संयुक्त परिवार के गुण दोष – Advantages And Disadvantages Of Joint Family In Hindi

संयुक्त परिवार के गुण दोष – Advantages And Disadvantages Of Joint Family In Hindi: आपका स्वागत हैं आज हम हिन्दू संयुक्त परिवार गुण दोष लाभ हानि फायदे नुकसान पर पॉइंट निबंध आदि के बारे में Joint Family Advantages और जॉइंट फैमिली Disadvantages के विषय में आपकों विस्तृत जानकारी उपलब्ध करवा रहे हैं.

Advantages And Disadvantages Of Joint Family In Hindi

Advantages And Disadvantages Of Joint Family In Hindi

Merits and Demerits of Joint Family System in India What Is Advantages And Disadvantages: Discuss Merits And Demerits Of Joint Family [संयुक्त परिवार के गुण दोषों की विवेचना कीजिए] Hindu Sentiments Are Even Today In Favour Of The Joint Family Discuss.

संयुक्त परिवार के गुण – What are benefits & Advantages Of Joint Family

संयुक्त परिवार के प्रकार्यों एवं गुणों को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता हैं.

बच्चों का समुचित ढंग से पालन पोषण सम्भव– संयुक्त परिवार में बच्चों का पालन पोषण उचित तरीके से सम्भव हो पाता है, क्योंकि ऐसे परिवारों में परिवार के वृद्ध सदस्य भी रहते हैं. बच्चों के पालन पोषण में पूर्ण अनुभव होने के कारण वे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जबकि एकाकी परिवारों में बच्चों के पालन पोषण की समस्या पाई जाती हैं.

धार्मिक कार्य– समाज के सभी धार्मिक कार्य परिवार द्वारा एक इकाई के रूप में किये जाते हैं. परिवार के सदस्यों को परिवार का मुखिया एकत्र करता है तथा निश्चित समय, स्थान, दिन आदि उत्सवों, त्योहारों व अन्य धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करता व करवाता हैं.

परोपकारी एवं सामूहिक जीवन सम्भव– परिवार में उत्पन्न साधारण व गम्भीर समस्याओं का समाधान सभी सदस्य सामूहिक रूप से करते हैं. परिवार पर किसी प्रकार का संकट आने पर उसका सामना भी वे मिल जुलकर कर लेते हैं. जिससे ऐसे परिवार के सदस्यों को अधिक कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता हैं.

धन का उचित उपयोग– संयुक्त परिवार में एक सामान्य कोष होता है और इस कोष में वृद्धि के लिए परिवार का प्रत्येक सदस्य प्रयास करता हैं. इसी कोष में से परिवार के सदस्यों की सर्वोत्तम आवश्यकताओं के आधार पर धन खर्च किया जाता हैं. इससे अनावश्यक खर्चों से बचा जा सकता हैं. इसके अलावा संयुक्त रूप से रहने पर कम खर्च में ही अधिक व्यक्तियों का भरण पोषण हो जाता हैं.

सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा– दुर्घटना, बीमारी, मानसिक अस्वस्थता, नौकरी छूट जाना तथा वैधव्य आदि के समय पर संयुक्त परिवार ऐसे सदस्यों को संरक्षण प्रदान करता हैं. इसके अलावा संयुक्त परिवार अनाथ बच्चों, विधवाओं एवं वृद्ध व्यक्तियों को भी शरण देते हैं. संयुक्त परिवार अपने प्रत्येक सदस्य को हर अवस्था में आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर उन्हें चिंता से मुक्त करता है. अतः इस प्रकार संयुक्त परिवार अपने सदस्यों के लिए एक संकटकालीन बीमा हैं.

सम्पति के विभाजन से बचाव– संयुक्त परिवार में परिवार के सभी सदस्य एक साथ ही रहते हैं. जिससे परिवार की सम्पति का विभाजन नहीं होता हैं. उस सम्पति का उपयोग परिवार के सभी व्यक्तियों के लिए सामूहिक रूप से किया जाता हैं. इस सम्पति को सामूहिक रूप से व्यापार , उद्योग या अन्य धंधों में लगाकर इससे और अधिक वृद्धि की जा सकती हैं.

