हिंदी में कहानी कुरज री विनती (विजयदान देथा द्वारा रचित)

आज की शीर्षक हिंदी में कहानी में राजस्थान के कवि और लेखक विजयदान देथा द्वारा मूलत: राजस्थानी भाषा में लिखी गईं कुरज री विनती कहानी हैं, जिसे हिंदी में ट्रांसलेट किया गया हैं. इस हिंदी में कहानी के कुछ शब्द और वाक्य मायड भाषा (राजस्थानी) के ही हैं. HIHINDI पर कहानियां ही कहानियां की सीरिज में आप सभी पुरानी और नवींन हिंदी स्टोरी पढ़ सकते हैं. देथा जी की अन्य लघु कथाएं मैं बातां री फुलवारी,प्रेरणा,सोरठा,रूँख,कबू रानी,बापु के तीन हत्यारे विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं.

हिंदी में कहानी – विजयदान देथा

यह एक पशु प्रेम की कहानी हैं, जिसमें कुरज एक पक्षी हैं इसकी और पशुओ के ग्वाले फिर ऊदरे (चूहे) के साथ की कहानी हैं, इसमे राजस्थानी भाषा के लोक गान भी बिच-बिच में दिए गये हैं. कुरज एक रूस के साइबेरिया की पक्षी हैं.

जो मानसून की शुरुआत के साथ ही राजस्थान के घना पक्षी विहार अभ्यारण में प्रवास पर आ जाती हैं,शरद मौसम की आहत से ही ये अपने वतन की वापसी का रुख कर लेती हैं. कुरज को हिंदी भाषा में सारस भी कहा जाता हैं, कुरज से जुड़े राजस्थान में कई लोकगीत बहुत प्रसिद्ध हैं|

कुरज री विनती ( हिंदी में कहानी )

समुद्र के किनारे एक ऊँचा पर्वत था. उस पर्वत तलहटी में एक साफ़ स्थान को चुनकर कुरज ब्याई और सत्रह अंडे लाई. उन अन्डो को कुरज ने पुरे सत्रह दिन तक सेया. उस कुरज ने उन सत्रह दिनों तक एक भी दाने का चुग्गा नही लिया.

सेते-सेते उन सत्रह अंडो से 17 बच्चे पैदा हुए,

तब वह कुरज उन बच्चों के चुग्गे की खोज में उड़ी. उड़ते-उड़ते उन्हें तोते के पंख जैसा हरा खेत नजर आया. अब यह अपने बच्चों को रोजाना इस ज्वार के खेत में दाना चुगाने के लिए ले जाने लगी.

उस ज्वार के खेत का मालिक बेहद लोभी लालची किस्म का व्यक्ति था.

उसने सोचा यह कुरज हमेशा बिगाड़ करती हैं,इसे पकड़ना चाहिए | एक दिन उसने ज्वार के पौधे-पौधे पर गुड़ का लेप कर दिया. कुरज खेत में चुग्गा चुगने उतरी तो छिपक गईं. कुरज उड़ने के लिए छटपटाने लगी तो किसान ने उसे पकड़ लिया.

उसे एक खेजड़ी के पेड़ के बाँध दिया.

कुछ समय बाद भेड़ चराने वाला गडरिया वहा से गुजरा, फडफडाती कुरज ने करुण स्वर में उस गडरिये से विनती की-

रेवड रा एवालिया रे बीर टमरकटूँ

बांधी कुरज छुड़ाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

समदा रे कांठे ब्याई म्हारा बीर – टमरकटूँ

भाखर खुड्के ब्याई ब्याई म्हारा बीर- टमरकटूँ

स्त्रेरह बिचिया ल्याई म्हारा बीर-टमरकटूँ

आंधी में उड़ जाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

लुआं में बल जाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

मेहा में गल जाए महारा बीर- टमरकटूँ

भूखा में मर जाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

कुरज की विनती सुन गडरिये को दया आ गईं.

उसने खेत के मालिक से कहा-छांटकर अच्छी-सी भेड़ ले लो,और इस निरीह कुरज को छोड़ दे, खेत का मालिक लोभी था. उसने कहा सारा का सारा रेवड़ दे तो छोड़ दू. ” गडरिये ने कहा- लेनी हो तो एक भेड़ लेले, मै तो नौकर हु.

इससे अधिक देना मेरे हाथ की बात नही, उसने काफी निहोरे किये,

पर खेत का मालिक नही माना, कुछ देर बाद गायों का एक झुण्ड आया. कुरज ने वैसे ही करुण स्वर में विनती की-

गाया रा ग्वालिया रे बीर-टमरकटूँ

बाँधी कुरज छुड़ाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

समदा रे कांठे ब्याई म्हारा बीर – टमरकटूँ

कुरज की विनती सुनकर ग्वाले को दया आ गईं, उसने खेत के मालिक से कहा- छांटकर एक अच्छी सी गाय लेलो और इस कुरज को छोड़ दो. पर खेत का मालिक अत्यंत लोभी था.

उसने कहा- सारी की सारी गाये दे तो छोडू ?

