भारतीय दर्शन | Indian Philosophy In Hindi

भारतीय दर्शन | Indian Philosophy In Hindi : प्राचीन भारतीय चिन्तन और इसके आयाम परवर्ती भारतीय धारा में बुनियादी महत्व के हैं. वहां प्रकट विचार संकेत तथा ज्ञान धाराओं के बाद वैचारिक क्रम यथावत रही. जब क्रम टूटा तो न केवल वैचारिक परम्परा की श्रंखला टूटी. भारत में पूर्व सन्यालकाल का लगभग ४००-५०० वर्षों का चिन्तन कर्म मनन और अनुशीलन की दृष्टि से अन्धकार युग का सा आभास देता.प्राचीन भारतीय चिंतन | Indian Philosophy In Hindi

भारतीय दर्शन | Indian Philosophy In Hindi


भारतीय दर्शन के अविरल प्रवाह ने फिर सभ्यता संस्कृति तथा समाज व्यक्ति का उत्थान दिखाया जो मुगलकाल में भक्ति, कला साहित्य, विमर्श में प्रचुरता से दिखाई दिया. आधुनिक काल में धर्म से फिर आत्म विद्या का जुड़ाव, मूल्यों की प्रधानता और सामाजिक राजनीतिक संगठन की साध्य से मूल्यवता आदि ने और अधिक उत्कर्षकारी जीवन प्रसंग संयोजित किये.

उस समय वस्तुतः आत्मा की पुनर्खोज चरितार्थ हुई. इस ऐतिहासिक प्रसंग में यह कहा जा सकता है कि प्राचीन चिन्तन के आयाम भारत को उसकी अस्मिता और अस्तित्वगत विशेषताएं देते हैं. इनका विच्छेद भारत को विस्मृति और अचेतना देकर भारतीय समाज के लिए अपकर्षकारी सिद्ध होता हैं. मूल्यों की पुनः संस्कृति और आध्यात्म का पुनरावर्तन तथा श्रेयस की प्राप्ति का पुनः संकल्प भारत को सही अर्थों में आधुनिक बनाता हैं.

आज के इस लेख में भारतीय दर्शन के वैचारिक आयामों का संधान किया जाएगा. इसमें मूल स्वर प्राचीनता से पुनः जुड़ाव का हैं. क्योंकि वैचारिक आयाम भारत को उसकी प्रामाणिक अर्थवता प्रदान करते हैं. ये आयाम भारतीय अस्मिता व अस्तित्व का हैं. कौटिल्य, मनु, व्यास और अन्य कथित प्राचीन विचारक उन विचारों तथा भारतीय दर्शन प्रक्रिया का करते है जो परवर्ती काल में बार बार मुखरित होती हैं.

सम्भवामि युगे युगे जीवन की इसी का संधान करता हैं. यह अकारण ही नहीं है. कि प्राचीन वैचारिक प्रसंगों और महाभारत तथा गीता की आधुनिक काल में भी अभिनव टीकाएँ और प्रतिपादन प्रस्तुत किये. गांधीजी समेत अनेक विचारकों ने इन प्राचीन प्रसंगों को यथाक्रम पुनरुद्दघाटित किया. यह सिलसिला बरकरार रहा.

प्राचीन क्या है (meaning of ancient in hindi)


यदि भारतीय दर्शन धारा में प्राचीन सतत विद्यमान है और वह भी है और तत्काल आधुनिक भी तो क्या उसे प्राचीन कहना प्रासंगिक हैं. क्या प्राचीन के खंडित स्वरूप में कभी भी आधुनिक कहा जा सकता हैं.

भारत में काल की अवधारणा पश्चिम की भांति एक रेखीय नहीं बल्कि चक्रीय हैं. एकरेखीय समय तो प्राचीन मध्य और आधुनिक हो सकता हैं परन्तु चक्रीय में तो काल की बारम्बार पुनरावृत्ति होती ही रहती हैं. काल कभी खंडित, पुरातन और बदली प्रकृति का नहीं होता. वह तो सदैव एक सतत अविच्छिन्न और पुनरावृतक होता हैं. वह पुनर्नवा है. अतः पश्चिम की खंडित और युगीन काल चेतना उस पर लागू हो ही नहीं सकती.

