लोक देवता वीर तेजाजी | Lok Devata Veer Tejaji

लोक देवता वीर तेजाजी | Lok Devata Veer Tejaji In Hindi

Lok Devata Veer Tejaji  Katha : धर्म धरा व धेनु की रक्षार्थ जिन महापुरुषों ने कार्य किया, संघर्ष किया और बलिदान दिया वे लोकदेवता की श्रेणी में आते है. आज भी जनता में उनके प्रति अटूट श्रद्धा है इनके प्रसिद्ध मेले लगते है. भूतकाल में कुछ ऐसें व्यक्ति जनता के सामने आए जिन्होंने जनता व गोवंश की रक्षा, दलित जातियों का उद्धार एवं धर्म की रक्षार्थ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई एवं अपने प्राणों का भी उत्सर्ग किया. इनमे गोगाजी, तेजाजी के अलावा पाबूजी का नाम आता है.

Veer TejajiTEJAJI

गो रक्षक तेजाजी नागौर जिले के खारनालिये गाँव के रहने वाले थे. तेजाजी का जन्म माघ शुक्ला चतुर्द्र्शी विक्रम संवत् 1130 में हुआ. बाल्यकाल में ही विवाह हो जाने के इन्हें यह भी पता नही था कि मै विवाहित हू. एक दिन तेजाजी जब खेत में हल चला रहे थे, उस दिन इनकी भाभी देर से खाना लेकर पहुची.

इस पर तेजाजी ने कहा इतनी देर कहा हो गई तब भाभी बोली कि तुम्हारी पत्नी तो पीहर में बैठी मौज कर रही है मै यहाँ काम के मारे पिसती जा रही हु. तेजाजी को यह बहुत बुरा लगा. अपने ससुराल का पता पूछकर बिना भोजन किये ही घोड़ी पर सवार होकर ससुराल की ओर रवाना हो गये.

जब तेजाजी ससुराल पहुचे तो इनकी सास गायों से दूध निकाल रही थी. तेजाजी के घोड़े (लीलण) के खुर की आवाज सुनकर दूध देती गाय बिदक गई. इस पर सासू बोली- ‘कि नाग रो झातियोड़ो ओ कुण है ? जणी गायां ने भिड्का दी. तेजाजी ने जब यह सुना तो यह बहुत बुरा लगा. वे तत्काल वहां से लौट गये. जब ससुराल वालों को पता चला तो तेजाजी को रोकने की बहुत कोशिश की मगर, पर वे नही माने.

पत्नी ने बमुश्किल एक रात रुकने के लिए राजी किया. लेकिन तेजाजी ने कहा वे ससुराल में नही ठहरेगे. अतः वे लाछा नामक गुजरी के यहाँ एक रात को रुके. रात को कुछ चोर आए और लाछा गुजरी की गाये घेर ले गये. तेजाजी को पता चला तो चोरो के पीछे घोड़ी पर चढ़ कर भागे. रास्ते में लकड़ी के जलते ढेर में एक साँप को जलते देखा, तेजाजी ने भाले की नोक से उसे बाहर निकाला.

तब सांप बोला मै तुम्हे डसुगा. तेजाजी ने कहा मै अभी गायेछुड़ाकर आता हु तब डसना. जब तेजाजी गायें छुड़ाकर आए तो चोरों से लड़ाई में उनका शरीर खून से लथपथ हो चूका था. सांप ने कहा शरीर पर खून है, मै कहा डसू, तब तेजाजी ने अपने मुह से जिह्वां निकाली और कहा यहाँ डसों. सांप ने डसा और वे प्राणांत हो गये. इनकी पत्नी पेमल पीछे सती हो गई. तेजाजी की गाये छुड़ाने व वचन पालन की ख्याति फ़ैल गई, जगह जगह तेजाजी के मन्दिर बन गये.

सर्प दंश से पीड़ित व्यक्ति इनकें स्थानकों पर आकर इलाज करवाते है. तथा भाद्रपद शुक्ला दशमी को तेजाजी की स्मृति में मेला भरता है, जहाँ हजारों लोग मेले में आकर लोक देवता तेजाजी की पूजा करते है.

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