Bhagat Singh Biography | भगत सिंह का जीवन परिचय

Bhagat Singh Biography जब भी स्वतंत्रता आंदोलन या क्रांति का नाम आता हैं, तो यक़ीनन सभी के जेहन में इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करने वाले सरदार भगत सिंह की छवि सामने आ जाती हैं. आजादी के पूर्व अंग्रेजी हुकुमत के अत्याचार को सीधी चुनौती देकर ब्रिटिश सम्राज्य के अंत की नीव रखने वाले भगत सिंह आज भी करोड़ो भारतीयों के आदर्श हीरो हैं. देशभक्ति की कहानियों में गांधी, नेहरु और बोस जैसे नेताओं की जीवनी और स्वतंत्रता प्राप्ति में योगदान की कहानियां पढ़ने को मिलती हैं. भगत सिंह उनमे से ऐसे देशभक्त नौजवान देशभक्त थे, जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में ही राष्ट्र की वेदी पर कुर्बान कर दिया था.

Bhagat Singh Biography (भगत सिंह का जीवन परिचय )

देशभक्ति की मिसाल कहे जाने वाले भगत सिंह की कई पीढियां अंग्रेजो के खिलाफ थी. भगत सिंह जी का जन्म 27 सितम्बर 1907 पंजाब के बंगा नामक गाँव के एक सिख परिवार में हुआ था. इनके पिता सरदार किशन सिंह चाचा अजित सिंह उस समय जेल में थे. सरदार भगत सिंह के जन्म के समय ही उनके चाचा अजित सिंह जेल से आजाद हुए थे. इस तरह इनके जन्म को भाग्यशाली मानकर सभी ने भक्त नाम से पुकारना शुरू कर दिया था.

इनके माता-पिता का नाम क्रमश विद्यावती, सरदार किशन सिंह सिन्धु था. भगत के परिवार में सात भाई और एक बहिन का भरा पूरा परिवार था. एक देशभक्त परिवार में जन्में भक्त के चाचा अजित सिंह और पिता किशन singh महान स्वतंत्रता सेनानी थे. चाचा अजित सिंह जी ने सैयद हैदर रजा के साथ मिलकर अंग्रेजो के विरुद्ध एक सगठन खड़ा किया था. भक्त के चाचा पर 22 से अधिक पुलिस केस दर्ज थे. पुलिस से बचने के लिए उन्होंने कुछ वर्षो के लिए भारत छोड़ दिया था. इस प्रकार के देशभक्ति के माहौल में जन्मे और पले बड़े भगत सिंह जैसा देशभक्त इस देश को मिला.

शिक्षा (Education)

भगत सिंह की शुरूआती शिक्षा उनके बंगा गाँव की एक शाळा से ही हुई. 1916-17 में आरम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद इन्होने आगे की पढाई के लिए लाहौर (वर्तमान में पाकिस्तान में) के डी ए वी कॉलेज में एडमिशन लिया. यहाँ उनकी मुलाकात सुखदेव, भगवती चरन व कुछ अन्य उग्र क्रन्तिकारी युवाओं से गहरी मित्रता हो गईं. वे अक्सर कॉलेज में आयोजित नाटक और विभिन्न समारोहों के द्वारा विद्यार्थियो में देशभक्ति का भाव पैदा करने का कार्य किया. जब उनके परिवार वालों ने शादी के बारे में उनके विचार जानना चाहा तो स्पष्ट मना करते हुए, भारत की स्वतंत्रता से पूर्व यदि मैंने शादी की तो दुल्हन की मौत हो जाएगी.

उसी समय पंजाब में लागू नए अंग्रेजी कानून रोलेट एक्ट के विरोध में जगह-जगह पर विरोध प्रदर्शन होने लगे. जिनमे भगत सिंह ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया. 13 अप्रैल 1919 के दिन जब जनरल डायर के आदेश पर पंजाब के जलियावाला बाग़ नामक स्थान पर शांतिपूर्ण विरोध सभा कर रहे हजारों निहत्थे लोगों को मौत के घाट उतार दिया. इस घटना से क्रुद्ध होकर भगत सिंह और उनकी मित्र मंडली अंग्रेजी शासन की दुश्मन हो गई. इन्होने अंग्रेजो से इस हत्याकांड का प्रतिशोध लेने का निर्णय ले लिया.

असहयोग आंदोलन में भगत सिंह (Bhagat Singh in non-cooperation movement)

बेकसूर हजारों लोगों की जलियांवाला बाग़ हत्याकांड में मौत के बाद भगतसिंह उस स्थान पर पहुचे. उन्होंने उस बाग़ की मिटटी को एक बोतल में भरकर इसका बदला लेने का सकल्प ले लिया. इस घटना के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ असहयोग आंदोलन छेड़ दिया था. 1920 में उन्होंने लाहौर में आरम्भ हुए नेशनल कॉलेज में प्रवेश लिया. यहाँ इनकी मुलाक़ात कई देशभक्त क्रांतिकारियों से हुई.

