महाराणा प्रताप का हल्दीघाटी का युद्ध | Battle Of Haldighati In Hindi

maharana pratap and akbar fight in hindi: हल्दीघाटी का युद्ध कब हुआ, कौन जीता, युद्ध की डेट, अकबर और महाराणा प्रताप, haldighati yudh history का इतिहास की जानकारी यहाँ दी गई हैं. राजस्थान की मेवाड़ धरा से अकबर की अधीनता अस्वीकार करने वाले राणा प्रताप का जीवन परिचय एवं इतिहास भारत का बच्चा बच्चा जानता हैं. प्रताप की वीरता के गीत व चर्चे गली गली में गुजते हैं. 18/21 जून 1576 को उदयपुर के खमनौर की पहाड़ियों में स्थित हल्दीघाटी मैदान में लड़ा गया यह ऐतिहासिक युद्ध राणा प्रताप और अकबर के सेनापति मानसिंह के बिच हुआ था.

हल्दीघाटी का युद्ध | Battle Of Haldighati In Hindiमहाराणा प्रताप का हल्दीघाटी का युद्ध | Battle Of Haldighati In Hindi

मेवाड़ से 1567-1568 ई. में हुए संघर्ष की भयंकरता से अकबर परिचित था. अतः शान्ति प्रयासों एवं कूटनीति से समस्या को सुलझाने का प्रयास किया. अकबर ने एक एक करके चार शिष्ट मंडलों को महाराणा प्रताप के पास भेजा किन्तु महाराणा प्रताप ने उसके कुटनीतिक प्रयासों को एकदम विफल कर दिया.

हल्दीघाटी का युद्ध कौन जीता ? (Who Won The Battle Of Haldighati In Hindi)

राणा प्रताप अब अनुभव हो गया था कि युद्ध अवश्यंभावी हैं, तब प्रताप ने युद्ध की तैयारी प्रारम्भ कर दी. मेवाड़ के मूख्य पहाड़ी नाकों (पहाड़ी क्षेत्र में प्रवेश के संकरे मार्ग) एवं सामरिक महत्व के स्थानों पर अपनी स्थति मजबूत करना आरम्भ कर दी. मैदानी क्षेत्रों से लोगों को पहाड़ी इलाकों में भेज दिया तथा खेती करने पर पाबंदी लगा दी.

ताकि शत्रु सेना को रसद सामग्री नही मिल सके. प्रताप को सभी वर्गों का पूर्ण सहयोग प्राप्त था. अतः जनता युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार थी. उधर अकबर ने अन्य सैनिक अभियानों से मुक्ति पाकर मेवाड़ की ओर ध्यान केन्द्रित किया. उसने मानसिंह को प्रधान सेनापति बनाकर राणा प्रताप के विरुद्ध युद्ध करने भेजा.

हल्दी घाटी युद्ध में राणा प्रताप की सेना (Rana Pratap Force In Battle Of Haldighati)

जो लगभग पांच हजार सैनिकों के साथ आया. 18 जून 1576 ई को प्रातः हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध शुरू हुआ. महाराणा प्रताप [महाराणा प्रताप का इतिहास यहाँ क्लिक कर जाने] ने युद्ध की शुरुआत की. उनके साथ रावत किशनदास, भीमसिंह डोडिया, रामदास मेड़तिया, रामशाह तंवर, झाला मान, झाला बीदा, मानसिंह सोनगरा आदि थे. Battle Of Haldighati

प्रताप के चंदावल दस्ते में पुरोहित गोपीनाथ, जयमल मेहता, चारण जैसा आदि तथा मध्य भाग में बायीं ओर भामाशाह व अन्य सैनिक थे. चंदावत में ही घाटी के मुहानों पर राणा पूंजा के नेतृत्व में भील लोग तीर कमान के साथ मौजूद थे. हरावल दस्ते में चुण्डावतों के साथ अग्रिम पंक्ति में हकीम खां सूर भी थे.

अकबर और राणा प्रताप के बिच युद्ध (haldighati ka yudh maharana pratap)

मुगल सेना पर सर्वप्रथम आक्रमण इन्होने किया, जिससे मुगल सेना पूर्ण रूप से अस्त व्यस्त हो गई. रही कसर प्रताप के आक्रमण ने पूरी कर दी. मुगल इतिहासकार बदायुनी स्वीकार करता हैं कि मेवाड़ी सेना के आक्रमण का वेग इतना तीव्र था कि मुगल सैनिकों ने बनास के दूसरे किनारे से पांच छः कोस तक (10-15 किमी) भागकर अपनी जान बचाई.

अब प्रताप ने अपने चेतक घोड़े पर छलांग लगाकर हाथी पर सवार मानसिंह पर अपने भाले से वार किया पर मानसिंह बच गया. उसका हाथी मानसिंह को लेकर भाग गया. इस घटना में चेतक का पिछला पैर हाथी की सूड में लगी तलवार से जख्मी हो गया. प्रताप को शत्रु सेना ने घेर लिया.

लेकिन फिर भी प्रताप ने संतुलन बनाए रखा तथा अपनी शक्ति का अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए मुगल सेना में उपस्थित बलिष्ठ बहलोल खां के वार का ऐसा प्रतिकार किया कि खान के जिरह बख्तर सहित उसके घोड़े के भी दो फाड़ हो गये. इस द्रश्य को देखकर मुगल सेना में हडकम्प मच गया. अब प्रताप ने युद्ध को मैदान की बजाय पहाड़ों में मोड़ने का निश्चय किया.

उसकी सेना के दोनों भाग एकत्र होकर पहाड़ों की ओर मुड़े और अपने गन्तव्य स्थान तक पहुचे. तब तक मुगल सेना को रोके रखने का दायित्व झाला मान को सौपा. झाला मान ने अपना जीवन उत्सर्ग करके भी अपने कर्तव्य का पालन किया. इस युद्ध में मुगल सैनिकों का मनोबल इतना टूट चुका था कि उसमें प्रताप की सेना का पीछा करने का साहस नही रहा.

हल्दीघाटी युद्ध का परिनाम (बैटल ऑफ हल्दीघाटी इन हिंदी)

इतिहास में हल्दीघाटी के युद्ध को अनिर्णायक माना जाता हैं. इस युद्ध के दौरान राणा प्रताप के घोड़े जिनका नाम चेतक था, उसकों शहादत प्राप्त हुई थी. युद्ध के परिणाम के रूप में मुगलों के अधिकार में मेवाड़ का काफी क्षेत्र आ गया था. प्रताप चैन से बैठने की बजाय इसे छुडाने का अवसर ढूंढने लगे. जैसे ही अकबर व्यस्त हुआ, प्रताप में उन क्षेत्रों पर अपना पुनः अधिकार कर लिया.

आखिर आजीवन मुगलों की आजीवन अधीनता स्वीकार न करने वाले प्रताप की 1597 में चावंड में मृत्यु हो गई थी. आज भी राणा प्रताप के स्वाभिमान और देश प्रेम के गीत घर घर गुजते हैं. ऐसे स्वतंत्रता प्रेमी मेवाड़ के सपूत को हमारा कोटि कोटि नमन.

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