भीष्म साहनी का जीवन परिचय | Biography Of Bhisham Sahni In Hindi

Biography Of Bhisham Sahni In Hindi नमस्कार दोस्तों आज हम भीष्म साहनी का जीवन परिचय पढ़ेगे. प्रेमचंद धारा के प्रमुख कथाकारों में भीष्म साहनी की गिनति की जाती हैं. भारत विभाजन की त्रासदी का जीवंत चित्रण इनके तमस उपन्यास में देखने को मिलता हैं. जिस पर 1986 में फिल्म निर्माण भी किया जा चूका हैं. पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित भीष्म साहनी का झुकाव वामपंथ की तरफ था. आज हम बायोग्राफी में साहनी की जीवनी, इतिहास, कहानी संग्रह पढेगे.

Biography Of Bhisham Sahni In Hindi

Biography Of Bhisham Sahni In Hindi

जीवन परिचय बिंदु bhisham sahni biography in hindi
पूरा नाम भीष्म साहनी
जन्म 8 अगस्त, 1915 ई.
जन्म स्थान रावलपिंडी
माता पिता पिता- हरबंस लाल साहनी, माता- लक्ष्मी देवी
मृत्यु 11 जुलाई, 2003
यादगार कृतियाँ ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’, ‘झरोखे’, ‘तमस’, ‘बसन्ती’, ‘मायादास की माड़ी’, ‘हानुस’, ‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’, ‘भाग्य रेखा’, ‘पहला पाठ’, ‘भटकती राख’ आदि।

भीष्म साहनी का जीवन परिचय, जीवनी, बायोग्राफी

श्री भीष्म साहनी का जन्म 1915 में रावलपिंडी के मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ. उनकी प्रारम्भिक शिक्षा दीक्षा वहीँ हुई. तत्पश्चात इन्होने लाहौर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में एम ए की परीक्षा उतीर्ण की. पंजाब विश्वविद्यालय से पीएचडी की. भारत विभाजन की त्रासदी को इन्होने देखा ही नहीं भोगा भी था.

जिसका जीवंत चित्रण आगे चलकर उन्होंने तमस उपन्यास में किया हैं. भारत में विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े रहे. आपने अनेक विदेशी यात्राएं की. सात वर्ष तक विदेशी भाषा प्रकाशन गृह मास्कों में कार्य किया. वहां रूसी भाषा का गहन अध्ययन किया एवं अनेक पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया.

भीष्म साहनी पर कुछ हद तक मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव था. भारत लौटने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के अधीन दिल्ली कॉलेज में अध्यापन कार्य किया. साहनी का परिवार कला एवं साहित्य की सेवाओं से जुड़ा रहा. आपके बड़े भाई बलराम साहनी हिंदी सिनेमा के वरिष्ठ तथा लोकप्रिय अभिनेता रहे.

बलराम साहनी ने हिंदी सिनेमा में भारतीय आत्मा को जीवंत किया हैं. विभिन्न फिल्मों में इन्होने मध्यमवर्गीय परिवार के मुखियां का रोल अदा कर लोगों की सहानुभूति बटोरी है और एक आदर्श उपस्थित किया हैं. भीष्म साहनी नई कहानी के आंदोलन कर्ताओं में से एक हैं. अभी कुछ समय पूर्व ही उनका निधन हुआ हैं.

भीष्म साहनी की कृतियाँ एवं कहानियाँ

भीष्म साहनी एक कुशल कथाकार विचारक एवं उपन्यासकार रहे हैं. आपने अनेक कहानियाँ और तीन उपन्यास लिखे हैं. स्वत्न्त्रयोत्तर भारत में बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, नेताओं की अवसरवादिता पर तीव्र कटाक्ष किया हैं.

  • प्रमुख कहानी संग्रह – भटकती राख, भाग्य रेखा, पहला पाठ आदि.
  • उपन्यास – झरोखे, कड़िया, तमस.

इसके अतिरिक्त पत्र पत्रिकाओं में विचारात्मक लेख भी छपे हैं. इन्होने नई कहानियाँ नामक पत्रिका का वर्षों तक सम्पादन किया. इनकी प्रसिद्ध कहानियों में भटकती राख, चीफ की दावत, खून का रिश्ता, कटे घर, दिव्या, सिर का सदका आदि हैं.

भीष्म साहनी की कहानी कला

आधुनिक कहानी के यथार्थवादी कहानीकार भीष्म साहनी की कहानियाँ सामाजिक सरोकारों से सम्बद्ध रही हैं. वे साठोतरी कहानी के सशक्त हस्ताक्षर हैं. उन्होंने स्व्तन्त्रयोत्तर भारत के बदलते राजनैतिक, सामाजिक तथा आर्थिक परिवेश को लेकर अनेक कहानियाँ लिखी हैं. उनकी कहानियाँ समस्याप्रधान हैं. विभाजन के पश्चात जो हिन्दू मुस्लिम दंगे भड़के उससे
उत्पन्न त्रासदी का जीवंत दस्तावेज है उनका तमस उपन्यास.