ग्वाले ने कहा- ”मै तो नौकर हु, इससे अधिक देना मेरे हाथ की बात नही, लेनी हो तो एक बढ़िया गाय ले लो. काफी समय तक निहोरे किये, तब भी व न माना. फिर कुछ समय बाद भैसों का झुण्ड आया. कुरज ने करुण स्वर में विनती की.

भैसा रा ग्वालिया रे बीर– टमरकटूँ

बाँधी कुरज छुड़ाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

समदा रे कांठे ब्याई म्हारा बीर – टमरकटूँ

कुरज की विनती सुनकर भैसों के ग्वाले के ह्रदय में दया आ गईं, उसने खेत के मालिक से कहा- छांटकर एक बढ़िया सी भैस ले लो, और इस बंधी कुरज को छोड़ दो.

पर खेत का मालिक बड़ा लालची था.

उसने कहा- ”सारी की सारी भैंसे दे तो छोडू” तब ग्वाले ने कहा- मै तो मामूली नौकर हु, इससे अधिक देना मेरे हाथ की बात नही, लेनी हो तो एक उम्दा भैंस ले लो. बहुत देर निहोरे किये फिर भी वह न माना. हिंदी में कहानी कुरज री विनती आप hihindi.com पर पढ़ रहे हैं|

कुछ समय बाद वहा से ऊंटों का झुण्ड गुजरा. कुरज ने ह्रदय चिर देने वाली करुण स्वर में विनती की.

साड्या रा रेवलिया रे बीरटमरकटूँ

बाँधी कुरज छुड़ाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

समदा रे कांठे ब्याई म्हारा बीर – टमरकटूँ

कुरज की यह विनती सुनकर गडरिये का दिल दया से भर गया. उसने खेत के मालिक से कहा- छांटकर एक अच्छा सा ऊंट ले लो. और इस कुरज को छोड़ दो, पर उस खेत का मालिक बेहद लोभी किस्म का इंसान था.

उसने कहा-सारे का सारा झुण्ड दे तो छोडू.

तब गडरिये ने कहा – मै बहुत मामूली नौकर हु, इससे अधिक देना मेरे बस की बात नही हैं, लेना हो तो एक बढ़िया ऊंट ले लो. बहुत निहोरे किये तब भी वह न माना. कुछ देर बाद सामने के एक बिल से उन्दरा निकला. कुरज ने अपनी विवशता के मारे छटपटाते हुए, करुण स्वर में विनती की.

पयाल देश रा राजा रे बीर- टमरकटूँ

बांधी कुरज छुड़ाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

समदा रे कांठे ब्याई म्हारा बीर – टमरकटूँ

भाखर खुड्के ब्याई ब्याई म्हारा बीर- टमरकटूँ

स्त्रेरह बिचिया ल्याई म्हारा बीर-टमरकटूँ

आंधी में उड़ जाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

लुआं में बल जाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

मेहा में गल जाए महारा बीर- टमरकटूँ

भूखा में मर जाई म्हारा बीर- टमरकटूँ

कुरज की यह करुण विनती सुनकर उदरे का ह्रदय फट सा गया. उसकी आँखों में आंसू छलछला से गये. खेत के लोभी मालिक पर उसे बहुत गुस्सा आया,फिर भी उसने संयत स्वर में उससे विनती की- यदि तू इस कुरज को छोड़ दे तो मै तुम्हे एक सोने की माला दूंगा. पुरे एक सौ आठ मनको की.

सोने की बात सुनकर उस पीले खेत के मालिक की आँखे चौधिया सी गयी.

और बोला- मेने किसी की बात नही मानी, अड़ा रहा पर तेरा कहना तो मानना ही पड़ेगा. किन्तु केवल सोने की माला से काम चलने वाला नही हैं| सोने का बाजोटा और सोना का वजनी मुकुट दे दे. मै इस कुरज को छोड़ दुगा.

इसने मेरे खेत में कितना बिगाड़ किया हैं, तुम अंदाजा लगा सकते हो.

उन्दरे ने कहा- तू कहे तो मुझे ये तीन चीज देने में कोई एतराज नही हैं.

मेरे कुछ भी घाटा नही पड़ेगा, पर पहले कुरज को छोड़ दे.

मुझे तेरा विशवास नही हैं. खेत के मालिक ने ज्यादा हठ की तो

उन्दरे ने तीनों चीजे बिल के द्वार पर लाकर रख दी. खेत का मालिक ख़ुशी से बावला हो गया.

उसने झट से कुरज को छोड़ दिया, खेत का मालिक जैसे ही तीनो चीजे लेने लपका.

चूहे ने झट से इसे अपने बिल में खीचकर अंदर तक ले गया. पैरो से बिल के बाहर धुल उछालते हुए कहने लगा- सोने के बदले धुल ले ले, सोने के बदले धुल ले ले. खेत का मालिक मुह उतारकर आकाश में उड़ती हुई कुरज को एकटक देखता रहा.

अब क्या उपाय हो सकता था.

कुरज तो आकाश में अद्रश्य हो गईं, उन्दरा पाताल में अद्रश्य हो गया.

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