स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज | Swami Dayanand Saraswati and Arya Samaj

स्वामी दयानंद सरस्वती /Swami Dayanand Saraswati and Arya Samaj: ब्रह्म समाज की तरह आर्य समाज ने भी राष्ट्रीय स्तर पर धर्म एवं समाज सुधार का बीड़ा उठाया. आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती थे. इनका जन्म गुजरात के मौरवी प्रान्त के टंकारा जिले में 1824 में एक रुढ़िवादी परिवार में हुआ था. स्वामी दयानंद सरस्वती के बचपन का मूल नाम मूलशंकर था.

स्वामी दयानंद सरस्वती

स्वामी दयानंद सरस्वती के बारे में (About Swami Dayanand Saraswati In Hindi)

एक दिन उन्होंने मन्दिर में एक चूहे को शिवलिंग पर प्रसाद खाते देखा तो उनका मूर्ति पूजा से विश्वास उठ गया. 21 वर्ष की आयु में दयानंद सरस्वती ने घर छोड़ दिया और मथुरा में स्वामी विरजानंद जी को अपना गुरु बनाया. उनसे स्वामी दयानंद ने वेदों की शिक्षा प्राप्त की. गुरु ने उनको कहा कि जिओं और वेदों को पढाओं’ वे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया और स्वराज को अपने कार्य का आधार बनाया.

1864 में स्वामीजी ने सार्वजनिक उपदेश देना प्रारम्भ किया, स्वामीजी का उद्देश्य हिन्दू समाज व धर्म की बुराइयों को दूर करना था. उनकी प्राचीन वैदिक सभ्यता, संस्कृति और धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा थी.1874 ई. में इन्होने प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश की उदयपुर प्रवास के समय रचना की तथा 10 अप्रैल 1875 में उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की. आर्य समाज के सिद्धांत इस प्रकार है.

आर्य समाज के सिद्धांत (principles of arya samaj in hindi)

  1. वेदों की सत्यता पर बल.
  2. वैदिक रीती से हवन व मन्त्र पाठ करना.
  3. सत्य को ग्रहण करने तथा असत्य को छोड़ने पर बल.
  4. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए.
  5. पौराणिक विश्वासों, मूर्तिपूजा और अवतारवाद का विरोध करना.
  6. स्त्री शिक्षा तथा विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहन देना.
  7. ईश्वर सर्वशक्तिमान, निराकार एवं नित्य है.
  8. सभी से धर्मानुसार प्रीतिपूर्वक तथा योग्य व्यवहार करने पर बल.
  9. हिंदी व संस्कृत भाषा के महत्व एवं प्रसार में वृद्धि करना.
  10. सब की उन्नति में अपनी उन्नति और सबकी भलाई में अपनी भलाई समझना.

स्वामी दयानंद सरस्वती के विचार (Swami Dayanand Saraswati’s views)

सरस्वती ने समाज में व्याप्त कुरीतियों की आलोचना की और उन्हें दूर करने के लिए जन समर्थन पाया.

उन्होंने छुआछूत, बाल विवाह, कन्या वध, पर्दा प्रथा, मूर्ति पूजा, श्राद्ध, धार्मिक अंधविश्वास एवं रूढ़ियों का विरोध किया.

शिक्षा एवं स्त्री अधिकारों का समर्थन किया, उन्होंने कहा कि वेदों के अध्ययन का अधिकार स्त्रियों को पुरुषों के बराबर है.

आर्य समाज शुद्धि आंदोलन में विश्वास करते थे. विशेष स्थतिवश अन्य धर्म स्वीकार करने वाले हिन्दुओं का वैदिक रीती से शुद्धिकरण कर उन्हें पुनः हिन्दू धर्म में लेने पर जोर दिया.सरस्वती ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को भी आगे बढ़ाया, उन्होंने आजादी प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम ”स्वराज्य” शब्द का उपयोग किया. विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार एवं स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग करना सिखाया. सरस्वती ने कहा था- ‘

‘स्वराज्य विदेशी राज्य से हमेशा अच्छा होता है, चाहे उसमे कितनी भी बुराइयाँ क्यों न हो.

आर्य समाज का शिक्षा के क्षेत्र में भी विशेष योगदान है. आर्य समाज के नाम से विद्यालय, महाविद्यालय एवं गुरुकुल व अन्य संस्थाएँ संचालित है. जिनकी शैक्षिक उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका है.स्वामी दयानंद जी के अंतिम दिन राजस्थान में ही गुजरे. 30 अक्टूबर 1883 को अजमेर में स्वामी दयानंद सरस्वती” का देहावसान हो गया.

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