मार्गदर्शन का कार्य– संयुक्त परिवार में रहने वाले युवा सदस्यों को परिवार के बड़े सदस्य अपने अनुभव के आधार पर निर्देशित करते हैं. कई बार युवा सदस्यों के सामने ऐसी विकट स्थिति आ जाती है जिसका समाधान वे नहीं कर पाते हैं. ऐसे समय परिवार में वृद्ध सदस्य ही उन्हें मार्ग दर्शन देते हैं. और उन्हें गलत निर्णय लेने से बचा लेते हैं.

अनुशासन एवं नियंत्रण– संयुक्त परिवार में व्यक्ति की अपेक्षा परिवार को अधिक महत्व दिया जाता है और परिवार का प्रतिनिधित्व मुखिया करता है. परिवार के सभी सदस्य उसके नियंत्रण में रहते हैं. इससे सदस्यों में अनुशासन बना रहता हैं. कर्ता अपनी शक्तियों के माध्यम से परिवार के सदस्यों के स्वच्छन्द आचरण पर रोक लगाता हैं.

श्रम विभाजन- संयुक्त परिवार में परिवार के सदस्यों के बीच में उनकी आयु, योग्यता, लिंग एवं रूचि के अनुसार ही कार्यों का विभाजन किया जाता हैं जिससे प्रत्येक सदस्य की कार्यक्षमता बनी रहती हैं. अतः पुरुषों का धनोपार्जन एवं बाह्य कार्य सौपे जाते हैं एवं स्त्रियों को आंतरिक कार्य जैसे बच्चों का लालन पालन, घर की देख भाल आदि.

समाजीकरण का कार्य– संयुक्त परिवार में बालक विभिन्न सदस्यों के सम्पर्क में रहते हुए प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करते हैं. अतः परिवार के वृद्ध सदस्यों के अनुभव का लाभ उन्हें प्राप्त होता है और साथ ही वृद्ध सदस्यों द्वारा उनका समय समय पर मार्गदर्शन भी होता रहता हैं वे बालकों के समाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वृद्ध सदस्यों के संसर्ग में बालकों में सद्गुणों का विकास होता हैं उनमें प्रेम, सहयोग, सत्य, सहनशीलता, परोपकार, सेवा आदि की भावना जागृत होती हैं.

मनोरंजन का केंद्र– संयुक्त परिवारों में सदस्यों की अधिकता होने के कारण इनमें हमेशा चहल पहल व हंसी ख़ुशी का वातावरण बना रहता हैं. श्रीमती कर्वे ने कहा है कि संयुक्त परिवार में समय समय पर कोई न कोई सामाजिक कार्य होता ही रहता हैं. जैसे कभी लड़के या लड़की का विवाह हो रहा है, तो कभी नामकरण संस्कार का उत्सव मनाया जा रहा हैं, तो कभी किसी का जन्मदिन मनाया जा रहा है. कभी देवर भाभी को हंसी मजाक तो कभी नन्द भौजाई की नोंक झोंक. अतः ऐसे में संयुक्त परिवार के सदस्यों का पर्याप्त व सस्ता मनोरंजन होता रहता हैं.

सांस्कृतिक स्थायित्व– संयुक्त परिवारों के माध्यम से ही सामाजिक प्रथाओं, परम्पराओं, रूढ़ियों और सामाजिक मान्यताओं का स्थानांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में होता हैं. ये परिवार भारतीय संस्कृति की विभिन्न विशेषताओं को ज्यों की त्यों भावी पीढ़ी में स्थानांतरित कर सांस्कृतिक स्थायित्व में अपना योगदान देते हैं.

राष्ट्रीय एकता एवं देश सेवा– संयुक्त परिवार में रहने से व्यक्ति में प्रेम, सहानुभूति, त्याग एवं सहयोग की भावना का विकास होता हैं. इन भावनाओं से राष्ट्रीय एकता को बल मिलता हैं. संयुक्त परिवार में रहकर कुछ सदस्य अपना जीवन देश सेवा में भी लगा सकते हैं, क्योंकि परिवार में सदस्यों की अधिक संख्या होने के कारण वे अपने आपकों पारिवारिक दायित्वों से मुक्त कर सकते हैं.