कॉलेज को अपनी अंग्रेज विरोधी गतिविधियों का केंद्र बनाकर नवयुवकों में देशभक्ति की भावना को विकसित करने का जिम्मा उठा लिया. जब वर्ष 1928 में साइमन कमीशन भारत आया तो सबसे पहले यह लाहौर पंहुचा. यहाँ के लोकप्रिय जननेता लाला लाजपत राय जी के नेतृत्व में साइमन गो बेक नारा लेकर पूरा शहर बाधित कर दिया. स्थति को हाथ से निकलते देख पुलिस अधिकारी सोल्डर्स ने सभी आंदोलकारियो पर लाठीचार्ज करने का आदेश दे दिया था.

हजारों लोगों की इस भीड़ में लाला लाजपत राय भी थे, जिन पर सुरक्षा कर्मियों ने बेरहमी से लाठियों से वार किया. सिर पर गंभीर वार से लाला लाजपत राय खून से लथपथ होकर गिर पड़े. भगत सिंह तथा उनके साथियो ने तैसे वैसे उन्हें अस्पताल पहुचाया मगर 17 नवम्बर 1928 को लाला लाजपत राय जी की मृत्यु हो गई.

सोल्डर्स तथा उनके साथियों की हत्या (Soldiers and their accomplices killed)

अपने आदर्श नेता और मार्गदर्शक लाला लाजपत राय की मृत्यु संदेश ने भगत सिंह को पूरी तरह झंकझोर दिया. इस घटना से पहुचे आघात से पूरा देश व्यतीत था. अतः चन्द्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त, राजगुरु और भगत सिंह ने लालाजी की मौत के जिम्मेदार स्कोट को गोली से मारने की योजना बनाई. योजना के मुताबिक़ उन्होंने पुलिस चौकी से बाहर निकलते सोणडर्स और उनके साथियो की हत्या कर दी. इस तरह की हत्या के बाद उन्होंने हजारों पर्चे छपवाएं और रातों-रात जगह-जगह पर लगा दिए, कि लालाजी की मौत का बदला ले लिया गया हैं. जब इस घटनाक्रम की सुचना पुलिस और अंग्रेज सरकार तक पहुची तो भगत सिंह और उनके साथियो के कारण उत्पन्न किसी बड़े खतरे से बचने के लिए पुरे शहर की पुलिस उनके पीछे लगा दी तथा घर-घर छापे मारे जाने लगे. मगर भगत सिंह पुलिस से बचने के लिए अपनी दाड़ी और बाल कटवाकर शहर से बाहर चले गये.

इस घटना के बाद भगत सिंह की ख्याति देशभर में एक उग्र क्रन्तिकारी के रूप में फ़ैल गई. सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन की बैठक में जन सुरक्षा बिल और डिस्प्यूट बिल का विरोध करने के लिए इन्होने असेम्बली में बम फेकने की योजना बनाई. योजना के मुताबिक बम को खाली जगह पर फेका जाएगा, तथा इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए बिना भागे पुलिस के हाथो गिरफ्तार हों जाएगे. अंग्रेजी न्याय व्यवस्था पर थोड़ा सा विशवास करने वाले भगत सिंह, राजगुरु और बटुकेश्वर दत्त ने योजना के अनुसार बम फेक कर गिरफ्तार हो गये. 12 जून 1929 को सेशन कोर्ट द्वारा सुनाए गये निर्णय के अनुसार बटुकेश्वर दत्त को उम्र कैद की सजा सुनाई गई. मगर अंग्रेज सरकार नही चाहती थी कि राजगुरु और भगत सिंह जेल से बाहर रहे. अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नकली केस तैयार किया गया.

भगत सिंह को फांसी (Hanging of Bhagat Singh)

असेम्बली में बम फेके जाने के कारण कोर्ट ने तक़रीबन 1 साल तक चली केस की सुनवाई के बाद 7 अक्टूबर 1930 को निर्णय सुनाया गया. अपने अनुसार केस तैयार कर अंग्रेज सरकार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा दिलावने में सफल हो गई.

हालांकि कोर्ट के इस निर्णय के विरुद्ध प्रिवी काउंसलिंग में अपील भी की गई, मगर उन्हें स्वीकार नही किया गया. 24 मार्च 1931 को तीनों स्वतंत्रता सेनानियों को फासी देने का निश्चय हुआ. भगत सिंह को फांसी की सजा दिलवाकर भी अंग्रेजी हुकूमत हार चुकी थी. उन्हें यह भय था कि भगत सिंह को फांसी देने से पुरे देश में स्थति नियन्त्रण से बाहर हो सकती है. इसलिए सजा निर्धारण के एक दिन पूर्व 23 मार्च को शाम सात बजे ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को एक साथ फांसी दे दी गई.

इस तरह भले ही एक महान स्वतंत्रता सेनानी की जीवन यात्रा समाप्त हो गई, मगर उनकी सजा ने देश में चल रहे अंग्रेज विरोधी माहौल में आग में घी डालने का काम किया. अंग्रेजो में मन में मौत का खौफ भरने वाले हमारे आदर्श देशभक्त भगतसिंह को शत शत नमन.

भगत सिंह के नारे

इंकलाब जिंदाबाद

 

साम्राज्यवाद मुर्दाबाद

 

ये अत्याचारी सरकार लोगों की पुकार नही सुन सकती , इनके लिए बम धमाकों की आवश्यकता है.

 

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