Essay on Acharya Tulsi In Hindi | आचार्य तुलसी पर निबंध

Essay on Acharya Tulsi In Hindi: भारत की लम्बी पराधीनता के पश्चात 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ. स्वतंत्रता के स्वर्ण प्रभात से लोगों के जीवन में नवीन आशाओं का संचार हुआ, लेकिन स्वतंत्रता के इस नवीन अभ्युदय से जो समाचार आ रहे थे, वे अधिक चिंताजनक थे. अणुव्रत आंदोलन और जैन तेरापंथ के संस्थापक Acharya Tulsi के बारे में विस्तार से जानकारी Essay on Acharya Tulsi In Hindi में.

Essay on Acharya Tulsi In Hindi | आचार्य तुलसी पर निबंध

आचार्य तुलसी की जीवनी (Biography of Acharya Tulsi)

हिंसा साम्प्रदायिकता, तनाव, असामाजिकता के वातावरण और अनैतिकता के बढ़ते हुए दौर को देखकर जैन श्वेताम्बर धर्म के तेरापंथी सम्प्रदाय के नवे आचार्य तुलसी की अंतरात्मा डोल उठी. उनके मन में एक स्वाभाविक प्रश्न उठा कि इसलिए आजादी प्राप्त की थी ?. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सैनानियों ने जो सपने देखे थे, क्या वे स्वप्न रहेंगे, लाखों लाखों भारतियों ने आजादी की प्राप्ति के लिए क्या नही किया.

क्या हिसा, मारकाट, साम्प्रदायिकता, तनाव, बलात्कार, भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरण आदि का वातावरण इस देश की स्वतंत्रता को सुरक्षित रख सकेगा. इस स्थति को देखकर आचार्य तुलसी ने अपने कर्तव्य का अनुभव किया. सोचा यह चुप बैठने का समय नही है, उनका ह्रद्य जाग उठा. सदियों से प्रताड़ित जडवादी समाज को बदलने के संकल्प के साथ नई दिशा की ओर बढ़ने के लिए कुच किया.

इस तरह के संकल्प को लेने वाले आचार्य तुलसी जो जैन धर्म की श्वेताम्बर तेरापंथ परम्परा में नवें आचार्य थे. तुलसी का जन्म राजस्थान प्रदेश के नागौर जिले के लाडनू कस्बे में कार्तिक शुक्ल द्वितीया वि.स. 1971 को हुआ, इनके पिता का नाम झुमरलाल खटेड़ (ओसवाल) तथा माता का नाम वदनाजी था.

जब Acharya Tulsi की आयु 11 वर्ष की थी, तब तेरापंथ के अष्टमाचार्य कालुगणी के कर कमलों से मुनि दीक्षा ग्रहण की. बाईस वर्ष की आयु में ही वे तेरापंथ धर्म संघ के आचार्य बन गये, धर्मसंघ के माध्यम से आपने कई क्रांतिकारी कदम उठाए. प्रेक्षाध्यान, जीवन विज्ञान तथा अणुव्रत आंदोलन उन्ही कदमों में से थे. आप आशुकवि, उदभट लेखक, शोधक, प्रगतिशील विचारों के धनी समाज सुधारक और रूढ़ियों के प्रबल विरोधी थे. आपका निधन 23 जून 1997 को गंगाशहर बीकानेर में हुआ था.

अणुव्रत आंदोलन (anuvrat movement in hindi)

ऐसें क्रांतिकारी आचार्य तुलसी ने स्वतंत्र भारत को नई दिशा देने के लिए जो संकल्प लिया, उनकी घोषणा का सोभाग्य मार्च 1949 को दस हजार श्रोताओं की उपस्थिति में सरदारशहर चुरू को प्राप्त हुआ, अणुव्रत क्रांति की यह घोषणा आचार्य तुलसी ने वर्तमान राष्ट्रीय सामाजिक एवं युगीन परिस्थियों का विवेचन करते हुए नैतिक शक्ति के नवसंचार के सन्दर्भ में की.  और अणुव्रत की आचार सहिंता का महत्व बताते हुए जन जन को अपने कर्तव्य बोध से जाग्रत करने का आव्हान किया.

अणुव्रत के नियमों व व्रतों का पालन करने का आवहान किया. अणुव्रत की इस नियमावली की व्याख्या करते हुए उन्होंने 75 नियमों की जानकारी दी. ये छोटे छोटे नियम अर्थात अणु यानि छोटे तथा नियम अर्थात व्रत की उपादेयता बताई. इस व्याख्या को सुनकर तत्काल 71 व्यक्तियों ने अणुवर्ती की प्रतिज्ञा की.

अणुव्रत के नियम समाज के सभी व्यक्तियों के लिए यथा व्यापारी, विद्यार्थी, अध्यापक, एडवोकेट, राजनीतिगज्ञ, उद्योगपति, डॉक्टर, इंजिनियर आदि के लिए थे. सबकों अपने अपने कार्यों के अनुरूप आचरण कर समाज में नैतिकता का प्रसार करना ” Acharya Tulsi” के इस अणुव्रत आंदोलन का उद्देश्य था.

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