संयुक्त परिवार के दोष Disadvantages Of Joint Family

Discuss The Demerits Of Joint Family [संयुक्त परिवार के दोषों की विवेचना वर्णन]

औपचारिक सम्बन्ध- देसाई का कहना है कि संयुक्त परिवार के सदस्यों के सम्बन्धों में आत्मीयता वास्तविक रूप से होकर दिखावा मात्र होती हैं. संयुक्त परिवार का एक बड़ा कुटुंब होता हैं. सम्बन्धियों को आपस में एक दूसरे को नहीं चाहते हुए भी साथ साथ रहना पड़ता हैं. उनके सम्बन्धों में प्रायः कृत्रिमता ही अधिक दिखाई देने लगती हैं.

द्वेष एवं क्लेश का केंद्र– संयुक्त परिवार एक ऐसा केंद्र है जिसके सदस्यों में छोटी छोटी एवं व्यर्थ बातों के लिए एक दूसरे में तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न होते रहते हैं. विशेषकर भारतीय स्त्रियों में अधिकांशतः अशिक्षित एवं अज्ञानी होने के कारण अधिक संघर्ष होते रहते हैं. व्यक्तिगत व्यय एवं बच्चों को लेकर स्त्रियों में आपसी द्वेष एवं मन मुटाव पैदा हो जाता है और पारिवारिक सहयोग एवं स्नेह कटुता एवं संघर्ष में बदल जाता है जिसका अंतिम परिणाम होता है परिवार का विभाजन.

आर्थिक निर्भरता की स्थिति एवं व्यक्ति की कार्यकुशलता में बाधक– संयुक्त परिवार में सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें कुछ सदस्य ही धनोपार्जन करने वाले होते हैं और अधिकांश सदस्य दूसरे पर निर्भर रहने वाले होते हैं. फिर भी परिवार के मुखिया द्वारा प्रत्येक सदस्य को समान सुविधाएं दी जाती हैं. इससे कुछ सदस्य कामचोर हो जाते हैं दूसरी ओर परिश्रम करने वाले सदस्यों को भी विशेष प्रोत्साहन नहीं मिलने के कारण वे भी अपने कार्य के प्रति उदासीन होने लगते हैं. परिणामस्वरूप कार्यकुशलता का हास होता हैं.

स्त्रियों की दुर्दशा– संयुक्त परिवार प्रणाली एक ऐसी प्रणाली हैं जिसमें सास, बहुएं, ननदें पारिवारिक जीवन को नारकीय बना देती हैं. ऐसे परिवारों में स्त्रियों का जीवन घर की चार दीवारी के अंदर ही निरंतर कार्य करते हुए, डांट फटकार खाते हुए एवं विभिन्न प्रकार के ताने सुनते हुए गुजरता हैं. स्त्रियों को अपने बड़े बूढ़ों के कठोर नियंत्रण में रहना पड़ता हैं.

रुढिवादिता का केंद्र- संयुक्त परिवार प्रायः रुढिवादिता के सशक्त केंद्र होते हैं. संयुक्त परिवार, बाल विवाह, पर्दा प्रथा, जाति, अन्तर्विवाह आदि अनेक सामाजिक बुराइयों के जन्मदाता एवं पोषक रहे हैं. संयुक्त परिवारों ने समाज में नवीन परिवर्तनों का सदैव विरोध ही किया हैं.

भय का वातावरण– डॉ रामबिहारी सिंह तोमर जैसे समाजशास्त्रियों का कथन हैं कि संयुक्त परिवार के सदस्यों में भाईचारे एवं सहयोग की भावना का अभाव होता हैं. अतः वे एक दूसरे को किसी मामले में सुझाव देने से भी बचते रहते हैं. वे यही सोचते हैं कि उनके सुझावों से कोई खराब परिणाम निकल गया तो उनकी प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ेगा. अतः ऐसे भय का वातावरण जीवन में वेदना को बढ़ा देता हैं.