भारतीय मनीषा में काल शाश्वत हैं और कालातीत प्रकृति के साथ उसका साम्य हैं. अतएवं काल न तो प्राचीन है न आधुनिक हैं. वह तो बारम्बार एक सूत्र में बंधा हुआ सतत प्रकट होता रहता हैं. वह सूत्र है शास्व्त्ता, सनातनता और स्थायित्व का सूत्र. प्लेटों के शब्दों में काल शाश्वतता की परिवर्तनशील छवि हैं. इस अर्थ में शाश्वत तत्व प्रधान हैं और काल मात्र उसकी अनुकृति. ऐसी स्थिति में प्राचीन तत्काल आधुनिक हैं और आधुनिक मूल प्रकृति में प्राचीन. प्राचीन भी नहीं बल्कि सतत प्रभावी और अक्षुण्ण. भारतीय दर्शन इस प्रवृति का सजीव उदाहरण हैं.

भारतीयता का अभिप्राय (what is indianism)


भारत यदपि दक्षिण एशिया में स्थित एक देश विशेष हैं. भौगोलिक रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल तथा चीन उसके पड़ोसी देश हैं. भारत का एक गौरवशाली इतिहास हैं. एक स्वर्णिम संस्कृति है उसकी शानदार और व्यवहारशील लोकतांत्रिक प्रणाली हैं. वहां बहुजातीयता और बहुधार्मिकता का बोलबाला है और वहां अनेकानेक विभूतियां बारम्बार अवतरित होकर अपनी देय भूमिकाओं का प्रभावी निर्वहन करती आई हैं.

ये सब यदपि वास्तविकताएं हैं. और इस कारण भारत की प्रामाणिक परिचायक भी परन्तु भारत की भारतीयता इन वास्तविकताओं से सवर्था अछूती है उसकी तो कुछ सुनिश्चित गुणधर्मिता से ही जाना और समझा जा सकता हैं.

भारतीयता अपने मूल में सनातनता है यानि वह सब कुछ जो सतत प्रवाही और प्रभावी हैं. भारतीयता की सनातनता में सब रंग और छवियाँ एकसाथ खिलती खेलती दिखाई देती हैं. कहीं कोई विरोधाभास नहीं हैं. आदर्श और यथार्थ एक साथ है धर्म और विज्ञान समस्थलीय हैं और राजा और महर्षि राजर्षि के रूप में एकसाथ प्रकट होते है. विवेक और कर्म परस्पर मिलकर कर्म कौशल का योग चरितार्थ करते हैं.

योग स्वयं वियोग से जुड़कर योग बनता हैं. और इस प्रकार आभासित विरोधाभासों का भारतीयता के तट पर संगम और समागम होता हैं. हर तत्व बेतरतीब दिखाई देता हैं. पर होता नहीं. जो होता हैं वह और कुछ होने की संभावनाएं छोड़ जाता हैं. इन संभावनाओं की सतत साधना ही जीवन है और इसकी सद्भावी पराकाष्ठा जीवन का उत्कर्षशील सत्य पूर्णमद पूर्णमिदम.

भारतीयता के ये तत्व भारतीय चिन्तन धारा मने सदा प्रभावी रहे हैं. इसी कारण कौटिल्य शक्तिवाद और सामर्थ्य निपुणता के बावजूद कभी मेक्यावली नही हो सका. महाभारत जय विजय का वास्तविक चित्रण करते करते हुए भी अपने मूल कलेवर में सब भूतों को आत्मसात करने का संकल्प परिपूर्ण कर सका. और स्वयं शक्ति सर्वदा नीति और शील का वरण करते हुए दिखाई देती रही.

