Biography of Kesari Singh Barhath In Hindi | केसरी सिंह बारहठ की जीवनी

Biography of Kesari Singh Barhath In Hindi | केसरी सिंह बारहठ की जीवनी: 21 नवम्बर, 1872 को शाहपुरा रियासत में जन्मे बारहठ राजस्थानी भाषा के कवि एवं महान स्वतंत्रता सेनानी थी. इनके पिता का नाम कृष्ण सिंह बारहठ एवं माता का नाम बख्तावर कँवर था. ये चारण जाति के थे. बारहठ परिवार का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अहम योगदान था. इनके बेटे प्रतापसिंह बारहठ ने भी वतन के लिए अपनी जान दे दी थी. बारहठ की माताजी का बचपन में ही देहांत हो गया था. माँ के प्रेम से बिछुड़ जाने के बाद केसरीसिंह ने भारतमाता को ही अपनी जननी माना और इसकी सेवा में ही सम्पूर्ण जीवन लगा दिया.Biography of Kesari Singh Barhath In Hindi

Biography of Kesari Singh Barhath In Hindi

इनकी शिक्षा दीक्षा शाहपुर में महन्त सीताराम जी के निर्देशन में हुई. इसके कुछ साल बाद पंडित गोपीनाथ शास्त्री जी जो कि उदयपुर के थे, इन्होने बारहठ को संस्कृत निष्ठ ज्ञान दिया. बचपन से ही तीव्र बुद्धि एवं यादाश्त्त का अनूठा कोशल इनके पास था. उस समय के अमर-कोश नामक ग्रंथ का एक एक पद उन्होंने याद कर लिया था. केसरीसिंह संस्कृत एवं हिन्दी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं बंगला, मराठी एवं गुजराती के ज्ञाता भी थे. उन्हें ज्योतिष, गणित एवं खगोल शास्त्र का भी अच्छा ज्ञान था.

केसरी सिंह बारहठ का जीवन परिचय (thakur kesri singh barhath in hindi)

शाहपुरा रियासत के देवपुरा नामक गाँव में 1872 ई में जन्मे केसरीसिंह बारहठ डिंगल के उच्चकोटि के कवि एवं क्रन्तिकारी थे. उन्होंने काव्य द्वारा राजस्थान के राजाओं में देशभक्ति, स्वाभिमान एवं अपने अतीत के प्रति गौरव की भावना पैदा की. वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार में कब मेवाड़ महाराणा फतहसिंह भाग लेने जा रहे थे, तब केसरीसिंह बारहठ ने डिंगल भाषा के 13 सोरठे लिखकर महाराणा को भेजे.

इनमें उनके पूर्वजों के साहस शौर्य का वर्णन था. ये सोरठे चेतावनी के चूंगठिये के रूप में विख्यात हैं. महाराणा इन सोरठों से प्रभावित होकर दिल्ली दरबार में उपस्थित नहीं हुए. केसरीसिंह का प्रसिद्ध क्रन्तिकारी रासबिहारी बोस के निकट सम्पर्क था.

मास्टर अमीरचंद के पास इन्होंने अपने छोटे भाई जोरावर सिंह, पुत्र प्रतापसिंह और जामाता ईश्वरदान को क्रांति के व्यवहारिक प्रशिक्षण के लिए दिल्ली भेजा. इन्होने कोटा में एक क्रांतिकारी दल की स्थापना की. साधु प्यारेलाल हत्याकांड में इन्हें 20 वर्ष की कैद हुई.

इन्हें बिहार की हजारी बाग़ जेल में रखा गया. वहां के जेल अधीक्षक की अनुशंसा पर इन्हें 1920 में रिहा कर दिया गया. जब इन्हें अपने पुत्र प्रतापसिंह की शहादत की सूचना मिली तो इन्होने प्रसन्नता से कहा- भारत माता का पुत्र उसकी मुक्ति के लिए शहीद हो गया. इसकी मुझे बहुत प्रसन्नता हैं.

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