Beti Bachao Beti Padhao Essay | बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध

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Beti Bachao Beti Padhao Essay | बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध

विधाता की इस अनोखी स्रष्टि में नर और नारी इस जीवन के ऐसे दो पहिये है, जो दाम्पत्य बंधन में बधकर स्रष्टि प्रक्रिया को आगे बढ़ाते है. परन्तु वर्तमान समय में अनेक कारणों से लिंग भेद का घ्रणित रूप सामने आ रहा है जो पुरुष सतात्मक समाज में कन्या भ्रूण हत्या का पर्याय बनकर बालक-बालिकाओ का समान अनुपात बिगाड़ रहा है. जिसके कारण आज बेटी  बचाओं बेटी पढ़ाओ जैसी समस्या का नारा देना हमारे लिए शोचनीय है. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ऐसी श्रेष्ट परम्परा वाले देश के लिए यह नारा कलंक है.

वर्तमान में समाज की मानसिकता

वर्तमान में मध्यमवर्गीय समाज बालिकाओं को पढ़ाने की द्रष्टि से अपनी परम्परा वादी सोच को ही महत्व देता चला आ रहा है, क्युकि वह बेटी को पराया धन ही मानता है. वही बेटे को कुल की परम्परा बढ़ाने वाला व वृद्धावस्था का सहारा मानते है. इसलिए बेटी को पालना पोषना, पढ़ाना लिखाना, उसकी शादी में दहेज़ देना आदि बेवजह भार मानता है.

इस तरह कुछ स्वार्थी सोच वाले कन्या के जन्म को ही नही चाहते है. इसलिए वे चिकित्सकीय साधनों द्वारा गर्भाव्यवस्था में ही लिंग परीक्षण करवाकर कन्या जन्म को रोक देते है. परिणामस्वरूप जनसंख्या में बालक-बालिकाओं के अनुपात में बहुत अंतर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है. जो भारी दाम्पत्य जीवन के लिए एक बड़ी बाधा बन रहा है.

लिंगानुपात में बढ़ता अंतर

आज के समाज की बदली मानसिकता के कारण लिंगानुपात घटने का कारण बन रहा है. विभिन्न दशकों में हुई जनगणना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. सन 2011 की जनगणना के आधार पर बालक और बालिकाओं का अनुपात एक हजार पर 900 के आस-पास पहुच गया है. इस लिंगानुपात के बढ़ते अंतर को देखकर भविष्य में वैवाहिक जीवन में आने वाली कठिनाइयो के प्रति समाज ही नही सरकार की चिंता भी बढ़ गई है.

इस चिंता से मुक्त होने होने की दिशा में सरकार ने बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ का नारा दिया है.

बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ अभियान एवं उद्देश्य-

बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ अभियान के सम्बन्ध में हमारे राष्ट्रपति ने सबसे पहले दोनों सदनों के सयुक्त अधिवेशन के समय जून 2014 को संबोधित किया, जिससे इस आवश्यकता पर बल दिया गया कि बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ उनका सरक्षण और सशक्तिकरण किया जाए. इसके बाद यह निश्चय किया गया कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय इस अभियान का मुख्य मंत्रालय रहेगा.

जो कि परिवार कल्याण मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ मिलकर इस कार्य को आगे बढ़ाएगे. इस अभियान के अंतर्गत लिंग परीक्षण के आधार पर बालिका भ्रूण हत्याओं को रोकने के साथ बालिकाओं को पूर्ण सरक्षण तथा उनके विकास के लिए शिक्षा से सम्बन्धित उनकी सभी गतिविधियों में पूर्ण भागीदारी होगी. उनको शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और कौशल विकास के कार्यक्रमों में मिडिया के माध्यम से हर तरह से प्रोत्साहित किया जाएगा. संविधान के माध्यम से लिंगाधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नही किया जाएगा. साथ ही लिंग परीक्षण प्रतिबंधित होगा.

प्रस्तुत है बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम पर आधारित एक कविता.

ये तो तय है कि बेटी नहीं बेटों से कम है,
बेटें भर लेंगे उड़ाने ऊँची तो बेटियों के होसलों में भी दम हैं।
कर नहीं पाई सपने साकार अपने तो क्या गम है
मेरी बेटी करेगी हासिल वो मुक़ाम ये क्या कम है
ये तो तय है कि बेटी नहीं बेटों से कम है…
ये जीवन है एक दंगल जहाँ एक तरफ़ मुसीबतो की आँधियाँ और एक ओर हम है,
आँधियों को कहो कि औक़ात में रहे क्योंकि पंखों से नहीं होसलों से उड़ते हम हैं।
ये तो तय है कि बेटी नहीं बेटों से कम है….

दिल में विश्वास,आँखों में मुस्कान, जज़्बा और लगन ये बातें अहम है,
छोरी है छोरों से कम, इस बात का दुनिया को वहम है।
ये तो तय है कि बेटी नहीं बेटों से कम है….
देखा कैसे गीता-बबीता ने छोरों के छक्के है छुड़ाये, फिर नहीं किया रहम है,
देश के लिए जीता गोल्ड मेडल तो हो गये भाव विभोर हम है,
दूर है तो क्या मातृभूमि से जुड़े हुये तो हम है।
ये तो तय है कि बेटी नहीं बेटों से कम है,
बेटें भर लेंगे उड़ाने ऊँची तो बेटियों के होसलों में भी दम हैं।
अपनी लेखनी से
Varsha Baid

उपसंहार

Beti Bachao Beti PADHAO योजना को कई चरणों के साथ पूरा किया जाने का लक्ष्य रखा गया है. भारत सरकार ने इसके लिए सर्वप्रथम सम्पूर्ण भारत के ऐसे 100 शहरों का चयन किया है जहाँ लिंगानुपात सबसे न्यूनतम स्तर पर है. इन स्थानों पर सरकार की सम्पूर्ण मशीनरी सहित गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से पूरा ध्यान केन्द्रित कर कुछ त्वरित परिणाम प्राप्त करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है. इसमे कन्या भ्रूण हत्या पर पूर्ण पाबंदी, ऐसा करने वालों के खिलाफ कठोरतम सजा की व्यवस्था, बेटियों का शिक्षा द्वारा सशक्तिकरण कर उन्हें समाज के सभी विकास कार्यो में समान भागीदारी प्रदान करने का प्रावधान किया गया है.

बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ जैसे समस्यात्मक अभियान आज हमारे देश के सामने एक बहुत बड़ी सामजिक समस्या के रूप में आकर खड़ा हो गया है. इस समस्या के निदान के लिए हमे रुढ़िवादी सोच का परित्याग करना चाहिए. ईश्वर के प्रति आस्था वक्त करते हुए, सन्तान उसी की देन है. और लड़का लड़की एक समान है हम किसी के भी भाग्य विधाता नही है.

ईश्वर द्वारा ही सब कुछ निर्धारित होता है. इसलिए ईश्वर ही कर्ता है हम नही. इस प्रकार की परिवर्तित सोच से ही बिगड़ते लिंगानुपात में सुधार होगा और बेटियों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होगा. हम समझ जाएगे कि बेटी घर का भार नही है, घर की रौशनी होती है.

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