हल षष्ठी की व्रत कथा पूजन | Hal Shashti Vrat Katha

Hal Shashti Vrat Katha: हल षष्ठी (ललही छठ) यह व्रत भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को किया जाता हैं. इस दिन हल मूसलाधारी श्री बलराम जी का जन्म हुआ था. कुछ लोग जनक नंदिनी माता सीता का भी जन्म दिन इसी तिथि को मानते हैं. बलराम जी के मुख्य शस्त्रों में हल तथा मूसल विशेष उल्लेखनीय हैं. इसी से इनका नाम हलधर भी हैं.

Hal Shasti 2018 is on September 01 SaturdayHal Shashti Vrat Katha

हल षष्ठी की व्रत कथा पूजन | Hal Shashti Vrat Katha

इन्ही के नाम के आधार पर इनका नाम हलषष्ठी पड़ा होगा. प्रधानतयः पुत्रवती स्त्रियाँ ही यह व्रत करती हैं. इस दिन महुए का दातुन करने का विधान हैं. पारण के समय हल से जोता बोया गया अन्न नही खाना चाहिए. इस कारण इस व्रत का सेवन करने वाली स्त्रियाँ नीवार (फसही) का चावल सेवन करती हैं. इस दिन गाय का दूध भी वर्जित हैं.

विधि विधान में प्रातः सघ्य स्नाता के स्त्रियाँ भूमि (आंगन) लीपकर एक जल कुंड बनाती हैं. जिसमें बैर, पलाश, गूलर, कुछ प्रभृति टहनियां गाड़कर ललही की पूजा की जाती हैं. पूजन में सतनजा (गेहूं, चना, धान, मक्का, अरहर, ज्वार, बाजरा) आदि का भुना हुआ लावा चढाया जाता हैं.

हल्दी से रंगा हुआ वस्त्र तथा कुछ सुहाग सामग्री भी चढ़ाई जाती हैं. पूजनोउपरांत निम्न मंत्र से प्रार्थना करनी चाहिए.

गंगाद्वारे पर कुशावर्ते विल्वके नील पर्वते,
स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्,
ललिते सुभगे देवि सुख सौभाग्य डायनि,
अनतः देहि सौभाग्य महां तुभ्यं नमो नमः

अर्थात हे देवी ! आपने गंगाद्वार, कुशावर्त, विल्वक, नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त किया हैं. सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी आपकों बारम्बार नमस्कार हैं. आप मुझे अचल सुहाग दीजिए.

यह व्रत धारण करने से स्त्रियों का सुहाग अचल होता हैं. तथा अंत में शिव धाम की प्राप्ति होती हैं.

कथा- प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी, जिसका प्रसवकाल अत्यंत सन्निकट था. एक और वह पीड़ा से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका चित्त गोरस विक्रय में लगा था. उसने विचार किया कि यदि बच्चा उत्पन्न हो गया तो दूध दही ऐसे ही पड़ा रह जाएगा.इतना सोचकर वह झट उठा तथा सिर पर दूध, दही की मटकिया रखकर बेचने चल दी आगे चलकर कष्टसाध्य पीड़ा के कारण एक बनवेरी की ओट में बैठ गई और उसके वहां एक बालक पैदा हुआ.

अल्हड़ ग्वालिन ने नवजात शिशु वही रखकर स्वयं दूध, दही बेचने समीपस्थ गाँवों को चल दी. संयोगवश उस दिन हलषष्ठी भी थी. गाय भैस का मिश्रित दूध होने पर भी उसने भैंस का दूध बतलाकर ग्रामीणों को खूब ठगा.

जिस बनबेरी में उसने बच्चें को छोड़ा था, उसी के समीप एक कृषक खेत जोत रहा था. अचानक बैलों के भड़कने से चपेट में आकर वह बालक हल की फलक में आकर मर गया. इस घटना को देखकर कृषक बहुत दुखी तथा लाचार हुआ. फिर भी उसने धैर्य धारण करके बन बेरी के काँटों से बच्चों के पेट पर टांका लगा कर छोड़ दिया. तत्काल ग्वालिन भी दूध विक्रय करके वहां आ गईं.

बच्चें की दशा देखकर उसने अपने ही किए गये पाप का प्रतिफल समझा. फिर वह मन में सोचने लगी, कि यदि मैनें हलषष्ठी के दिन दूध दही विक्रय हेतु मिथ्या भाषण करके उन ग्रामीण नारियों का धर्म नष्ट न किया होता, तो यह दशा क्यों होती ? इसलिए मुझे लौटकर सब बाते प्रकट कर प्रायश्चित करना होगा.

ऐसा निश्चय कर वह उस गाँव में गईं, जहाँ उसने दूध दही बेचा था. वह गली गली में घूमकर कहने लगी कि मेरा दूध गाय भैंस का मिश्रण था. यह सुनकर स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ उसे आशीर्वाद दिया. बहुत सी युवतियों के द्वारा आशीष लेकर जब वह पुनः बनबेरी में आई तो उसका पुत्र जीवित मिला.

तभी उसने स्वार्थ सिद्धि के लिए झूठ बोलना ब्रह्म हत्या के समान निकृष्ट धर्म समझकर छोड़ दिया. किन्ही किन्ही प्रान्तों में ललही छठ ललिता व्रत के नाम से भी जाना जाता हैं, विधान उपरोक्त ही हैं.

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