भारतीय दर्शन के ये तत्व आधुनिक काल भारतीय दर्शन को भी अनुप्राणित करते रहे. इसलिए आधुनिक भारतीय दर्शन में यथार्थवादी आदर्शवाद (Realistic idealism) का प्रासंगिक समावेश हुआ और एक दूसरे के सन्दर्भ में एकात्मवादी बहुलवाद का प्रवर्तन भी. आभासित विरोधाभाषियों का सम्मिलन और सद्भावी रूपांतरण भारतीयता का नैसर्गिक तत्व हैं. इसलिए भारत में परम्परा पश्चिम की ट्रेडिशन नही बल्कि अपना रूप विधान और गुणधर्म लगातार बदलने और पुनर्नवा होने का एक सतत प्रवाही प्रसंग हैं. वास्तव में जो प्रवाही है वह सतत प्रवाहशील रहता है और ठोस पारिस्थितिक कारणों से अक्सर टूटता है और क्षणभंगुर हो जाता हैं.

भारतीय दर्शन के प्रमुख आयाम (Major dimensions of Indian philosophy)


यहाँ आपकों प्राचीन भारतीय दर्शन के आयाम क्या है इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी जाएगी. ये वो आयाम है जो भारतीय दर्शन को सदैव अनुप्राणित अनुप्रेरित करते आए हैं. इसके क्रम में भी प्राचीन भारतीय दर्शन स्थायी है, नितांत भारतीय है और सार्वत्रिक चेतना का परिचायक भी.

धर्म और आध्यात्म (Religion and spirituality)


भारतीय मनीषा में धर्म की धारणा प्रायः कुछ सुनिश्चित नैतिक सिद्धांतों के रूप में की जाती रही हैं. ये वो नैतिक सिद्धांत है जो व्यक्ति और समाज को आधार उपलब्ध करवाते हैं. घ्र धातु से प्रकट धर्म वह तत्व है जो तत्वत धारण करता हैं धारयति इति धर्मः अतएवं व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ज्ञान और कर्म दोनों ही स्तरों पर धर्म अपनाए.

वैयक्तिक धर्मपरायणता सकल रूप से धर्म की सामाजिकता का निर्वाह करती है. श्रीमद्गीता में धर्म का रहस्य ह्रदय की नैतिक विवेचना में निहित बताया गया हैं. गीता के अनुसार धर्म न केवल नैतिक सिद्धांतों का जीवनपरक संधान है बल्कि वह जीवन में व्यवहार का नियामक भी हैं. इस रूप में धर्म सार्वत्रिक है और जहाँ धर्म है वहीँ विजय है जीवन की सार्थकता धर्म से ही साकार होती हैं.

भारतीय दर्शन में धर्म तत्व और उसका सार सतत विचारणीय रहा हैं. जीवन मूल्यों स्रजनधर्मिता, जीवन के उत्कर्ष, साध्य साधन, सम्पन्नता, लोकनीति के, दंड विधानों आदि के सन्दर्भ में धर्म व्याख्याओं ने भारतीय दर्शन को नित नयें आयाम किये हैं. इस सन्दर्भ में प्राचीन और आधुनिक भारतीय दर्शन में कोई भेद नहीं हैं. जहाँ अर्थशास्त्र का लौकिक पक्ष धर्म से अनुप्राणित है वहीँ तिलक, विवेकानंद, गांधी जैसे विचारक भी अपने अपने वैचारिक संदर्भों में धर्म का अनुशीलन करते रहे हैं.

अध्यात्म विद्या की भारतीय परम्परा काफी सम्रद्ध रही हैं. भारत में ज्ञानी उसे माना जाता है जो वास्तव में आत्म ज्ञानी है. आत्म ज्ञान से अंतर्दृष्टि प्रदीप्त होती हैं. ज्ञानी की यह प्रतिमा न पुस्तकों के बोझ से दबे हुए शास्त्री की हैं न उपकरणों से लैंस की. यह प्रतिमा है आत्म साक्षात्कार तक पहुचे हुए जीवनमुता पुरुष की जिसका ज्ञान सामग्री पर निर्भर नहीं करता, न भौतिक न सामाजिक. इसी परम्परा को जीवित रखते हुए महात्मा बुद्ध ने अपने अंत समय में व्याकुल अपने भाई मित्र और शिष्य आनन्द को सलाह दी थी अप्प दीपो भव.

