स्वामी विवेकानंद के विचार | Thoughts of Swami Vivekananda In Hindi

आज के इस लेख में स्वामी विवेकानंद के विचार लिख रहे हैं. जिन्हें अग्रेजी में कहे तो Thoughts of Swami Vivekananda यह स्वामीजी के जीवन में घटित एक घटना की सच्ची कहानी से जो हमे इन महापुरुष के विचारों को समझने में मदद मिलेगी. इस आर्टिकल को हम नरेंद्र से विवेकानंद का नाम भी दे सकते हैं.

स्वामी विवेकानंद की कहानी

प्रख्यात अंग्रेजी कवि विलियम वर्ड्सवर्थ की एक प्रसिद्ध कविता हैं- एक्सकरशन. एक बार प्रोफ़ेसर हेस्टी छात्रों के समक्ष इस कविता की व्याख्या कर रहे थे. ट्रांस जैसे महत्वपूर्ण शब्द की व्याख्या करते समय प्रोफ़ेसर साहब ने दक्षिणेश्वर मन्दिर के पुजारी श्री रामकृष्ण परमहंस का उल्लेख किया.

इसी सन्दर्भ को आगे बढाते हुए प्रोफ़ेसर साहब ने बताया कि रामकृष्ण ट्रांस (समाधि) की स्थति में आ जाते थे. ट्रांस एक तरह का आनन्दमय आध्यात्मिक अनुभव हैं, इसी सन्दर्भ में यह जानना उचित होगा कि श्री रामकृष्ण ईश्वर की उपासना जगन्माता के रूप में करते थे. वे देवी की उपासना दक्षिणेश्वर में काली की मूर्ति के रूप में किया करते थे.

मूर्ति पूजा द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार करने के उनके इस विचार ने मूर्ति-पूजा विरोधी आन्दोलन को घातक आघात पहुचाया. इसके पूर्व भी नरेंद्र ने श्री रामकृष्ण के विषय में सुन रखा था. इस संत के बारे में उनके अपने कुछ संदेह थे. लेकिन, जब उन्होंने प्रोफेसर हेस्टी से उनके विषय में सुना तो वे दक्षिणेश्वर के इस संत से भेट करने को आतुर हो गये. ऐसा कहा जाता हैं कि जाड़े की एक दोपहर में सभवत 15 जनवरी 1882 रविवार को नरेंद्र श्री रामकृष्ण परमहंस से भेट करने गये.

श्री रामकृष्ण परमहंस से नरेंद्र की यह ऐतिहासिक भेट थी. यह उनके जीवन का नया मोड था, क्युकी इसके बाद नरेंद्र के जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अध्याय शुरू हुआ. उनका जीवन कुछ असामान्य कार्य के लिए ढालना था.

नरेंद्रनाथ से स्वामी विवेकानंद

कुछ अत्यधिक शक्तिशाली एवं गतिशील जीवन के लिए वह जीवन क्या था? वह था नरेन्द्रनाथ का स्वामी विवेकानंद में रूपांतरण. श्री रामकृष्ण की प्रथम भेट से ही उनके लिए आनन्दमयी एवं रोमाचकारी थी. ऐसा प्रतीत हुआ कि रामकृष्ण की एक सच्चे शिष्य की खोज ईश्वर द्वारा आज पूरी हो गईं.

उन्होंने भावावेश में आकर घोषित किया था-‘ओ मेरे प्यारे पुत्र! मै कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था. श्री रामकृष्ण से उनकी इस ऐतिहासिक भेंट के बारे में यह जानना चाहिए कि स्वय नरेंद्र ने कहा था- मैंने इस व्यक्ति के विषय में सुना और उससे भेट करने गया, वे देखने में बिलकुल एक सामान्य व्यक्ति की तरह प्रतीत हुए जिनके विषय में कुछ उल्लेखनीय नही था.

उन्होंने सीधी सरल भाषा का प्रयोग किया. मैंने सोचा – क्या यह व्यक्ति एक महान गुरु हो सकता हैं? मै उनके निकट बढ़ता गया और वही प्रश्न पूछा, जो मै दुसरो से जीवनभर पूछता रहा था.

”श्रीमान! क्या आप ईश्वर में विशवास करते हैं? उत्तर मिला-हाँ” कैसे? ” क्युकि मै उन्हें देखता हु ठीक वैसे ही जैसे मै तुम्हे देख रहा हु,

”उनके इन उत्तर ने मुझे तुरंत प्रभावित किया. यह प्रथम अवसर था, जब मैंने एक ऐसे व्यक्ति को पाया जो कहने का साहस रखता था कि उसने ईश्वर को देखा हैं”

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