महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन | Maharashtra Bhakti Movement In Hindi

Maharashtra Bhakti Movement In Hindi: महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम और समर्थ गुरु रामदास जैसे संत हुए. यही पर सखूबाई नामक महिला और चोखामेला का परिवार भी लोकप्रिय था. महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन के काल में पंढरपुर नामक स्थान की बहुत बड़ी मान्यता थी. यहाँ आकर भक्तगण विट्ठल की पूजा करते थे. विट्ठल को विष्णु का रूप माना जाने लगा. यहाँ भी अनेक जाति और समुदायों के लोग इकट्ठे होकर अपने आराध्य की भक्ति करते थे. आजकल तो पंढरपुर की यात्रा पर हजारों लोग हर साल पैदल चलकर जाते हैं. इन संतों के विचार आज भी समाज में जीवित हैं. भक्ति धारा से सम्बन्धित स्थानों पर आज भी बड़ी तादाद में यात्रा करने के लिए जाते हैं.

महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन (Bhakti Movement In Maharashtra)महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन | Maharashtra Bhakti Movement In Hindi

राज्य में भक्ति आंदोलन को फैलाने का कार्य मुख्य रूप से दों पंथों द्वारा किया गया था. वारकरी सम्प्रदाय जो कि पंढरपुर के विट्ठल भक्तों का पन्थ था, दूसरा धरकरी सम्प्रदाय जिसके अनुयायी भगवान श्री राम को अपना आराध्य देव मानकर पूजा करते थे.

महाराष्ट्र के भक्त सन्त saints of maharashtra information

सन्त काल
नामदेव 1270-1350 ई.
ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) 1271-1296 ई.
एकनाथ 1533-1598 ई.
तुकाराम 1599-1650 ई.
रामदास 1608-1681 ई.

महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन के मुख्य संत (bhakti movement saints)

  • बहिनाबाई– ये महाराष्ट्र राज्य में भक्ति आंदोलन की मुख्य संत महिला थी, जो तुकाराम जी को अपना गुरु मानती थी. इनके बारे में अधिक वर्णन उपलब्ध नही हैं.
  • ज्ञानेश्वर या ज्ञानदेव (1271-1296 ई.)– इन्हें महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का प्रवर्तक माना जाता हैं. इन्होने मराठी भाषा में ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका) नामक टीका लिखी थी.
  • नामदेव (१२७०-१३५० ई.)– संभवत ये ज्ञानेश्वर के शिष्य थे. इन्होने महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाया, ये जाति से दर्जी थे तथा प्रारम्भ में डाकू थे. इन्होने ब्राह्मणों को चुनोती दी तथा जाति प्रथा, मूर्ति प्रथा तथा आडम्बरों का विरोध किया. इनके कुछ पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं.
  • रामदास- इन्होने परमार्थ सम्प्रदाय की स्थापना की. ये शिवाजी के समकालीन थे तथा शिवाजी पर इनका अच्छा प्रभाव था. इन्होने द्शाबोध नामक ग्रंथ की रचना की और कर्मयोग पर जोर दिया.

महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का प्रभाव

  1. भक्ति आंदोलन के कारण प्रांतीय भाषाओं और साहित्य का विकास हुआ, जो मराठी भाषा के लिए भी महत्वपूर्ण दौर था.
  2. हिन्दू मुसलमानों के मध्य प्रेमभाव उत्पन्न हुआ और वैरभाव कम हो गया.
  3. लोगों में धर्म के प्रति सहिष्णुता की भावना उत्पन्न हुई.
  4. सामाजिक कुरूतियों एवं अंधविश्वासों में कमी आई.

भक्ति आंदोलन के प्रमुख मत एवं उनके प्रवर्तक

  • अद्वैतवाद- शंकराचार्य
  • विशिष्टाद्वैतवाद- रामानुजाचार्य
  • द्वैताद्वैतवाद- निम्बार्काचार्य
  • शुद्धादैवतवाद- वल्लभाचार्य
  • द्वैतवाद- माधवाचार्य

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