भारत में भक्ति आंदोलन | Bhakti Movement In Hindi

bhakti aandolan/ Bhakti Movement In Hindi भारतीय धर्म, समाज एवं संस्कृति प्राचीन काल से ही अत्यधिक सुद्रढ़, सम्रद्ध और गौरवपूर्ण रही है. अनेक विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किये जब जब भी भारत पर विदेशी आक्रमण हुए या विदेशियों का शासन रहा, भारतीय संस्कृति और धर्म को बहुत ही आघात पंहुचा लेकिन हमारी संस्कृति का स्वरूप इन आक्रमणों के बाद भी अक्षुण्ण बना रहा. इस कारण उत्पन्न अव्यवस्था के कारण जब जब भारतीय धर्म और समाज में रूढ़ीवाद, आडम्बर, सामाजिक बुराइयों आदि ने प्रवेश किया, तब तब धर्म सुधार नायकों ने एक आंदोलन के रूप में उन बुराइयों को दूर करने का संदेश समाज को दिया. चाहे वह मध्यकाल का भक्ति आंदोलन हो या 19 वीं शताब्दी का सामाजिक व धार्मिक पुनर्जागरण.

भारत में भक्ति आंदोलन | Bhakti Movement In Hindi

भारत में भक्ति की एक लम्बी और सुदृढ परम्परा रही है. भक्ति की शुरुआत सर्वप्रथम दक्षिण भारत से हुई और इसमें विष्णु के उपासक संतो की महत्वपूर्ण भूमिका रही. भारत में मध्यकाल व पूर्व मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के तीन मत अस्तित्व में थे.

प्रमुख भक्ति मत

  1. शैव मत
  2. वैष्णव मत
  3. सूफी मत
  • शैव मत (shaivism in hindi) 

    शिव के उपासक शैव कहलाएँ थे. एक समय था जब हिन्दू धर्म में शैव मत सर्वाधिक प्रबल था. पाल, सेन, चन्देल राजाओं के अभिलेख में ‘ओम नमः शिवाय” से प्रार्थना आरम्भ होती है. दक्षिण में शैव के अनुनायियों को नयनार कहा जाता था. जिनकी संख्या 63 थी. 12 वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में वीर शैव मत की शुरुआत हुई. इसके अनुयायी लिंगायत कहलाते थे. ये अहिंसा में विश्वास करते थे.

    हिन्दू धर्म आंदोलन के नेतृत्व में शन्कराचार्य का नाम उल्लेखनीय है. जिन्होंने बद्रीनाथ, पुरी, द्वारिका व श्रंगेरी मैसूर में चार मठ स्थापित किये थे. कालान्तर में शैव मत- वीर शैव, पाशुपत, कापालिक आदि सम्प्रदायों में विभाजित हो गया.

  • वैष्णव मत (Vaishnavism)

    मध्यकालीन भारत में वैष्णव मत काफी लोकप्रिय था. भगवान विष्णु के उपासक वैष्णव तथा विष्णु के अनुयायी दक्षिण भारत में आलवार कहलाये थे. इनकी संख्या 12 थी. आलवार संतो ने दक्षिण भारत में भक्ति के सिद्धांत का अधिक प्रचार किया. ये संत यदपि सामान्य वर्ग से संबंधित थे. लेकिन उनमे उच्च गुणों का समावेश था. इनकी शिक्षाओं में कर्मज्ञान तथा भक्ति का समिश्रण था. ये सगुण भक्ति के उपासक थे.

    इन्होने तमिल भाषा में साहित्य की रचना की बाद में भक्ति आंदोलन का प्रचार उत्तरी भारत में भी हुआ जिसे आगे बढ़ाने में रामानंद, वल्लभाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बाकाचार्य, रामानुजाचार्य तथा चैतन्य महाप्रभु आदि है. राजस्थान में भी वैष्णव सम्प्रदाय के अंतर्गत विश्नोई सम्प्रदाय, जसनाथी सम्प्रदाय, रामस्नेही सम्प्रदाय, दादू सम्प्रदाय, निरंजन सम्प्रदाय, चरणादासी सम्प्रदाय व लालदासी आदि का अभ्युदय एवं विकास हुआ.

    ये सभी संत निर्गुण सम्प्रदाय के थे. सामाजिक व धार्मिक पुनर्जागरण में इन सभी संतो का महत्वपूर्ण योगदान रहा.

  • सूफी मत (Sufism)

    इस्लामिक रहस्यवाद को सूफीवाद कहा जाता है. सूफ का अर्थ ऊन है. सूफी सन्त ऊन की तरह सफ़ेद वस्त्र पहनते थे. इसी से उन्हें सूफी कहा गया. सूफी मत तथा हिन्दू विचारधारा विश्वास और रीती रिवाजों में काफी समान थी. सूफियों के अनुसार विभिन्नता में ईश्वर की एकता निहित है. सूफी वाद के दो प्रमुख लक्ष्य है. परमात्मा से सीधा संवाद और इस्लाम के प्रति मानवता की सेवा करना.

    सूफी सम्प्रदायों में चिश्ती सम्प्रदाय, सुहरावर्दी, कादरी, एक नक्शबंदी मुख्य सम्प्रदाय थे. प्रमुख सूफी संतो में शेख मुइनुद्दीन चिश्ती, शेख हमिदुद्दीन चिश्ती नागौरी, बखित्यार काकी, निजामुदीन ओलिया, शेख सलीम, बहाउद्दीन जकारियाँ, सदुद्दीन आरिफ, सुर्ख बुखारी आदि प्रमुख थे.

    मध्यकाल में इन तीनों मतों ने सामाजिक एवं धार्मिक पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आगे चलकर 19 वीं एवं 20 वीं शताब्दी में भी धार्मिक व समाज सुधार आंदोलन प्रारम्भ हुए. इन आंदोलनों ने भी पुनर्जागरण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. एक ओर इन आंदोलनों ने भारत की सामाजिक एवं धार्मिक बुराइयों को दूर किया, वही दूसरी ओर भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में इस पुनर्जागरण ने नई जान फुकी.

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