मिलावट का रोग पर निबंध | Adulteration Essay in Hindi

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मिलावट का रोग पर निबंध Adulteration Essay in Hindi

मिलावट का रोग पर निबंध Adulteration Essay in Hindi

प्रस्तावना– पहले एक फ़िल्मी गीत बजा करता था.

खाली की गारंटी दूंगा, भरे हुए की क्या गारंटी
ना जाने किस चीज में क्या हो, गर्म मसाला लीद भरा हो.

आज खाद्य पदार्थों में मिलावट एक धंधा बन चुका हैं. ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे ग्राहक निश्चिन्त होकर खरीद सके. मुनाफे में अंधे समाज के शत्रु मिलावट कर्ताओं ने आदमी की जिन्दगी को दांव पर लगा दिया हैं.

मिलावट का यथार्थ रूप- आज ऐसी कोई वस्तु बाजार में नहीं मिलती जिसे शुद्ध कहा जा सके, दूध में पानी, घी में डालडा मसालों में पत्थर का चूना, धनिये में घोड़े की लीद, काली मिर्च में पपीते के बीज, यूरिया से निर्मित जहरीला दूध आदि बाजार में खाद्य पदार्थों में मिलावट के इतने रूप मिल जाएगे कि उपभोक्ता अधिक पैसा देकर भी शुद्ध वस्तु प्राप्त नहीं कर सकता.

व्यापारियों की अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति ने ही हमारे देश पर नकली महंगाई थोप दी हैं. इससे कम धन कमाने वाला व्यक्ति अपना पेट पालन करने में भी असमर्थ हो गया हैं. सरकार में बैठे लोग इस प्रकार की नीतियाँ बना देते हैं. जिससे वस्तुएं महंगी हो जाती हैं और महंगी वस्तुओं में मिलावट करने में अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता हैं.

मिलावट और समाज- भारतीय समाज पहले धर्म पर अटूट विश्वास रखता था. वह मिलावट, कम तौलना अथवा झूठ बोलना ठगने को पाप समझता था. लेकिन धर्म की लाठी ज्यों ज्यों कमजोर होती जा रही हैं. मानव उतना ही बेईमान होता जा रहा हैं. आज भ्रष्टाचार द्वारा धन कमाना एक तरह का चलन हो गया हैं. सामाजिक कार्यों में धन दान करके कोई भी घोर मिलावटीयाँ सम्मान का पात्र बन जाता हैं.

उसका नाम भामाशाहों में गिना जाता हैं. उनका सार्वजनिक अभिनन्दन होता हैं. लड़के लड़कियों के विवाहों के अवसर पर ऐसे लोग पानी की तरह पैसा बहाते हैं. छोटी मोटी बीमारियों के इलाज बेतहाशा धन खर्च किया जाता हैं.   धार्मिक कथाएँ,   भंडारे, जगराते और मूर्तियाँ लगवाने या मंदिर बनवाने के लिए मुक्तहस्त से पैसा दिया जाता हैं. समाज ऐसे लोगों का सम्मान करता हैं. तो एक तरह से वह उनकी मिलावट, धोखाधड़ी और ठगी को सामाजिक मान्यता प्रदान कर रहा हैं. अतः समाज मिलावट को रोकने में सक्षम नहीं हैं.

मिलावट और सरकार- समाज की तरह सरकार भी इन मिलावटियों का ही साथ देती हैं. कानून तो सख्त बनाए जाते हैं. लेकिन उसकी नीयत इन कानूनों का कड़ाई से पालन करवाने कि नहीं हैं परिणामस्वरूप मिलावट करने वाले एशो आराम की जिन्दगी जी रहे हैं और गरीब जनता उस मिलावटी सामान का उपभोग करने को मजबूर होती हैं.

राजनेताओं को चुनाव लड़ने के लिए चंदा चाहिए, अफसर और अन्य कर्मचारियों को गलत काम को सही करने के लिए रिश्वत चाहिए. फिर जनता मिलावटी वस्तुओं को खाकर बीमार पड़ती हैं तो उनकी बला से. इस प्रकार कुएँ में भांग पड़ी हुई हैंहर व्यक्ति अपनी तरह से उस नशे का आनन्द ले रहा हैं. परिणाम सिर्फ गरीब के हिस्से में आया हैं. अतः मिलावट रूकने का नाम नहीं ले रही हैं. कम मेहनत से ज्यादा धन कमाना आज मानव का स्वभाव बनता जा रहा हैं.

उपसंहार- मिलावट की समस्या दिन पर दिन जटिल से जटिलतर होती जा रही हैं. नेता, अफसर, कर्मचारी और व्यापारिओं की सांठ गाँठ से जनता घाटे में रह रही हैं. वस्तु के लिए पूरी कीमत खर्च करके भी उसे सही और शुद्ध वस्तु नहीं मिल पा रही हैं. समाधान सिर्फ सामाजिक चेतना हैं. जनता जागृत हो, संगठित हो, आंदोलन और हड़ताल करे तभी इस भयानक बीमारी से निजात पाई जा सकती हैं. सरकार और नेताओं के भरोसे इस समस्या का कोई समाधान सम्भव नहीं हैं.

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