संसाधन एवं विकास | classification, examples definition, types of resources in geography in hindi

classification, examples definition, types of resources in geography in hindi: हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओ को पूरा करने के लिए प्रयुक्त की जा सकती है और बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है. जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है. एक संसाधन है. हमारे पर्यावरण में उपलब्ध वस्तुओं के रूपांतरण की प्रक्रिया प्रकृति, प्रोद्योगिकी और संस्थाओं के परस्पर अंतर्संबंध में निहित है.

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resources in india in hindi: मानव प्रोद्यौगिकी द्वारा प्रकृति के साथ क्रिया करते है. और अपने आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए संस्थाओं का निर्माण करते है. संसाधन मानवीय क्रियाओं का परिणाम है. मानव स्वयं संसाधनों का महत्वपूर्ण हिस्सा है. वे पर्यावरण में पाए जाने वाले पदार्थों को संसाधनो में परिवर्तित करते है.

तथा उन्हें प्रयोग करते है. इन संसाधनो का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है.

संसाधनों का वर्गीकरण (types, classification of resources in hindi)

  • उत्पति के आधार पर-जैव और अजैव
  • समाप्यता के आधार पर- नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य
  • स्वामित्व के आधार पर- व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय
  • विकास के स्तर के आधार पर- संभावी, विकसित भंडार और संचित कोष

संसाधनों के प्रकार (types of resources in hindi)

उत्पत्ति के आधार पर (On the basis of origin)

  • जैव संसाधन- इन संसाधनों की प्राप्ति जीवमंडल से होती है. और इनमें जीव व्याप्त है. जैसे मनुष्य, वनस्पतिजात, प्राणिजात, मत्स्य जीवन, पशुधन आदि.
  • अजैव संसाधन– वे सारे संसाधन जो निर्जीव वस्तुओं के बने हुए है. अजैव संसाधन कहलाते है. उदाहरणार्थ चट्टानें और धातुएं

समाप्यता के आधार पर (On the basis of termination)

  • नवीकरण योग्य संसाधन– वे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक क्रियाओं द्वारा नवीकृत या पुनः उत्पन्न किया जा सकता है. उन्हें नवीकरण योग्य या पुनः पूर्ति योग्य संसाधन कहा जाता है. उदाहरणार्थ, सौर तथा पवन उर्जा, जल, वन व वन्य जीवन. इन संसाधनो को सतत या प्रवाह संसाधनों में विभाजित किया जा सकता है.
  • अनवीकरण योग्य संसाधन- इन संसाधनों का विकास एक लम्बें भू- वैज्ञानिक अंतराल में होता है. खनिज और जीवाश्म ईधन इस प्रकार के संसाधनों के उदहारण है. इनके बनने में लाखों वर्ष लग जाते है. इनमें से कुछ संसाधन जैसें धातुएं पुनः चक्रीय है और कुछ संसाधन जैसे जीवाश्म ईधन अचक्रीय है. व एक बार प्रयोग के साथ ही समाप्त हो जाते है.

स्वामित्व के आधार पर (On the basis of ownership)

  • व्यक्तिगत संसाधन- संसाधन निजी व्यक्तियों के स्वामित्व में भी होते है. बहुत से किसानों के [पास सरकार द्वारा आवंटित भूमि होती है. इसके बदलें में वे सरकार को लगान चुकाते है. गाँव के बहुत से लोग भूमिहीन होते है. शहरों में लोग भूखंड, घरों व अन्य जायदाद के मालिक होते है. बाग़, चारागाह, तालाब और कुओं का जल आदि संसाधनों के निजी स्वामित्व के उदहारण है.
  • सामुदायिक स्वामित्व वाले संसाधन- ये संसाधन समुदाय के सभी सदस्यों को उपलब्ध होते है. गाँव की शामिलात भूमि (चारण भूमि, श्मशान भूमि, तालाब इत्यादि) और नगरीय क्षेत्रों के सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल और खेल के मैदान, वहां रहने वाले सभी लोगों के लिए उपलब्ध है.
  • राष्ट्रीय संसाधन- तकनीक तौर पर देश में पाए जाने वाले सारे संसाधन राष्ट्रीय है. देश की सरकार को कानूनी अधिकार है. कि वह व्यक्तिगत संसाधनो को भी आम जनता के हित में अधिग्रहित कर सकती है. सड़के, नहरे और रेल लाइनें व्यक्तिगत स्वामित्व वालें खेतों में बनी हुई है. शहरी विकास प्राधिकरण को सरकार ने भूमि अधिग्रहण का अधिकार दिया हुआ है. सारे खनिज पदार्थ, जल संसाधन, वन वन्य जीवन, राजनितिक सीमाओं के अंदर सारी भूमि और 12 समुद्री मील (19.2 किमी) तक महासागरीय क्षेत्र (भू भागीय समुद्र) व इसमें पाए जाने वाले संसाधन राष्ट्र की संपदा है.
  • अंतर्राष्ट्रीय संसाधन- कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ संसाधनो को नियंत्रित करती है. तट रेखा से 200 समुद्री मील की दूरी (अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र) से पुरे खुले महासागरीय संसाधनो पर किसी देश का अधिकार नही है. इन संसाधनो को अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमती के बिना उपयोग नही किया जा सकता है.

