राजस्थान के प्रमुख मेले निबंध | Rajasthan Fairs In Hindi

Rajasthan Fairs In Hindi (राजस्थान के प्रमुख मेले निबंध):- मेले का अर्थ (Meaning of fair), राजस्थान के प्रमुख मेले (Major Fairs of Rajasthan), मेलों का सामाजिक महत्व (Social importance of fairs), मेलों की आवश्यकता (Fairs and Festivals of Rajasthan), मेलों का पर्यटन पर प्रभाव (Impact of fairs on tourism).

राजस्थान के प्रमुख मेले निबंध | Rajasthan Fairs In HindiRajasthan Fairs In Hindi

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Short Essay On Rajasthan Fairs In Hindi Language In 400 Words

मेले का अर्थ (Meaning of fair)

मेला ‘मेल’ शब्द से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, मिलना. किसी पूर्व निर्धारित स्थान पर बच्चें, युवा-युवतियाँ, अधेड़, वृद्ध, स्त्री, पुरुष किसी अपेक्षित उपलक्ष्य में आनन्द के साथ उत्साहित होकर एक दूसरे से मिलते है.

और आपस में मिलकर मनोरंजन करते है, उसकों मेला कहा जाता है. मेलों का सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व है.

राजस्थान के प्रमुख मेले (Major Fairs of Rajasthan)

राजस्थान में विशेष धार्मिक पर्वों पर तीर्थ स्थानों पर मेले निर्धारित समय पर भरते है. साथ ही पशु मेले भी भरते है. इन पशु मेलों में गाय, बैल, ऊंट, घोड़े आदि पशु बिक्री के लिए लाए जाते है.

इन मेलों में पुष्कर, दिलवाड़ा, परबतसर, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, गोगामेड़ी आदि के मेले प्रसिद्ध है. राज्य में प्रमुख मेलें व समय इस प्रकार है.

  • पुष्कर का मेला कार्तिक में
  • दिलवाड़ा का मेला चैत्र माह में
  • परबतसर का मेला भादों में
  • कोलायतजी का मेला कार्तिक में
  • चार भुजा (मेवाड़) का मेला भादों में
  • केसरिया नाथ जी का मेला (धुलैव, मेवाड़) चैत्र में
  • रामदेवरा (पोकरण, जोधपुर) का मेला भादों में
  • श्री महावीरजी का मेला चैत्र में
  • राणी सती (झुंझुनूं) का मेला भादों में
  • केलवाड़ा (कोटा) का मेला वैशाख में भरता है.

इन प्रमुख मेलों के अलावा राजस्थान में अन्य मेले भी स्थानीय मान्यता एवं महत्व के आधार पर आयोजित किये जाते है.

मेलों का सामाजिक महत्व (Social importance of fairs)

मेले हमारी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रतीक तो है ही, सामाजिक दृष्टि से भी इनका अपना महत्व है. समाज में परस्पर मेल मिलाप, भाईचारा, सहयोग की दृष्टि से भरने वाले मेले अपने आप में विशेष महत्व रखते है.

इन मेलों से लोग एक दूसरे की सामाजिक रीती रिवाजों से परिचित होते है. एक सांस्कृतिक आदान प्रदान की परम्परा का निर्वहन होता है.

इन मेलों में विवाह योग्य लड़के लड़कियाँ के रिश्ते भी तय होते है, इनसें आपसी सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती है और साम्प्रदायिक सद्भाव को भी बल मिलता है.

मेलों की आवश्यकता (Fairs and Festivals of Rajasthan)

सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से मेलों की अति आवश्यकता है. इन मेलों से सामाजिक मेल जोल बढ़ता है, कुटीर उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं का विक्रय होता है.

मनोरंजन भी होता है. और ये जरुरी चीजों के खरीद फरोख्त की सुविधा भी मिल जाती है. ये मेले मानसिक खुशहाली और ज्ञानवर्धक के भी प्रतीक है.

