बचपन की यादें निबंध | my childhood essay in hindi

बचपन की यादें निबंध | my childhood essay in hindi

हमारे खाने में प्रायः पकवान बिलकुल नही होते थे और हमारे कपड़ो की सूची यदि देखी जाए तो आजकल के लड़के नाक भौह सिकोड़े बिना नही रहेंगे. दस साल की उम्रः होने के पहले किसी भी कारण से हमने मोज़े और बूट नही पहिने थे. सर्दियों में भी बंडी के उपर एक सूती कुरता पहन लिया कि बस हुआ और उससे हमे गरीबी भी नही मालूम होती थी.

हां हमारा बुढा दर्जी ”स्यामत” अगर बंडी में खीसा लगाने को भूल जाता था तो हमारा मिजाज जरुर बिगड़ जाता था.खीसे में खूब भरने के लिए जिसे कोई चीज न मिली हो, इतना गरीब बच्चा आज तक एक भी पैदा नही हुआ होगा. दयालु भगवान् का इशारा यही मालूम होता है. कि पैसे वालों के बच्चों और गरीब माँ-बाप के बालकों की सम्मति में ज्यादा फर्क न रहे.

हममे हरेक बच्चे को चप्पल की एक जोड़ी मिलती थी लेकिन यह भरोसा नही था कि वह हमेशा पावों में ही रहेगी क्युकि हम उसे पांव से उपर फेकते और झेला करते थे. इस रिवाज से चप्पलों का वास्तविक उपयोग नही होता था, तो भी उनसे कम काम नही पड़ता था.

पहनावा खाना पीना व्यापार बातचीत और मनोरंजन में हमारे बूढ़े लोगों में हममे बहुत फर्क था. बिच बिच में उनके काम हमे दिखलाई पड़ जाते थे. लेकिन वे हमारी ताकत के बाहर होते थे. आजकल के बच्चों के लिए तो माँ बाप आदि बड़ी सहज में मिलने वाली वस्तु हो गई है. और उन्हें वे मिल जाती है ज्यादा क्या?

यह कहना भी ठीक होगा कि आजकल बच्चों को मनचाही चीज आसानी से मिल जाती है लेकिन हमारे जमाने में कोई भी चीज इतनी आसान नही थी. हलकी से हल्की चीज हमारे लिए मुश्किल थी. हम लोग इसी भरोसे दिन निकालते थे कि बड़े होने पर ये सब चीजे मिलेगी.

भरोसा था कि आने वाले दिन इन सब चीजों को संभाल कर रखेगे. इसका नतीजा यह होता था कि हमे जो कुछ मिलता था वह चाहे थोड़ा ही क्यों न हो, उसका हम खूब उपयोग करते थे और उसका कोई हिस्सा भी यों नही जाने देते थे. आजकल तो परिवार खाने पीने से सुखी है.

उनके लडकों को देखो तो मालूम होगा कि जो चीजे उन्हें मिलती है, उनमे से आधी चीजे तो सिर्फ बेकार में ही खो देते है. इस तरह उनकी पूंजी के बहुत बड़े हिस्से का होना न होने के बराबर है. कुछ ऐसी थी हमारी बचपन की यादे

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