विकास के स्तर के आधार पर (On the basis of development level)

  • संभावी संसाधन- यह वे संसाधन है जो किसी प्रदेश में विद्यमान होते है परन्तु इनका उपयोग नही किया हुआ होता है. उदहारण के लिए भारत के पश्चिमी भाग विशेषकर राजस्थान और गुजरात में पवन और सौर उर्जा संसाधनो की अपार सम्भावना है. परन्तु इनका सही ढंग से विकास नही हुआ है.
  • विकसित संसाधन- वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चूका है. और इनके उपयोग की गुणवता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है. विकसित संसाधन कहलाते है. संसाधनो का विकास प्रोधौगिकी और उनकी संभाव्यता के स्तर पर निर्भर करता है.
  • भंडार- पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते है. परन्तु उपयुक्त प्रौद्योगिकी के अभाव में उसकी पहुच से बाहर है, भंडार में शामिल है. उदहारण के लिए जल दो ज्वलनशील गैसों हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का यौगिक है तथा यह उर्जा का मुख्य स्रोत बन सकता है. परन्तु इस उद्देश्य से इनका प्रयोग करने के लिए हमारे पास आवश्यक तकनिकी का ज्ञान नही है.
  • संचित कोष- यह संसाधन भंडार का ही हिस्सा है. जिन्हें उपलब्ध तकनिकी ज्ञान की सहायता से प्रयोग में लाया जा सकता है. परन्तु इनका उपयोग अभी तक आरम्भ नही हुआ है. इनका उपयोग भविष्य में आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया जा सकता है. नदियों के जल को विद्युत पैदा करने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है. परन्तु वर्तमान समय में इसका उपयोग सिमित पैमाने पर ही हो रहा है. इस प्रकार बांधों में जल वन आदि संचित कोष है, जिनका उपयोग भविष्य में किया जा सकता है.

संसाधनों का विकास (development of resources in india)

संसाधन जिस प्रकार मनुष्य के जीवन यापन के लिए अति आवश्यक है. उसी प्रकार जीवन की गुणवता बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है. ऐसा विश्वास किया जाता था कि संसाधन प्रकृति की देन है. परिणामस्वरूप मानव ने इसका अंधाधुंध उपयोग किया है. जिससे निम्नलिखित समस्याएं पैदा हो गई है.

कुछ व्यक्तियों के लालचवश संसाधनों का हास- संसाधन समाज के कुछ ही लोगों के हाथ में आ गये है, जिससे समाज दो हिस्सों संसाधन सम्पन्न एवं संसाधन हीन अर्थात् अमीर और गरीब में बंट गया है.संसाधनो के अंधाधुंध शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी का संकट पैदा हो गया है. जैसे भूमंडलीय तापन, ओजोन परत अपक्षय, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण आदि है.

मानव जीवन की गुणवता और विश्व शांति बनाए रखने वाले संसाधनों को समाज में न्यायसंगत बंटवारा आवश्यक हो गया है. यदि कुछ व्यक्तियों तथा देशों द्वारा संसाधनों का वर्तमान दोहन जारी रहता है तो हमारी पृथ्वी का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा.

इसलिए हर तरह के जीवन का अस्तित्व बनाए रखने के लिए संसाधनों के उपयोग की योजना बनाना अति आवश्यक है. सतत अस्तित्व सही अर्थ में पोषकीय विकास का ही एक हिस्सा है.

संसाधन नियोजन (Resource planning In India In Hindi)

संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए नियोजन एक सर्वमान्य रणनीति है. इसलिए भारत जैसे देश जहाँ संसाधनों की उपलब्धता में बहुत अधिक विविधता है, यह और भी महत्वपूर्ण है. यहाँ ऐसे प्रदेश भी है, जहाँ एक तरह के संसाधन की प्रचुरता है, परन्तु दुसरें तरह के संसाधनों की कमी है.

कुछ प्रदेश ऐसे भी है. जो संसाधनों की उपलब्धता के सन्दर्भ में आत्म निर्भर है, और कुछ ऐसे प्रदेश भी है, जहाँ महत्वपूर्ण संसाधनों की अत्यधिक कमी है. उदाहरणार्थ झारखंड, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ आदि प्रान्तों में खनिज और कोयलें के प्रचुर भंडार है.

अरुणाचल प्रदेश में जल संसाधन प्रचुर मात्रा में पाए जाते है, जहाँ मूल विकास की कमी है. राजस्थान में पवन और सौर ऊर्जा संसाधनों की बहुतायतता है लेकिन जल संसाधनों की कमी है. लद्दाख का शीत मरुस्थल देश के अन्य भागों से अलग थलग पड़ता है. यह प्रदेश सांस्कृतिक विरासत का धनी है.

परन्तु यहाँ जल आधारभूत सरंचना तथा कुछ महत्वपूर्ण खनिजों की कमी है. इसलिए राष्ट्रीय प्रांतीय, प्रादेशिक और स्थानीय स्तर पर संतुलित संसाधन नियोजन की आवश्यकता है.

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