सीता पर कविता | poem on sita mata in hindi

सीता पर कविता | poem on sita mata in hindi

लंका में जिन दिनों मेरा निवास था
वहां विलोकी जो दाम्पत्य विडम्बना
उसका ही परिणाम राज्य विध्वस था
भयकर है संयम की अवमानना

होता है यह उचित कि जब दम्पति खिजे
सूत्रपात जब अनबन का होने लगे
उसी समय हो सावधान संयत बने
कलह बीज बिगड़ा मन बोने लगे

यदि चंचलता पत्नी दिखलाएं अधिक
पति तो कभी न त्यागे गंभीरता
उग्र हुए पति के पत्नी कोमल बने
हो अधीर कोई भी तजे न धीरता

तपे हुए की शीतलता है औषधि
सहनशीलता कुछ कलहों की है दवा
शांत चित्ता का अवलम्बन मिल गया
प्रकृति भी हो जाती है हवा

कोई प्राणी दोष रहित होता नही
कितनी दुर्बलताएं है उसमे भरी
किन्तु सुधारे सब बाते है सुधरती
भलाइयों ने सब बुराइयों है हरी

सभी उलझने है सुलझाते सुलझती
गाँठ डालने पर पड़ जाती गाँठ है
रस के भरने से ही रह सकता है
हरा भरा कब होता है उकठा काठ है.

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