भारत में अकाल /सूखा की समस्या, कारण प्रभावित क्षेत्र एवं निबंध प्रबंधन | Causes Effects And Solutions Area Essay & Management Of Famine In Hindi

भारत में अकाल /सूखा की समस्या, कारण प्रभावित क्षेत्र एवं निबंध प्रबंधन | Causes Effects And Solutions Area Essay & Management Of Famine In Hindi : किसी भू भाग में सामान्यतया जितनी वर्षा होती है, वहां वर्षा इतनी कम हो कि फसलों का पर्याप्त उत्पादन न हो पाये, साथ ही मानव व पशुओं के पीने हेतु जल उपलब्ध न हो वह सूखा/ अकाल (Famine Effects) क्षेत्र कहलाता है. सूखा एक प्राकृतिक आपदा है इसका सम्बन्ध वर्षा की न्यूनता से है. मानसूनी जलवायु क्षेत्र होने के कारण भारत में कुछ क्षेत्रों में सूखा पड़ना सामान्य है. भारत सरकार के सिचाई आयोग ने 10 सेमी से कम वार्षिक वर्षा वाले भागों को शुष्क क्षेत्र माना जाता है.

भारत में अकाल /सूखा की समस्या के कारण Causes Effects Of Famine In Hindi 

सूखा के कारण-सूखे के लिए सबसे प्रमुख कारण पर्याप्त वर्षा नही होती है. वर्षा की कमी, असमानता व अनिश्चिनता मानसूनी जलवायु की दशाओं के कारण ही होती है. जिससे भूमिगत जल स्तर में कमी आती है. वन विनाश के कारण भी वर्षा कम होती है व भूमि में जल की मात्रा कम प्रवेश कर पाती है. वर्षा का जल अवरोध न होने के कारण बहकर नदियों में चला जाता है. प्राकृतिक जल संचय स्रोतों को नष्ट करने से भूमिगत जल स्तर कम होता है. स्थाई जल निति न होने से जल की समुचित दोहन व उपयोग नही होता है. लगातार बढ़ती जनसंख्या भी जल स्रोतों पर विपरीत प्रभाव डालती है.

भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्र (Drought affected areas in India)

देश के 30 प्रतिशत क्षेत्र में सूखे का प्रभाव प्रतिवर्ष पड़ता है तथा औसत 5 करोड़ लोग प्रतिवर्ष सूखे से प्रभावित होते है. भारत में सिंचाई विभाग ने सूखा क्षेत्रों को दो भागों में बाटा है. प्रथम सामान्य से 25 प्रतिशत अधिक अनिश्चिंता वाले भू भाग इसमे पश्चिमी राजस्थान व पश्चिमी गुजरात को शामिल किया गया है.

द्वितीय सामान्य से 25 प्रतिशत तक अनिश्चिनता वाले वाले भू भाग इससे पूर्वी गुजरात, पूर्वी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उतराखंड, पश्चिमी मध्यप्रदेश, मध्य महाराष्ट्र, आंतरिक कर्नाटक, दक्षिणी आंध्रप्रदेश, मध्यवर्ती कर्नाटक, उत्तरी पश्चिमी बिहार, पश्चिमी उत्तरप्रदेश व उड़ीसा को शामिल किया गया है.

भारत के 77 प्रतिशत जिलों को अकाल प्रवृत माना गया है तथा इससे अधिकाश जिले भारत के पश्चिम भाग में स्थित है.

बाढ़ पर निबंध (essay on flood in hindi)

सूखे से सबसे बड़ा संकट अकाल के रूप में उपस्थित होता है. जल की उपलब्धता जितनी कम होती है, अकाल उतना ही विकराल रूप ले लेता है. सूखे के कारण अकाल के तीन स्वरूप स्पष्ट होते है. प्रथम यदि वर्षा इतनी कम हुई है तो कि फसलें बर्बाद हो गई है व अन्न का उत्पादन पर्याप्त नही हो रहा है तो वह अन्न का अकाल कहा जाता है.

द्वितीय यदि वर्षा इतनी कम हुई है कि न तो पर्याप्त अन्न हुआ है न ही पर्याप्त चारा उपजा है तो वह अन्न व चारे दोनों का अकाल कहलाता है. इसे द्विकाल भी कहते है. तृतीय, यदि वर्षा इतनी कम हुई है कि न तो अन्न उपजा है , न ही चारा व न ही पीने के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध है तो इसे त्रिकाल कहते है.

विक्रम संवत 1956 (ई सन 1900) का त्रिकाल जिसे छप्पन का अकाल (Chappan’s famine) भी कहते है, अब तक का यह भीषणतम अकाल माना जाता है.

सूखा प्रबंधन (Drought Management in India)

  • सरकारी व सामाजिक स्तर पर (At government and social level Rescue measures) – सूखे का सम्बन्ध जल की कम उपलब्धता से है. क्षेत्र में जल की उपलब्धता कैसे विकसित की जा सकती है, यह समाज के प्रयासों पर निर्भर है इसके लिए गाँव गाँव में जल संग्रहण क्षेत्रों का सरक्षण व विकास किया जाना चाहिए. गाँवों में भूमिगत जलस्तर सुधारने के लिए ढाल के अनुसार छोटे छोटे एनिकट बनाए जाने चाहिए. लोगों में इस तरह प्रवृति का विकास किया जाना चाहिए कि वे जल संचय क्षेत्रों को बनाने में सरकार को सहयोग दे व श्रमदान जैसी परम्पराओं को पुनः स्थापित करे.

    दीर्घकालीन प्रबन्धन के रूप में नदियों को जोड़ने जैसे भागीरथी कार्यों को प्रारम्भ किया जाना चाहिए. इससे दो तरफा लाभ होंगे, एक जिन क्षेत्रों में वर्षा की उपलब्धता ज्यादा है व नदियों में बाढ़ आती रहती है, वहां यह समस्या कम होगी. दूसरा यह अतिरिक्त जल उन क्षेत्रों में उपयोगी होगा जहाँ वर्षा व भूमिगत जल कम उपलब्ध है. भू प्रष्ठीय जल के इस तरह उपयोग से धीरे धीरे भूमिगत जल स्तर भी बढ़ेगा. यह बढ़ा हुआ जल स्तर अप्रत्यक्ष रूप से कालान्तर में हरियाली को विकसित करने में सहयोगी होगा.

  • व्यक्तिगत स्तर पर (At the personal level Rescue measures)- इस क्षेत्र में सबसे जरुरी है कि व्यक्ति जल के महत्व को समझे. जल के संचयन व संग्रहण के प्रयासों में व्यक्तिगत रूचि ले. नागरिक अपने घरों में जल संग्रह के लिए टैंक (टांका) बनवाएं. पक्के टैंक वर्षा जल का वर्ष भर उपयोग करने के लिए उपयोगी होंगे. ग्रामीण क्षेत्र के नागरिक अपने खेतों में मेड बनाकर जल को रोके. यह जल कुछ ही समय में ही भूमि में समा जाएगा. इससे गाँवों में भू जल स्तर बढ़ेगा. अन्न उत्पादन के लिए ऐसी फसलों व बीजों का चयन किया जाए कि कम जल व कम समय समुचित उत्पादन लिया जा सके. सूखे के समय प्रत्येक नागरिक एक दूसरे की सहायता करे. यह भावना अकाल को सुकाल में बदल देती है.

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