आध्यात्म विद्या सरल अर्थों में अपने आप के संज्ञान और तदुपरात आत्म सिद्धि की साधना हैं. यह साधना जीवनपर्यन्त चलती रहती हैं. इस साधना की प्रक्रिया में अनंत के आत्मोकर्ष के अनुरूप सीमित अनुभव्यता का समायोजन होता हैं. अर्थात इन्द्रियजन्य अनुभवों का सतत अतिक्रमण, उनसे आगे सतत यात्रा और उस कर्म में विभिन्न अनुभव सौपानों को पाते और छोड़ते हुए परमार्थ का उतरोतर स्पष्ट होता संज्ञान.

आत्म ज्ञान और आत्म सिद्धि कोई घटना या उपलब्धी नही बल्कि एक अनंतिम व्रती है जो साधक की साधना से लगातार जोड़े रखती हैं अभीष्ट परमार्थ या अंतिम यथार्थ है और उसकी ओर सतत प्रयाण जीवन का संकल्प. व्यक्ति की चेतना इस प्रयाण का माध्यम है और उतरोत्तर बढ़ते हुए स्वयं वैयक्तिक चेतना का भी अतिक्रमण करना होता हैं. ताकि सर्वचेतना से जुड़ा जा सके. स्वयं सर्वचेतना अरूप अव्यक्त तथा अनुपमेय होती हैं. यह कभी न समाप्त होने का यात्रा क्रम व्यक्ति का सतत परिमार्जन और परिष्कार करता हैं. इससे सम्पन्न व्यक्ति आत्म बोध से प्रकाशित और सतत उत्कर्षशील होता है.

अपने आप से पहचान का दायरा बढ़ते बढ़ते उसे यथार्थ के बेहद करीब तो लाता है परन्तु जितनी नजदीकी होती है उतना ही यह मह्सूस होता है कि मंजिले अभी और हैं आसमान की और थाह पानी हैं. और अधिक ऊँची उड़ान अभी बाकी हैं. जीवन इस सतत साधना को समर्पित रहता हैं. वह चुक जाता है पर साधना फिर भी शेष रह जाती हैं.

यथार्थ के इस संधान से स्वयं जीवन और अस्तित्व का जुड़ा होता हैं. दोनों एक दूसरे को थामे पकड़े बढ़ते जाते हैं. इसीलिए भारत में आदर्श और यथार्थ के बीच कहीं कोई द्वंद नहीं हैं. भारत में यथार्थवादी आदर्शवाद और व्यवहारिक आदर्शवाद की संकल्पनाएं होती आई हैं. जैसे बहती नदी में नौकायन दो चप्पुओं के सहारे किया जाता हैं. उसी प्रकार जीवन वैतरणी को पार करने के लिए आदर्श और यथार्थ दो चप्पू बन कर चरितार्थ होते हैं. उनके सहारे जीवन नैया ठिकाने लगाई जाती हैं.

प्राचीन भारतीय दर्शन क्रम में आध्यात्मवादी संवेग सदैव उपस्थित रहे हैं. महाभारत, अर्थशास्त्र या मनुसंहिता आत्म ज्ञानी संवेदनशीलता का प्रतिनिधित्व करते हैं. लौकिक उपलब्धि महत्वपूर्ण हैं. परन्तु व्यापक जीवन सत्य में यह आत्मक्रमोन्नति ही रहती हैं. उसको लाघना ही होता हैं. ताकि आत्म चेतना से प्रकट यथार्थ बोध व्यक्ति को उसके मूल अस्तित्व कारण से जोड़ सके. केवल तभी सांसारिक या लौकिक उप्लबधियाँ सहायक हो सकती हैं. अन्यथा वे दुर्लभ्य अवरोध बन कर स्वयं चेतना यात्रा को ही भंग कर देगी. उनके प्रति सचेत आग्रह अपरिहार्य हैं. इसी चेतना को आधार बनाकर गांधीजी ने स्वयं राजनीति के आध्यात्मीकरण पर बल दिया ताकि उससे जन चेतना और तदन्तर जनोत्कर्ष चरितार्थ हो सके.

