आँसू ये भाग्य पसीजा | Aasu Se Bhagaya Pasija | Hindi Kavita

Aasu Se Bhagaya Pasija | Hindi Kavita

आँसू ये भाग्य पसीजा, हे मित्र, कहाँ इस जग में।
नित यहाँ शक्ति के आगे, दीपक जलते मग-मग में।
कुछ तनिक ध्यान से सोचो, धरती किसकी हो पाई?
बोलो युग-युग तक किसने, किसकी विरूदावलि गाई?
मधुमास मधु रूचिकर है, पर पतझर भी आता है
जग रंगमंच का अभिनय, जो आता सो जाता है।
सचमुच वह ही जीवित है, जिसमें कुछ बल-विक्रम है
पल-पल घुड़दौड़ यहाँ है, बल-पोरूष का संगम है।
दुर्बल को सहज मिटाकर, चुपचाप समय खा जाता
वीरों के ही गीतों को, इतिहास सदा दोहराता।
फिर क्या विषाद, भय, चिन्ता जो होगा सब सह लेंगे
परिवर्तन की लहरों में, जैसे होगा बह लेंगे।

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