गीता सार हिंदी में | Bhagwat Geeta Saar Hindi

Bhagwat Geeta Saar Hindi: परमेश्वर की खोज में आत्म युगों से लगी है. जैसे प्यासे को जल की चाह होती है. जीवात्मा परमात्मा से बिछुड़ने के पश्चात महा कष्ट झेल रही है. जो सुख पूर्ण ब्रह्मा (सतपुरुष) के सतलोक धाम में था. वह सुख यहाँ काल प्रभु के लोक में नही है. चाहे कोई करोड़पति है, चाहे पृथ्वीपति, चाहे सुरपति, चाहे श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा शिव त्रिलोकपति है. क्योंकि जन्म तथा मृत्यु तथा किये गये कर्म का भोग अवश्य ही प्राप्त होता है. इसलिए पवित्र श्रीमद् भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta) के ज्ञान दाता ने अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा  अध्याय  18 श्लोक में कहा है कि अर्जुन सर्व भाव से उस परमेश्वर की चरण में जा, उसकी  कृपा से ही तू परम शान्ति तथा सतलोक को प्राप्त होगा.Bhagwat Geeta Saar Hindi

गीता सार हिंदी में | Bhagwat Geeta Saar Hindi

उस परमेश्वर के ज्ञान तत्व को तत्वदर्शी संतों के पास जाकर दंडवत प्रणाम कर तथा विनम्र भाव से प्रश्न कर, तब वे तत्वद्रष्टा संत आपकों परमेश्वर का ज्ञान बताएगे. फिर उनके द्वारा बताएं गये भक्ति मार्ग पर सर्व भाव से लग जा. तत्वदर्शी संत की पहचान गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में बताते हुए कहा है कि संसार उलटे लटके हुए वृक्ष की तरह है. जिसके उपर को मूल तथा नीचे को शाखा है.

जो संसार रुपी वृक्ष के विषय में जानता है, वह तत्वदर्शी संत है. गीता अध्याय 15 श्लोक 2 से 4 में कहा गया है, कि उस संसार रुपी वृक्ष की तीनों गुण (रजगुण- ब्रह्मा, सतगुण-विष्णु, तमगुण-शिव) रुपी शाखा है, जो तीनों लोकों में उपर तथा नीचे फैली हुई है.

उस संसार रुपी उलटे लटकें हुए वृक्ष के विषय में अर्थात स्रष्टि रचना के बारे में मै इस गीता जी के ज्ञान में नही बता पाउगा. यहाँ गीता सार में आपकों जो गीता ज्ञान बता रहा हु, यह पूर्ण ज्ञान नही है. उसके लिए गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में संकेत किया गया है. जिसमें कहा गया है कि पूर्ण ज्ञान के लिए तत्वदर्शी संत के पास जा वही बताएगे. मुझे पूर्ण ज्ञान नही है.

गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा गया है, कि तत्वदर्शी संत प्राप्ति के पश्चात उस परमपद परमेश्वर की खोज करनी चाहिए. जहाँ जाने के पश्चात साधक पुनर लौटकर वापिस नही आता है अर्थात पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है. जिस पूर्ण परमात्मा से उलटे संसार रुपी वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है.

भावार्थ यह हैं, कि जिस परमेश्वर ने सर्व ब्रह्मांड की रचना की है तथा मै भी उसी आदि पुरुष परमेश्वर अर्थात पूर्ण परमात्मा की शरण में हु, उसकी साधना करने से अनादि मोक्ष की प्राप्ति होती है.

तत्वदर्शी संत वही है, जो उपर को मूल और नीचे को तीनों गुण रुपी शाखाओं तथा तना व मोटी डार की पूर्ण जानकारी प्रदान करता है. अपने द्वारा रची सरष्टि का पूर्ण ज्ञान स्वयं ही पूर्ण परमात्मा कविर्देव ने तत्वदर्शी संत की भूमिका करते कबीर वाणी द्वारा बताया है.

कबीर अक्षर पुरुष एक पेड़ है, ज्योंति निरंजन वाकी डार
तीनों देवा शाख है, पात रुपी संसार

पवित्र गीताजी में तीन प्रभुओं के विषय में वर्णन है. वह परम अक्षर ब्रह्मा है तथा तीन प्रभुओं का एक प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 25 में गीता ज्ञान दाता काल के विषय में कहा गया है कि मै अभिव्यक्त हु. यह प्रथम अव्यक्त प्रभु हुआ. फिर गीता अध्याय 8 श्लोक 18 में कहा गया है. यह संसार दिन के समय अव्यक्त अर्थात परब्रह्मा से उत्पन्न हुआ है. फिर रात्रि के समय उसी मे लीन हो जाता है. यह दूसरा अव्यक्त हुआ.

अध्याय 8 श्लोक 20 में कहा गया है, कि उस अव्यक्त से भी जो दूसरा अव्यक्त है. वह परम दिव्य पुरुष सर्व प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नही होता है. यह तीसरा अव्यक्त हुआ. यही प्रमाण गीता के अध्याय 2 श्लोक 17 में भी है. कि नाश रहित उस परमात्मा को जान जिसका नाश करने में कोई समर्थ नही है.

अपने विषय में गीता ज्ञान दाता यानि ब्रह्मा प्रभु अध्याय 4 मन्त्र 5 तथा अध्याय 2 श्लोक 12 में कहा गया है, कि मै तो जन्म मृत्यु में अर्थात नाशवान हु.

उपरोक्त संसार रुपी वृक्ष की मूल तो परम अक्षर पुरुष अर्थात पूर्ण ब्रह्मा कविर्देव है. इसी को तीसरा अभिव्यक्त प्रभु कहा है. वृक्ष की साल से ही सर्व पेड़ को आहार प्राप्त होता है. इसलिए गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में कहा गया है, कि वास्तव में परमात्मा तो क्षर पुरुष अर्थात ब्रह्मा तथा अक्षर पुरुष अर्थात परब्रह्मा से भी अन्य ही है. जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण पोषण करता है, वही वास्तव में अविनाशी है.

क्षर का अर्थ है नाशवान. क्योकि ब्रह्मा अर्थात गीता ज्ञान दाता ने तो स्वयं ही कहा है कि अर्जुन तू तथा मै तो जन्म मृत्यु में है. अक्षर का अर्थ है अविनाशी. यहाँ परब्रह्म को ही स्थायी अर्थात परमविनाशी कहा गया है. परन्तु यह वास्तव में अविनाशी नही है. यह चिर स्थायी है, जैसे एक मिट्टी का प्याला जो सफ़ेद रंग का चाय पीने के काम आता है. वह गिरते ही टूट जाता है.

ऐसी स्थति ब्रह्मा की जाने. दूसरा प्याला इस्पात का होता है, यह मिट्टी के प्याले की तुलना में अधिक स्थायी लगता है, परन्तु इसकों भी जंग लगता है तथा नष्ट हो जाता है, भले ही समय ज्यादा लगे. इसलिए यह भी वास्तव में अविनाशी नही है. तीसरा प्याला सोने का है, स्वर्ण धातु वास्तव में अविनाशी है, जिसका नाश नही होता है.

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