जीवन में कुछ प्राप्त करने के लिए समझदारी के साथ-साथ सोच समझकर कार्य करना चाहिए. बिना कुछ कार्य के इधर-उधर भटकने से कुछ भी प्राप्त नही होता हैं. इसलिए हमे स्थान के बारे में पहले से ही अच्छी तरह समझ लेना चाहिए. जैसे किसी राह में चलने से पूर्व रास्ते की जानकारी पता कर लेनी चाहिए. इससे मार्ग की कठिनाइयो का पता चल जाता हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

क्यूं किसू बोलू कठे, कुण कई की वार |
ई छै वाता तोल नै, पछै बोल्नो सार ||

नीति के दोहे अर्थ सहित –इस संसार में व्यवहार करने के लिए हमे बातचीत एक दुसरे से करनी पड़ती हैं, परन्तु बोली एक अमूल्य वस्तु हैं किकिससे कब और कहा क्या बोलना हैं. किसको कब किनती आदि बातों को अपने ह्रदय में पहले से ही तोल लेनी चाहिए. इन बातों के सार को ही कहना चाहिए. निर्थक बाते करने से कोई फायदा नही हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

ओछो भी आछो नही, वतो करै कार |
देन्णों छावै देखनै , अगनी मुजब अहार ||

नीति के दोहे अर्थ सहित=जीवन में किसी वस्तु की सार्थकता या आवश्यकता पर्याप्तता होने पर ही होती हैं. यदि आवश्यकता से कम हैं या अधिक हैं तो उसका विशेष महत्व नही होता हैं. आग को जलती रखने के लिए उसमे आवश्यकता के अनुसार इंधन डालते रहना चाहिए. यदि आवश्यकता से कम ईंधन डालेगे तो आग बुझ जाएगी. आवश्यकता से अधिक डालेगे तो भी वह बुझ जाएगी.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

अपणी आण अजाणता, कईक कोरा जाय |
समझदार समझे सहज, आँख इशारा माय ||

नीति के दोहे अर्थ सहित-इस संसार में बहुत से लोग हैं जो अपनी इज्जत मान-मर्यादा और योग्यता के सम्बन्ध में अनजान रहते हैं. ऐसे बहुत से व्यक्ति व्यर्थ में अपनी जिन्दगी बिताते हैं. समझदार व्यक्ति बहुत जल्दी संकेत के रूप में सारी बात समझ जाते हैं. कि कौन कैसे उसका सम्मान और अपमान करता हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

क्षमा क्षमा सब ही करे, क्षमा न राखे कौय |
क्षमा राखिवै तै कठिन, क्षमा राखिवौ होय ||

अर्थ- इस संसार में सभी व्यक्ति क्षमा के बारे में कहते हैं. अर्थात मनुष्य को क्षमा करने की भावना व क्षमा शीलता का गुण रखना चाहिए. पर व्यवहार में कोई भी व्यक्ति क्षमा या धैर्य नही रखता हैं. क्षमा करने की भावना कठिन धैर्य रखने की क्षमता हैं. अर्थ यह हैं कि धेर्य रखना क्षमा करने से अधिक महत्वपूर्ण हैं. अर्थात क्षमा के पात्र व्यक्ति के गुण दोषों के बारे में चिन्तन आवश्यक हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

विद्या विद्या वेळ जुग, जीवन तरु लिपटात |
पढीबौ ही जल सिंचिबौ, सुख दुःख को फल पात ||

नीति के दोहे अर्थ सहित-विद्या और युग रूपी बेल जीवन रूपी वृक्ष के चारों और लिपटे रहते हैं. लगातार पढने यानि ज्ञान रूपी जल से जीवन रूपी वृक्ष की सीचना चाहिए. जीवन रूपी वृक्ष को सिचने से ही सुख दुःख रूपी फल और पत्ते प्राप्त किए जा सकते हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

रेल दौड़ती ज्यू घणा, रुंख दोड़ता पेख |
तन नै जातो जाण यूँ, दन नै जातो देख ||

नीति के दोहे अर्थ सहित-जब रेलगाड़ी दौड़ती हैं तो हम वृक्षों को दोड़ता हुआ देखते हैं. उसी प्रकार जीवन में समय और दिन जाते हुए देखते हैं. हम समझते हैं, दिन जा रहा हैं वर्ष जा रहा हैं. परन्तु हमे यह सोचना चाहिए, कि दिन व वर्ष नही जा रहे हैं. बल्कि हमारा नश्वर शरीर धीरे-धीरे नष्ट हो रहा हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

गाता रोता निकलया, लड़ता करता प्यार |
अणि सड़क रै उपरे, अब लख मनख अपार |

नीति के दोहे अर्थ सहित-हमने इस संसार में गोते रोते हुए जन्म लिया और एक दुसरे से लड़ते झगड़ते प्यार से जीवन जिया. इसी प्रकार संसार रूपी सड़क पर अनगिनत मनुष्य जीवन जीते हैं,

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

गोख्दिया खड़िया रया, कड़ियाँ झांकणहार |
खडखडिया पड़िया रया, खड़िया हाकनंहार ||

नीति के दोहे अर्थ सहित-उचे-ऊँचे भवन के गोख्ड़े झरोखे तथा सड़क पर चलने वाले तांगे आदि सभी पड़े रह जाते हैं. किन्तु तांगा चलाने वाला चला जाता हैं. उसी प्रकार शरीर से आत्मा तो चली जाती हैं, लेकिन शरीर यही रह जाता हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

गेला नै जातो कहै, जावै आप अजाण |
गेला नै रवै नही, गेला री पेछाण ||

नीति के दोहे अर्थ सहित-इस संसार में कुछ व्यक्ति स्वय अज्ञानी हैं. तथा दुसरो को भी मुर्ख बनाते हैं. एक मुर्ख जाते हुए एक व्यक्ति से कहता हैं. कि वह मुर्ख हैं क्युकि वह सही मार्ग पर नही जा रहा हैं. जबकि आप स्वय जानकार होते हुए भी गलत मार्ग पर जा रहे हैं. वह व्यक्ति गलत मार्ग पर इसलिए जा रहा हैं, क्युकि उन्हें सही राह की पहचान नही हैं. परन्तु खेद तो यह हैं अपने आप को ज्ञान वाँ मानकर गलत राह पर जा रहे हैं.

नीति के दोहे ( niti ke dohe)

धन दारा रै मायने, मती जमारो खोय |
वणी आणि रा वगत में, कूण कणी रा होय ||

नीति के दोहे अर्थ सहित-कवि सांसारिक मनुष्यों को चेतावनी देते हुए कह रहा हैं, कि इस समय संसार में धन-सम्पति पत्नी के बिच रहकर अपना जीवन मत खोवो. कुछ समय भगवान् का भी स्मरण करो. क्युकि कठिन समय में कोई भी व्यक्ति किसी का साथ नही देता हैं.

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