कहानी के कथानक में कसावट हैं. और अंत तक जिज्ञासा बनी रहती हैं. उसमें रोचकता, सहजता एवं एक गति बनी रहती हैं जो पाठक को सम्पूर्ण कहानी पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं. उनकी कहानियों में पंजाबी वातावरण का चित्रण अधिक हुआ हैं. अमृत सर आ गया हैं तथा चीफ की दावत ऐसी ही कहानियाँ हैं. जैसे इस कहानी में शामनाथ के चीफ ने यह जाना कि उसकी माँ पंजाब के ग्रामीण क्षेत्र की हैं तो उससे एक गीत सुनाने का आग्रह करते हैं, उसकी हाथ की बनी फुलकारी पर साहब रीझ उठते हैं. भले ही उसका कपड़ा जीर्ण शीर्ण हो गया था.

आज के समाज में ड्रिंक पार्टी का चलन हैं, इसे लेकर कहानीकार लिखते हैं एक कामयाब पार्टी वह है जिसमें ड्रिंक कामयाबी से चल जाय. वार्तालाप उसी रौ में बह रहा था, जिस रौ में गिलास भरे जा रहे थे. कहीं कोई रूकावट न थी, कोई अडचन न थी. साहब को वहिस्की पसंद आई थी. पात्र योजना एवं चरित्रांकन सटीक हुआ हैं. कथावस्तु अनुकूल पात्रों का संयोजन कर उनकी आकृति प्रकृति, मन स्थिति, विचार, अनुभव आदि मार्मिक व ह्रदयस्पर्शी चित्रण किया हैं. पात्रों में विविधता हैं. चरित्रांकन में सूक्ष्म पर्यवेक्षण हैं.

मानव मन की गहराइयों में पैठकर आंतरिक उद्देगों को अभिव्यक्त करने की साहनीजी में अद्भुत क्षमता हैं. चीफ की दावत के चीफ, मिस्टर शामनाथ, उसकी पत्नी माँ का परिस्थितिजन्य चरित्रांकन अत्यधिक स्वाभाविक बन पड़ा हैं. पात्रों का स्वार्थीपन, उनकी मिथ्या शान व बुजुर्ग पीढ़ी के अपमान तथा उपेक्षा को भली भांति चित्रित किया हैं. घटनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण उनका प्रभावी चित्रण उनकी कहानियों की सफलता सिद्ध करती हैं.

शामनाथ अपनी माँ को साहब के सम्मुख नुमाइश की चीज बना देता एवं माँ के आहत ह्रदय का बड़ा मार्मिक चित्रण कर दिया हैं. जैसे मगर कोठरी में बैठने में देर थी कि आँखों से छल छल आंसू बहने लगे. दुपट्टे बार बार पौछती, पर वे उमड़ जाते, बरसात के पानी की तरह से जैसे थमने का नाम नहीं लेते.

भीष्म साहनी की कहानियों में यथास्थान हास्यं व्यंग्य का पुट देखने को मिलता हैं. चीफ साहब के व्यवहार से हास्य की सृष्टि होती हैं. वे माँ से मलते ही हाथ हिलाते हुए पूछते हैं हो डू यूं डू. इन पर अंग्रेजी संस्कृति का प्रभाव हैं. कहानियों में किसी उद्देश्य को स्थापित करने का मोह नहीं हैं. इनका मूल ध्येय है समाज की टूटी हुई परम्परा या अंदर के टूटते हुए किसी व्यक्तित्व पर चोट करना. चीफ की दावत का शामनाथ, घर की घटनाएं, माँ के प्रति व्यवहार और साहब का खुश होना यही चित्रित करता है कि नौकरी पेशा व्यक्ति अपने प्रमोशन या स्वार्थ के खातिर कितना भी गिर सकता हैं.

भीष्म साहनी की कहानियों में भाषा भी सहज व पात्रानुकूल हैं. पंजाबी, हिंदी, अंग्रेजी शब्दों का यथास्थान अच्छा प्रयोग किया हैं. कहानी के शीर्षक भी रोचक एवं कथावस्तु का दर्पण सिद्ध होते हैं. वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्म शैली का प्रयोग कर उसमें प्रभावोत्पादकता ला दी हैं. यथास्थान मुहावरों का प्रयोग एवं व्यंग्यात्मक भाषा से भी कहानी में रोचकता आ गई हैं. कहानीकला की दृष्टि से साहनीजी की कहानियाँ बेजोड़ कही जा सकती हैं.

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