भारतीय दर्शन का स्वरूप (Characteristics of Indian philosophy)


भारत में दर्शन सिर्फ फिलोसोफी नहीं है क्योंकि फिलोसोफी मूलतः बुद्धि व्यापार और तार्किक निर्मितियों की एक सुव्यवस्थित व्यवस्था मात्र ही हैं. फिलोसोफी के विषय में प्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक के सी भट्टाचार्य का यह आकलन विचारणीय हैं. तर्क और ज्ञानमीमांसा समेत फिलोसोफी न केवल वास्तविक ज्ञान ही नहीं हैं बल्कि वह शब्दतः भारतीय दर्शन भी नहीं है फिर भी उसकी विषयवस्तु को विशवासपूर्ण ऐसा सत्य माना जाता हैं. जैसे इस सत्य के सहारे पूर्ण सत्य जाना जा सकता है. आधुनिक पाश्चात्य फिलोसोफी को तीन विकट कमियों से ग्रस्त माना जाता हैं.

  1. उसमें अंतर्निहित रूप से तत्व मीमांसा के विरोध की प्रवृति विद्यमान हैं.
  2. वह प्रबल रूप में एनेलिसिस को समर्पित हैं. सिंथेसिस को नहीं और
  3. फिलोसोफी का व्यवहारिक जीवन से सम्बन्ध टूट सा गया हैं.

भारत में फिलोसफी वास्तव में दर्शन हैं उसमें देखना प्रमुख हैं. देखते समय बोलना जरुरी नहीं होता हैं. इसलिए दर्शन देखने के कर्म में छवियाँ और संकल्पनाएं तो सुझा सकता हैं पर उन सब का संवेग दर्शन को और सूक्ष्म दर्शन क्षमता से युक्त कराना होता हैं. जिससे दृष्टि अन्तः सजीव अंतदृष्टि बन सके. इस अंतदृष्टि से उपजे प्रसंग बाद में दर्शन को अंतदृष्टि से समायोजित करते हैं. भारत में दर्शन पर्यवेक्षण आधारित तार्किक दृष्टि नहीं बल्कि अंतदृष्टि युक्त समझ से बाह्य को आभ्यांतर विषय बनाने की विधा है ताकि समूची दर्शन प्रक्रिया अंतज्ञान को समायोजित कर सके.

फिर दर्शन तत्काल द्रश्य और दृष्टा से सयुक्त होता हैं. द्रश्य दर्शन और द्रष्टा तीनों में द्रष्टा सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं. क्योंकि द्रष्टा स्थायी है जबकि द्रश्य और दर्शन परस्पर अनुल्म्बित और उस कारण सतत परिवर्तनशील. दृष्टा भाव का स्थायित्व दृश्य और उसके दर्शन का आधार बनता है द्रष्टा की अंतचेतना दर्शन को उसकी अर्थवता प्रदान करती हैं भारतीय दर्शन में सत्य की निर्मित्ति नहीं होती, उसका केवल संधान होता हैं क्योंकि वह तो स्वयं उपस्थित होता हैं. दार्शनिक प्रयास तो केवल उस अविधा का आवरण हटाने का उपक्रम करते है जो त्रुटी और संशय का कारण बनता हैं.

भारत में दर्शन का पारसमणि जीवन है. विज्ञान, धर्म तथा कला में परिव्याप्त समस्त गतिविधियां इस अनुभूति को समर्पित हैं. कि ब्रह्मांड न केवल एक विचार है बल्कि उसमें अन्तः सोचने और होने, ज्ञान और अस्तित्व में कोई भेद नहीं हैं. सब के रूप में स्वयं की परमानुभूति खोजता है और सब को स्वयं में प्रतिबिम्बित पाता है. ऐसा देखने समझने के बाद लगातार देखते रहना जरुरी नहीं रह जाता हैं. दर्शन के बाद आँखे मूद्नी भी होती है ताकि फिर से दृश्य पर नई नजर डाली जा सके और द्रष्टा भाव को और प्रगाढ़ किया जा सके.

