बाल श्रम से जूझता बचपन पर निबंध – Bal Shram Short Essay In Hindi

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बाल श्रम से जूझता बचपन पर निबंध – Bal Shram Short Essay In Hindi

बाल श्रम से जूझता बचपन पर निबंध - Bal Shram Short Essay In Hindi

प्रस्तावना– प्रथमे नार्जिता विद्या कहकर जीवन के आरम्भ में बचपन में विद्या ग्रहण न करने वाले को प्रशंसनीय नहीं माना गया हैं. बचपन शारीरिक और मानसिक विकास का समय हैं यह समाज का कर्तव्य हैकि वह बालकों को इसका अवसर उपलब्ध कराए. समाज की आर्थिक संरचना ऐसी हो कि बच्चों को पेट भरने के लिए श्रमिक बनकर न जूझना पड़े. आचार्य चाणक्य ने उन माता पिता को शत्रु की संज्ञा दी है, जो अपने बच्चों की शिक्षा नहीं दिलाते.

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठित

बाल श्रम– 14 वर्ष से कम आयु के बालक बालिका को बाल श्रमिक माना जाता हैं. इस आयु में शारीरिक श्रम करना ही बाल श्रम हैं. भारतीय संविधान में 14 वर्ष से कम उम्रः के बालक बालिकाओं से श्रमिक के रूप में कार्य लेना गैर कानूनी तथा वर्जित हैं. इस आयु वर्ग के बालकों से किसी व्यावसायिक संस्था अथवा घर में काम लेना निषिद्ध घोषित किया गया हैं.

बाल श्रम की स्थिति– संविधान सम्मत न होने पर भी हमारे देश में बाल श्रम निरंतर जारी हैं. छोटे छोटे बच्चें कारखानों, लघु उद्योगों, दुकानों तथा घरों में काम करते देखे जा सकते हैं. घरों में बर्तन सफाई का काम करने, चाय की दुकानों पर कप प्लेट धोने, साइकिल स्कूटर की दुकानों पर पंचर जोड़ते, हलवाइयों की दुकानों पर बर्तन माजते आदि अनेक छोटे मोटे काम करते बच्चे देखे जा सकते हैं. कुछ बच्चें तो कांच उद्योग जैसे उद्योगों में भी कार्यरत देखे जा सकते हैं जिसमें कार्य करने में गंभीर जोखिम रहता हैं.

बाल श्रम के कारण– बाल श्रम भारत में जारी रहने का प्रमुख कारण गरीबी हैं. माता पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होती कि वे अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ने भेजें. बालकों के लिए शिक्षा की निशुल्क तथा अनिवार्य व्यवस्था होने पर भी वे उससे वंचित रहते हैं. मध्यान्ह पोषण आहार भी उनको वहां जाने के लिए आकर्षित नहीं करता. उनके लिए चार पैसे कमाकर पेट भरने में सहयोग देना जरुरी होता हैं.

बाल श्रमिकों का शोषण– घरों अथवा उद्योगों में काम करने वाले बालकों का दिन रात शोषण होता रहता हैं. उनको नियत समय से अधिक बारह  चौदह घंटे काम करना पड़ता हैं. उनका वेतन किसी वयस्क श्रमिक के वेतन से आधा या चौथाई ही होता हैं बीमारी अथवा किसी अन्य कठिनाई के कारण काम पर न आने पर उनको अवकाश नहीं मिलता तथा वेतन काट लिया जाता हैं.

उनका कार्य करने का स्थान गंदा और अस्वास्थ्यकर होता हैं. जिससे वे बीमार हो जाते हैं. उनको बात बात पर डांट फटकार और मारा पीटा जाता हैं. नियोक्ता जानते हैं कि उनका दुर्व्यवहार सहकर भी बच्चे काम करेंगे. उनके मजबूर माता पिता उनको काम पर अवश्य भेजेगे. वे भयंकर सर्दी, गर्मी, बरसात सहकर भी काम करते हैं. उनके अपना खाना साथ ले जाना पड़ता हैं. नियोक्ता की ओर से उनकों कोई सुविधा नहीं दी जाती हैं.

मालिक जानता है कि ये बाल श्रमिक उसकी किसी भी बात का विरोध नहीं करेगे. अतः वह उसके साथ मनमानी करता हैं और तरह तरह से उनका शारीरिक और मानसिक शोषण करता हैं.

बालकों का बचपन बचाने की आवश्यकता– बाल श्रम से बालकों का बचपन संकट में हैं. उसको बचाना बहुत जरुरी हैं. भारत के उत्तम भविष्य के लिए इन बालकों को शिक्षा प्राप्त करने तथा शारीरिक मानसिक विकास करने का अवसर मिलना ही चाहिए, यह समाज और सरकार दोनों का सम्मिलित दायित्व हैं.

माता पिता को छोटे परिवार का महत्व समझाया जाए. उनको बालक के भविष्य के लिए उसे नौकरी करने के लिए न भेजकर स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया जाय. सुद्रढ़ आर्थिक स्थिति के लोग मिलकर ऐसे बच्चों की मदद करें. सामाजिक संस्थाएं आगे चलकर उचित वातावरण तैयार करे. सरकार गरीब परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के उपाय करे तथा बाल श्रम को रोकने के लिए कठोर कानून भी बनाए. तभी बालकों का बचपन सुरक्षित हो सकता हैं.

उपसंहार– बच्चे देश का भविष्य होते हैं. उनकी प्रगति और विकास पर ही देश की प्रगति और विकास पर निर्भर हैं. यदि उनके बचपन को कारखानों की भट्टियों में झोकना जारी रहेगा तो देश का भविष्य भी उसकी रास से दूषित हो जाएगा. अत आवश्यकता यह हैं. कि इस दिशा में इमानदारी पूर्वक गम्भीर प्रयास किये जाए.

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ESSAY ON CHILD LABOUR IN HINDI | बाल श्रम पर निबंध हिंदी में

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