वीर सावरकर की जीवनी | Veer Savarkar In Hindi

Veer Savarkar In Hindi:- ब्रिटिश साम्राज्य की बेड़ियों में जकड़ी भारतमाता की स्वतंत्रता के लिए वीर सावरकर लगातार संघर्ष करते रहे. उन्होंने कॉलेज जीवन में एक संस्था ‘‘अभिनव भारत” की स्थापना की. संस्था के सदस्यों ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर ब्रिटिश शासन के प्रति विद्रोह की घोषणा कर दी. इंग्लैंड में रहकर उन्होंने इटली के देशभक्त क्रांतिकारी मैसिनी की जीवनी लिखी. इसकी प्रतियाँ प्रकाशित होते ही जब्त कर ली. उन्होंने 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम नामक पुस्तक लिखकर इतिहास के वास्तविक स्वरूप को प्रस्तुत किया. इसके प्रकाशन के कारण उनके बड़े भाई को आजीवन कारावास हुआ.Biography of Veer Savarkar

वीर सावरकर की जीवनी (Biography of Veer Savarkar In Hindi)

क्रांतिकारियों के प्रेरणा स्रोत होने के कारण इनकों इंग्लैंड से गिरफ्तार कर जब भारत ला रहे थे. तब सावरकर जहाज के शौचालय से निकल बाहर समुद्र में कूद पड़े. लम्बी दूरी तैरकर बन्दरगाह पहुचे, किन्तु फ़्रांस में फिर से पकड़ लिए गये. वीर सावरकर पर मुकदमा चलाकर राजद्रोह के आरोप में दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.

तब सावरकर ने हंसकर अंग्रेज अफसर से पूछा ”क्या तुम्हे विश्वास है, कि अंग्रेजी सरकार इतनें दिनों तक भारत में टिक पाएगी”? जेल में सावरकर के साथ अमानवीय अत्याचार किये जाते थे. जेल से छूटने के बाद समरसता का प्रचार करने के लिए उन्होंने अस्प्रश्यों को मन्दिर में प्रवेश कराया और पतित पावन मंदिर बनाया.

विनायक दामोदर सावरकर का इतिहास व जानकारी (History and information of Vinayak Damodar Savarkar)

 

  • पूरा नाम    – विनायक दामोदर सावरकर
  • जन्म       – 28  मई
  • जन्मस्थान – भगुर ग्राम
  • पिता          – दामोदर सावरकर
  • माता          – राधाबाई सावरकर
  • विवाह        – यमुनाबाई से हुआ
  • मृत्यु     – फ़रवरी 26, 1966 (इच्छा मृत्यु)

सावरकर का जन्म ब्रिटिशकालीन बम्बई प्रान्त के भागुर गाँव में हुआ था. इनकी माँ का नाम राधाबाई व पिताजी का नाम दामोदर पन्त था. गणेश व नारायण दामोदर इनके भाई थे. नैनाबाई इनकी बहिन का नाम था. सावरकर बहुत कम आयु में थे, तभी इनके माता-पिता चल बचे. परिवार में सबसे बड़े भाई गणेश पर परिवार के लालन पोषण की जिम्मेदारी थी. संकट की स्थतियों में परिवार को सँभालने वाले गणेश भी एक स्वतंत्रता प्रेमी नवयुवक थे, सावरकर पर इनके बड़े भाई के व्यक्तित्व का बहुत प्रभाव पड़ा.

पढ़ने में तेज सावरकर ने 1901 में नासिक के विद्यालय के दसवी की परीक्षा उतीर्ण की, ये पढाई के साथ साथ देशभक्ति की कविताएँ भी लिखा करते थे. फ्ग्युर्सन कॉलेज से इन्होने बीए की डिग्री हासिल की, इनका विवाह यमुनाबाई के साथ हुआ. वीर सावरकर ने आगे की पढाई की इच्छा जताई विश्वविद्यालय की शिक्षा का सम्पूर्ण खर्च यमुनाबाई के पिताजी ने वहन किया. यहाँ वो नवयुवकों को एकत्रित कर उनमें राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने का कार्य करने लगे, तथा भारत की स्वतंत्रता के लिए साथी युवकों का एक संगठन तैयार किया.

वर्ष 1904 में इन्होने अभिनव भारत नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की, तथा 1905 के बंगाल विभाजन के खिलाफ विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर अंग्रेजी सरकार के इस कार्य के प्रति कड़ी प्रतिक्रिया दी. सावरकर पर रूस एवं इटली के स्वतंत्रता सैनानियों का व्यापक प्रभाव पड़ा. इन्होंने 10 मई 1907 को प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयन्ती मनाई तथा द इण्डियन वार ऑफ इण्डिपेण्डेंस पुस्तक लिखी, जिनमें इन्होने यह साबित किया कि 1857 की क्रांति कोई गदर नही बल्कि पहला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम था.

मगर अंग्रेज सरकार ने इस पुस्तक के प्रकाशन तथा वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया. सावरकर और उनके साथियों ने फ्रांस, जर्मनी व पेरिस से इसे प्रकाशित करवाने का प्रयत्न किया, इसी बिच नीदरलैंड से उन्हें कामयाबी मिली. जिनकी प्रतियाँ जर्मनी व अन्य यूरोपीय देशों में वितरण की गई. इसी बिच 1909 में इनकी लो की पढाई पूरी हो गई, मगर इन्हें इंग्लैंड में वकालत करने से रोका गया.

वीर सावरकर के विचार (veer savarkar thought in hindi)

हिन्दू, हिंदी तथा हिंदुस्तान की विचारधारा के जनक वीर सावरकर 20 वीं सदी के सबसे बड़े हिंदूवादी नेता था. उन्हें हिन्दू शब्द से गहरा लगाव था, तथा इस विचारधारा को इन्होने भारत के जन जन तक पहुचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. वीर सावरकर को 6 बार अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बनाए गये थे. जो बाद में एक राजनीतिक संगठन बन गया. आजादी के बाद वीर सावरकर की विचारधारा को समर्थन नही दिया गया, कांग्रेस पार्टी संभवतया उनकी विचारधारा की समर्थक नही थी.

इसी कारण इस महान स्वतंत्रता सेनानी व हिंदुत्व के पुजारी को भुला दिया गया. भारत पाकिस्तान विभाजन के यह प्रबल विरोधी थे, उन्हें हमेशा खंडित भारत के प्रति अफ़सोस रहा. इन्होने विभाजन को लेकर कहा था राज्य की सीमायें नदी तथा पहाड़ों या सन्धि-पत्रों से निर्धारित नहीं होतीं, वे देश के नवयुवकों के शौर्य, धैर्य, त्याग एवं पराक्रम से निर्धारित होती हैं. आखिर 26 फरवरी 1966 में दिन मुंबई में तेज बुखार के चलते इनका निधन हो गया.

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