मेलों का पर्यटन पर प्रभाव (Impact of fairs on tourism)

मेले पर्यटन को प्रभावित करते है. जन आस्था के प्रतीक इन मेलों को देखने के लिए दूर दराज से ही नही अपितु देश के विभिन्न भागों व विदेशों से भी पर्यटक आते है.

इनसे राज्य सरकार, दुकानदारों तथा स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि होती है. सार रूप में हम यह कह सकते है, मेलों के द्वारा यहाँ के जीवन की झांकी देखने को मिलती है.

Essay On Rajasthan Fairs In Hindi In 500 Words

मेले का अर्थ मेले का अर्थ है मिलना. जब किसी स्थान पर धार्मिक सामाजिक अथवा किसी अन्य उद्देश्य को लेकर लोग एकत्र होते हैं तो उसको मेला कहते हैं. मेले में दूर दूर से आने वालों को एक दूसरे से मिलने तथा जानने पहचानने का अवसर मिलता हैं. मेले लोगों को मिलाने का कार्य करते हैं.

राजस्थान के प्रमुख मेले– बहुत प्राचीन काल से प्रायः सभी देश प्रदेशों में मेले लगते रहे हैं. राजस्थान में भी अनेक मेले लगते हैं. राजस्थान में लगने वाले मेलों का उद्देश्य धार्मिक एवं व्यवसायिक दोनों ही प्रकार का होता हैं. धार्मिक आधार पर लगने वाले मेलों का सम्बन्ध धार्मिक स्थानों से होता हैं.

गणगौर के त्यौहार के अवसर पर जयपुर आदि नगरों में गणगौर का मेला लगता हैं. इस अवसर पर गणगौर की सवारी निकाली जाती हैं. इसके अतिरिक्त श्रावणी तीज पर भी मेलों का आयोजन होता हैं. स्त्रियाँ अज धजकर अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलने जाती हैं.

कुछ मेलों का उद्देश्य व्यवसायिक होता हैं. इनमें वस्तुओं की खरीद फरोख्त के लिए बाजार लगते हैं. यहाँ कुछ पशु मेले भी लगते हैं. इनमें पशुओं को बेचने तथा खरीदने वाले दूर दूर से आते हैं. पुष्कर, भरतपुर, अलवर, धौलपुर, करौली आदि के मेले प्रसिद्ध हैं.

मेलों का सामाजिक महत्व- मेले सामाजिकता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. इन मेलों में सभी धर्म जाति के लोग आते हैं. आपस में मिलते हैं. तथा एक दूसरे को जानते हैं. मेलों के कारण लोगों में प्रेम तथा सामाजिक सद्भाव पैदा होता हैं. मेले एक दूसरे को परिचित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लोगों को निकट लाने में तथा एक दूसरे को जानने में मेले अत्यंत मददगार होते हैं. मेलों से सामाजिक सद्भाव परस्पर मेल जोल और प्रेम पैदा होता हैं.

मेलों की आवश्यकता- मेलों की लोगों को अत्यंत आवश्यकता होती है. मेलों के अवसर पर लोग एक दूसरे से मिलते है तथा वहां से आवश्यकता की चीजे खरीद लेते हैं. मेलों में जाने का मनुष्य का मनोरंजन भी होता हैं. गाँवों के आस-पास लगने वाले मेले छोटे बाजार का रूप लिए होते हैं. वहां लोगों के उपभोग की प्रत्येक वस्तु मिल जाती हैं. सामाजिक तथा व्यवसायिक दोनों ही दृष्टियों से मेलों की आवश्यकता होती हैं.

मेलों का पर्यटन पर प्रभाव- मेलों का पर्यटन पर भी प्रभाव होता हैं. मेला देखने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं. इनमें मेले में शामिल होने वाली व्यापारी तथा ग्राहक दोनों ही होते हैं इससे पर्यटन में वृद्धि होती हैं.

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