महाराणा प्रताप का इतिहास | Maharana Pratap History In Hindi

Maharana Pratap History In Hindi वो आजादी का रखवाला महाराणा प्रताप ही थे जिन्होंने अपनी मायड धरा मेवाड़ की स्वतंत्रता की खातिर जीवनभर संघर्ष करते रहे, मगर कभी मुगलों की गुलामी को स्वीकार नही किया. राजस्थान के महान सपूतों में महाराणा प्रताप का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है. राजीय एशो आराम की बजाय जंगल में भूखे प्यासे भटकने वाले महाराणा प्रताप अपने और मेवाड़ धरा के स्वाभिमान के रखवाले थे. इनका पूरा नाम maharana pratap singh था.यहाँ पर हम rana pratap singh story, history, fights,death और family tree पर बात करेगे.

महाराणा प्रताप का इतिहास (Maharana Pratap History In Hindi)

महाराणा प्रताप (प्रताप सिंह) का जन्म मेवाड़ के कुम्भलगढ़ किले में 9 मई 1540 हिन्दू कैलेडर के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष तृतीया) को हुआ था. यह किला उदयपुर शहर से 85 किलोमीटर दूर है. वे अपने पिता के सबसे बड़े पुत्र थे.

उनकी माँ महारानी जसवंताबाई थी. उनके पिता उदयपुर शहर के संस्थापक महाराजा उदयसिंह थे. प्रताप सिंह बचपन से ही बहुत बहादुर और साहसी थे. पूरा राज दरबार और मेवाड़ राज्य की जनता उनकी कुशलता और बहादुरी पर गर्व किया करती थी.

बहुत ही कम समय में इन्होने घुड़सवारी, अस्त्र-शस्त्र विद्या में श्रेष्ठता हासिल कर ली. मात्र सत्रह वर्ष की आयु में ही महाराणा प्रताप की शादी अजबदे पंवार नामक सुकन्या से हो गई, जो प्रताप की पहली पत्नी थी. वर्ष 1559 में इन्हें अमरसिंह के रूप में पुत्र धन की प्राप्ति हुई.

1567 में जब प्रताप मात्र 27 साल के थे उस समय अकबर की मुग़ल सेना ने चित्तोड़ पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया. किला छीन जाने से प्रताप सिंह अपने पूरे परिवार सहित कुम्भलगढ़ से गोगुन्दा आ बसे.

उसी समय प्रताप ने मुगलों से लोहा लेने की ठान ली थी, मगर बड़े लोगों द्वारा स्थति को पक्ष में न देखकर महाराणा प्रताप को युद्ध करने से रोका.

महाराणा प्रताप का राजतिलक (महाराणा प्रताप की कहानी)

सन 1572 में मेवाड़ के शासक व प्रताप के पिता उदयसिंह का निधन हो गया था. अब उनके उतराधिकारी के रूप में जगमाल को राजगद्दी पर बिठाया गया. जो महाराणा प्रताप की तुलना में किसी भी लिहाज से इस पद के योग्य नही थे. इस बात से पूरा राजदरबार, परामर्श दाता व मंत्री भी सहमत थे.

अत: महाराणा प्रताप को राज गद्दी पर बिठाने के लिए शाही दरबारियों व बड़े कुलीन व्यक्तियों ने जिद ठान ली. सभी के इस स्वर में विरोध के कारण जगमाल को राजगद्दी से उतारकर गोगुन्दा में ही महाराणा प्रताप का राजतिलक कर उन्हें मेवाड़ का अगला शासक नियुक्त किया गया.

प्रताप और अकबर के मध्य युद्ध (Maharana Pratap And Akbar Fight In Hindi)

जिस समय राणा प्रताप ने मेवाड़ की सता सम्भाली उस समय दिल्ली सल्तनत पर मुगलों का अधिकार था. अकबर ने अपने युद्ध पराक्रम से उत्तरी भारत के सभी राज्यों समेत राजपूताने पर भी अधिकार जमा लिया था. अपने धर्मप्रचार व हिन्दू धर्म विरोधी नीतियों के चलते प्रताप और अकबर के बिच शुरू से ही कटुतापूर्ण व्यवहार रहे.

महाराणा प्रताप ने कभी भी अकबर को भारत का शासक नही माना, कई संधियों और समझौतों के प्रयासों के बावजूद अकबर प्रताप के साथ समझोता नही कर पाया. इसलिए अकबर ने मेवाड़ पर हमला करने के लिए सेनापति मानसिंह के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी.

मानसिंह एक विशाल सेना लेकर चित्तोड़ की तरफ रवाना हुआ, इस बाद का पता महाराणा को पूर्व में लग चूका था. अतः महाराणा प्रताप  ने हल्दीघाटी के दर्रे पर मुग़ल सेना का इन्तजार किया. गोगुन्दा तक पहुचने का यह एकमात्र रास्ता था. इस कारण प्रताप को यकीन था. शाही सेना इसी रास्ते से आएगी.

18 जून 1576 को भारतीय इतिहास का सबसे एतिहासिक युद्ध जिन्हें हल्दीघाटी का युद्ध कहा जाता है लड़ा गया. संख्या बल में कम होने के उपरान्त भी महाराणा प्रताप की सेना बहादुरी से लड़ी. इस युद्ध में महाराणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक घायल हो गया, प्रताप के मैदान छोड़ने के कारण राजपूत सेना का मनोबल गिर गया और परिणामस्वरूप हार का सामना करना पड़ा.

महाराणा प्रताप ने मंत्री भामाशाह की आर्थिक मदद से विशाल सेना का निर्माण किया. कुछ ही समय में महाराणा ने शाही सेना को चितोड़ से भगाकर मेवाड़ को स्वतंत्र करवा लिया.

महाराणा प्रताप की मृत्यु कैसे व कब हुई (How and when the death of Maharana Pratap)

एक शिकार की घटना में शरीर पर अधिक चोटे लगने के कारण प्रताप बीमार पड़ गये. 29 जनवरी 1597 को 57 साल की आयु में महाराणा प्रताप का देहांत चावंड में हो गया था. महाराणा के देहवसान (मृत्यु) की खबर सुनकर सवर्त्र शोक की लहर फ़ैल गईं.

सम्पूर्ण मेवाड़ में सामान्य जन से लेकर प्रमुख लोग चावंड में एकत्रित हो गये. युवराज अमरसिंह ने विधि विधान के साथ चावंड से तीन किमी दूर बड़ोली के तालाब पर प्रताप का दाह संस्कार किया.

प्रताप की सुप्रसिद्ध जीवनी व इतिहास को उदयपुर के प्रताप गौरव केंद्र में सहेजकर रखा गया है. जहाँ रोजाना हजारों की संख्या में लोग आकर एक महान महापुरुष की जीवनगाथा को निशुल्क पढ़ते है.

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