भारतीय जीवन शैली और जीवन मूल्य (Indian lifestyle and life value)


भारतीय जीवन शैली अपनी संस्कृति के व्यापक परिवेश में सृष्टि की विविधता और उस विविधता में एकता परिलक्षित करती हैं. भारत में अनेक मत, विश्वास मान्यताएं सामाजिक सांस्कृतिक समूह इत्यादि एक साथ जीवन यापन करते आए हैं. इस क्रम में उनमें मत मतान्तर, संघर्ष सामजस्य इत्यादि एक साथ चरितार्थ होते रहे हैं. पर अन्तः समाज की साव्यिक एकता ही चरितार्थ होती आई हैं.

भारतीय जीवन अपने क्रम में सतत सनातनता खोजता है और रास्ते ही हर रूकावट का इस क्रम में अतिक्रमण करता है. समाज व्यक्ति से बड़ा है पर बड़े में छोटा दायरा अपने आप आ जाता हैं. बड़े के लिए छोटा मिटने को तैयार रहता है तो बड़ा छोटे को मिलाकर उसमें तत्वों को पुनः संयोजित कर लेता हैं. व्यक्ति परिवार के लिए, परिवार ग्राम के लिए, ग्राम शहर के लिए, शहर राज्य के लिए राज्य राष्ट्र के लिए तत्पर हैं.

पर उतना ही सच यह भी है कि राष्ट्र सभी को समेकित करता हैं. वह सब बन कर ही एक और अभिन्न हो सकता हैं. भारत की समरसता इसकी हमेशा उसकी उत्तरजिविता देती आई हैं. भारतीय दर्शन में ये जीवन मूल्य बारम्बार प्रकट हुए और पुनः अभिव्यक्त होते आए हैं. श्री अरविन्द प्रणीत जटिल साम्प्रदायिकता स्वतंत्रता तथा महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित अस्तित्व का सामुद्रिक वृत रूप इन्ही मूल्यों और सामाजिक आदर्शों को समर्पित हैं.

आनन्द कुमारस्वामी जीवन कला, स्रजनधर्मिता तथा सौन्दर्य सिद्धांत प्रतिपादनों में इन्ही जीवनशैलियों आदर्शों तथा मानकों के पक्षधर थे. उनके राष्ट्रीय आदर्शवाद विषयक लेख इन्ही मूल्यों के संधान का उदाहरण हैं.

जीवन और ज्ञान की समग्रता (Totality of life and knowledge)


भारत में जीवन और ज्ञान दोनों परस्पर पूरक है और व्यवहारिक और तात्विक अंतराव्लम्बन व्याप्त है. इन अन्तरावलम्बनों को निम्न क्रम में प्रस्तुत किया जा सकता हैं.

  1. ज्ञान से समग्र जीवन और उसकी नियामक सहज एकात्मक मिलती है.
  2. ज्ञान से कर्म प्रकाशित होता है और कर्म से कर्तव्य निर्धारित हैं.
  3. कर्तव्य से संसार के उतार चढ़ाव से परित्राण मिलता है.
  4. जीवन में उतार चढ़ाव से परित्राण सार्वभौमिक भाव उपलब्ध है जो जीवन को और अधिक उन्नत करता है.
  5. भक्ति कर्म और ज्ञान दोनों सममोंन्त करती हैं. उससे सार्वभौमिक भाव और परिपुष्ट तथा स्थायी बनता है.

भारत में भगवतगीता और उसके पुनरावर्ती भाष्य लगातार ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रयी उद्घाटित करते आए है. हर भाष्य यदपि इनमे से किसी एक की प्रधानता प्रकट करता है परन्तु सत्य को यह है कि ये तीनों एक साथ ही चरितार्थ हो सकते है. गीता तीनों को आत्मसात करके ही योगशास्त्र का दर्जा उपलब्ध कर पाता हैं.