बाल विवाहों को प्रोत्साहन मिलना– संयुक्त परिवार एक ऐसी व्यवस्था हैं जिसमें वृद्ध लोग मोक्ष प्राप्ति हेतु अपने बच्चों का पौत्र पौत्रियों का विवाह, शीघ्र करना उचित समझते हैं. उनके मस्तिष्क में यह भावना विद्यमान रहती हैं कि पौत्र पौत्रियों का आँखों के सम्मुख विवाह कर वे मोक्ष प्राप्त कर लेंगे. यही कारण हैं कि भारतीय ग्रामीण समाजों में अभी भी बाल विवाह प्रणाली प्रचलित हैं.

अधिक संतानोत्पत्ति– संयुक्त परिवार में बच्चों में वृद्धि की प्रतियोगिता होती रहती हैं क्योंकि संयुक्त परिवार के सदस्य को स्वावलंबी न होने पर भी अपने भरण पोषण की चिंता नहीं रहती हैं. इसलिए व्यक्ति अपने धार्मिक विधि विधानों की पूर्ति के लिए न होने पर पुत्र प्राप्ति के लिए कई पुत्रियों को जन्म देता हैं, जिससे जनसंख्या में वृद्धि होती हैं.

व्यक्ति के विकास में बाधक– संयुक्त परिवार में परिवार के सभी सदस्यों के साथ समानता बरती जाती हैं. ऐसे परिवार में होनहार बालकों को अपने व्यक्तित्व के समुचित विकास का अवसर नहीं मिल पाता है, क्योंकि उन बालकों को जो विशेष सुविधाओं की आवश्यकता होती है उन्हें वे नहीं मिल पाती हैं.

सामाजिक समस्याओं का पोषक– संयुक्त परिवार के माध्यम से कई समस्याएं जैसे दहेज प्रथा, विधवा विवाह पर रोक, पर्दा प्रथा, जाति अन्तर्विवाह, अशिक्षा, जातिगत भेदभाव में वृद्धि आदि उत्पन्न होती हैं. यदपि इन समस्याओं के जन्म के लिए और अनेक कारण उत्तरदायी हैं तथापि संयुक्त परिवार का भी इन समस्याओं के बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं.

गतिशीलता में बाधक – संयुक्त परिवार का स्नेहयुक्त वातावरण व्यक्तियों को परिवार में ही बने रहने और किसी प्रकार का जोखिम न उठाने की प्रेरणा प्रदान करता है वह अपने रक्त सम्बन्धियों के बीच ही रहना चाहता हैं, चाहे उस स्थान पर रोजगार मिलने की सुविधा हो या नहीं. इस प्रकार संयुक्त परिवार सामाजिक गतिशीलता में बाधक होते हैं.

मुखिया की स्वेच्छाकारिता– डॉ मोतीलाल गुप्ता के अनुसार संयुक्त परिवार का एक यह भी दोष हैं कि संयुक्त परिवार के सभी सदस्यों को मुखिया के आदेशानुसार ही कार्य करना पड़ता हैं. पारिवारिक मामलों में मुखिया का निर्णय ही अंतिम निर्णय माना जाता हैं सभी सदस्यों को उसके निर्णय के सम्मुख अपनी इच्छाओं को दबाना पड़ता हैं.

गोपनीयता का अभाव– संयुक्त परिवार में सदस्यों की संख्या में तो वृद्धि होती है परन्तु उसी अनुपात में रहने के स्थान में वृद्धि नहीं हो पाती, जिसके कारण गोपनीय स्थानों का अभाव पाया जाता हैं. ऐसे वातावरण में नव विवाहित दम्पति रात्रि में ही कुछ समय तक एक दूसरे के साथ रह सकते हैं. दिन में आना सदस्यों की उपस्थिति में उनको आपस में बात करने की स्वतंत्रता नहीं रहती हैं जिससे पति पत्नी में सच्चे दाम्पत्य एव आपसी सद्भावना का विकास नहीं हो पाता हैं.

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