Bhagirathi And Ganga Story In Hindi | गंगा की कहानी

Bhagirathi And Ganga Story In Hindi : गंगा, जाह्नवी और भागीरथी ये भारत की सबसे पवित्र नदी गंगा के ही नाम हैं. गंगा सिर्फ एक नदी ही नहीं बल्कि यह माँ का स्थान पाने वालो पापों का उद्धार करने वाली हितकारीणी है. एक समय में गंगा देवलोक में बहती थी. यह प्रथ्वी पर कैसे आई. इस सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित है इस सम्बन्ध में भागीरथी की कथा को प्रमुखता दी जाती हैं. चलिए आज हम जानते है कि गंगा की कहानी क्या है.Bhagirathi And Ganga Story In Hindi | गंगा की कहानी

Bhagirathi Ganga Story In Hindi | गंगा की कहानी

नारद पुराण में गंगा नदी के उद्भव और उनके पृथ्वी पर लाए जाने की कथा का वर्णन मिलता हैं. जीव की जन्म जन्मातर के इस चक्र के लिए गंगा को मोक्षदायिनी माना गया है कहते है जिसके दाह संस्कार के बाद उसकी भस्मी को गंगा जी में डाल दिया जाए वह मोक्ष को प्राप्त कर लेता है तथा जन्म जन्म के इस चक्कर से मुक्ति पा लेता हैं.

प्राचीन समय में सागर नामक राजा हुआ करते थे उनके दो पत्नियाँ थी एक का नाम केशनी तथा दूसरी का नाम सुमति था. इन्हें कोई पुत्रर नहीं था. पुत्र प्राप्ति के लिए इन्होने कठोर तपस्या की यज्ञ करवाए ऋषि औरवा ने उन्हें दो वरदान दिए. दोनों रानियों से पूछा कि आपके पास दो विकल्प है. एक प्रतापी सत्यनिष्ठ राजा जबकि दूसरी तरफ साठ हजार पुत्र.

केशनी ने एक बेटे को चुना तथा सुमति ने साठ हजार पुत्रों को. समय बीतता गया. केशनी का बेटा बड़ा होकर राजा बना, सुमति के साठ हजार पुत्र बड़े अहंकारी थे. वे उस राजा के जीवन में तथा देवों के कार्यों में बाधाएं उत्पन्न करने लगे. राजा एक अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करवाया. तथा यज्ञ के घोड़े को खुला छोड़ दिया.

उस समय यज्ञ के इस घोड़े के साथ यह मान्यता होती थी कि जो उस राजा से प्रसन्न होता था अपने राज्य से घोड़े को जाने देता था. मगर जो राजा से खुश नहीं होते थे वे घोड़े को पकड़ लेते थे. सुमति के उन साठ हजार बेटों ने घोड़े को रोककर उनके उनके कार्य में विघ्न डालना चाहा, इसके लिए वे घोड़े का पीछा करने लगा.

राजा इंद्र ने यहाँ अपनी चाल चली. वे उस घोड़े को लेकर ऋषि कपिला के आश्रम में छिपा देते हैं. जिसकी खबर उस संत को नहीं होती हैं. जब सागर के साठ हजार पुत्र ऋषि की कुटियाँ में घोड़ा बंधा पाते है तो वे उसे चोर कहकर अपमानित करते हैं. ध्यान मुद्रा में बैठे ऋषि क्रोधित हो गये उनकी आँखों की ज्वाला से साठ हजार पुत्र वहीँ जलकर राख हो गये.

जब सागर को उनके पुत्रों के इस हश्र की खबर मिली तो वे ऋषि कपिला के आश्रम पहुचे तथा सम्पूर्ण घटनाक्रम जाना. उन्होंने ऋषि से जब पुनर्जीवन की बात पूछी तो कपिला बोले- जो मृत्यु को प्राप्त हो चुके है अब उसका कुछ नहीं हो सकता. मगर इन साठ हजार आत्माओं का यदि मोक्ष चाहते हैं तो इसकी राख को गंगाजी में बहाना होगा. तभी इनके जीवन का कल्याण होगा तथा वे जीवन मृत्यु के चक्र से निकल कर मोक्ष को प्राप्त करेगे.

राजा सगर अपने पुत्रों को मोक्ष दिलाने के कार्य में विफल रहे और उसका देहांत हो गये इसके बाद अंशुमान शासक बने तथा इनके घर राजा दिलीप का जन्म हुआ. दिलीप ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए हिमालय में जाकर गंगा मैया की कठोर तपस्या की, मगर उनकी तपस्या सफल नहीं हो पाई, वे भी तीन पीढ़ियों के इस अधूरे कार्य को राजा भगीरथ को सौप कर चले गये.

भागीरथ के कोई सन्तान नही थी उनहोंने राज काज का कार्य मंत्रियों को सौप दिया तथा स्वयं हिमालय में रहकर ब्रह्माजी जी की आराधना करने लगे. इनकी कठोर तपस्या से ब्रह्माजी प्रसन्न हुए तथा उन्होंने गंगा जी को पृथ्वी लोक पर लाने का वरदान दे दिया. मगर गंगा के वेग को धारण करने की धरती लोक में किसी के पास क्षमता नहीं थी. अतः शिवजी की तपस्या राजा भगीरथ ने की तथा उन्हें अपने जटाओं में गंगा उतारने के लिए राजी किया. इस तरह शिवजी के मुकुट से गंगा धरती लोक पर आई तथा राजा भागीरथ के साठ हजार पूर्वजों का कल्याण किया.

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