भारतीय दर्शन के राजनीतिक निहितार्थ (Political implications of Indian philosophy In Hindi)


यहाँ हमने भारतीय दर्शन के विविध आयामों के बारे में जानकारी प्राप्त की हैं. आपकों यह ज्ञात हुआ है कि भारतीय दर्शन मूलतः धार्मिक और आध्यात्मिक हैं. धर्म और आध्यात्म मिलकर व्यक्ति को उसकी आत्म चेतना और कर्तव्य बोध कराते है और इस क्रम में जीवन अपने आत्म तत्व से परिपुष्ट होता है, उसे उसका अभीष्ट अस्तित्व कारण उपलब्ध पाता हैं. दर्शन से जीवन को एक और सब में सद्भाव स्थापित करने की क्षमता मिलती है.

अन्तदृष्टि बढकर विश्व दृष्टि हो जाती है. धर्म आध्यात्म और दर्शन मिलकर जीवन को ज्ञान कर्म और भक्ति से सराबोर करते हैं. गीता में वर्णित और उससे उद्घाटित यह त्रयी जीवन को और सम्पन्न बनाती है उसे उसका अस्तित्व कारण उपलब्ध करवाती है. इस खंड में जीवन में उपलब्ध सम्पन्नता के उन राजनीतिक निहितार्थों का निरूपण किया जाएगा जो भारतीय दर्शन धारा को उसके सांस्कृतिक राजनीतिक मानकों को सदैव आलोकित विश्लेषित करते आए हैं.

राजनीतिक भारतीय दर्शन में संस्कृति और आध्यात्म की भूमिका (Role of Culture and Spirituality in Political Indian Philosophy)


भारत में राजनीतिक भारतीय दर्शन और राजनीतिक विमर्श अपने आप में स्वतंत्र नहीं बल्कि सांस्कृतिक नियामकों के अधीन चरितार्थ होता है. जीवन के मननशील और वैचारिक प्रेरक तत्व उसके देनदिन क्रियात्मक पक्षों को निर्देशित करते हैं. राजनीति अपने आप में यथेष्ट नहीं वह अच्छाई की राजनीति बनकर सार्थकता पाती है. संस्कृति से ही व्यक्ति और समाज अपने संस्कार और आधार व्यवहार पाते है. और इस कारण वह राजनीति को उसकी प्रिचालनात्म्क ऊर्जा और संवेग प्रदान करती हैं.

आध्यात्म की दृष्टि से संस्कृति और जीवन अपने अस्तित्व और यथार्थ के समीप आते है उससे विवेक और ज्ञान की वैक्तिक और सामाजिक प्रतिस्ठा संभव हो पाती हैं. जो जानता है वहीँ कुछ कर सकता हैं. जानना आध्यात्म और संस्कृति में सम्पन्न होता हैं. जबकि कुछ करना सामाजिक राजनीतिक संगठन और नेतृत्व से चरितार्थ होता है. इस दृष्टि से जान कर करना ही कर्म की प्रमाणिकता का परिचायक हैं. जो जानते है वहीँ कुछ कर सकते हैं. इसलिए राजर्षि भारत में प्रतिष्ठित रहे और महात्मा आत्माओं का नायकत्व कर सके.

वास्तव में ज्ञान की वास्तविकता से प्रकट तत्वमीमांसा सिद्धांत भारत में सामाजिक संगठन के प्रथम सिद्धांत रहे हैं. और वास्तविक सामाजिक राजनीतिक संगठन प्रसंग उनकी अनुकृति के द्वितीयक सिद्धांत इसीलिए भारतीय जीवन प्रसंगों में कर्म प्रधान नहीं बल्कि अनुगामी हैं. प्रधानता विवेक और सुबुद्धि को प्राप्त हैं. जीवन संग्राम में योगेश्वर कृष्ण सारथी हैं और अर्जुन धनुर्धारी. धनुष वहीं और उसी दिशा में चलेगा जहाँ सारथी रथ पहुचाएगा. तभी कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र बन सकेगा.

आशा करता हूँ दोस्तों Indian Philosophy In Hindi का यह लेख आपकों अच्छा लगा होगा. यदि भारतीय दर्शन के बारे में यहाँ दी गई जानकारी आपकों अच्छी लगी हो तो प्लीज इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करे.

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