Birbal Sahni Biography in Hindi | बीरबल साहनी की जीवनी

Birbal Sahni Biography in Hindi | बीरबल साहनी की जीवनी

Biography Of Birbal Sahni in Hindi: बीरबल साहनी (1891-1949) भारत के विख्यात पेलियो बोटेनिस्ट थे. भारत की विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियों में योगदान देने वाले वैज्ञानिकों में बीरबल साहनी का महत्वपूर्ण स्थान है. एक छोटे से गाँव में जन्म लेने वाले इस वैज्ञानिक ने पूरी दुनियाँ को अपनी खोज से अचम्भित कर दिया था. वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में बीरबल साहनी ने जीवन भर कई महत्वपूर्ण शोध किये, जिनकी बदौलत आज हमारी बॉटनी में हम विशेष उन्नति कर पाए है. बीरबल साहनी का जीवन परिचय (Birbal Sahni Biography) में साहनी के inventions, Life, achievement, institute of paleobotany के बारे में विस्तार से चर्चा करेगे.

Birbal Sahni Biography in Hindi | बीरबल साहनी की जीवनी

बीरबल साहनी की व्यक्तिगत जानकारी तथ्य व इतिहास (Birbal Sahni Biography, History, Lifestory In Hindi)

जीवन परिचय बिंदु बीरबल साहनी का जीवन परिचय
पूरा नाम बीरबल साहनी
जन्म 1891 शाहपुरा पंजाब (पाकिस्तान)
पत्नी सावित्री सूरी
राष्ट्रीयता भारतीय
व्यवसाय प्रसिद्द पेलियो बोटेनिस्ट
सम्मान  एफ आर सी एस सदस्य, केम्ब्रिज से पहले डिग्रीधारी भारतीय
संस्थान  बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोबॉटनी
निधन 1949

शुरूआती जीवन (early life story of Birbal Sahni)

बीरबल साहनी का जन्म 14 नवंबर 18 9 1 को पश्चिम पंजाब के बेहरा , शाहपुर जिले में हुआ था । वह ईश्वर देवी और लाला रुची राम साहनी के तीसरे पुत्र थे जो लाहौर में रहते थे। परिवार डेरा इस्माइल खान से आया था और वे अक्सर बहरा के दौरे करते थे जो साल्ट रेंज के करीब था और केवेरा की भूविज्ञान में बीरबल को कम उम्र में दिलचस्पी थी। बीरबल भी अपने दादा द्वारा विज्ञान में प्रभावित थे, जिन्होंने डेरा इस्माइल खान में बैंकिंग व्यवसाय का स्वामित्व किया और रसायन शास्त्र में सभी को चकित करना वाला शोध किया।

रुची राम लाहौर में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर थे और महिलाओं के अधिकारों के प्रति जाग्रति लाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। रुची राम ने मैनचेस्टर में अध्ययन किया था और अर्नेस्ट रदरफोर्ड और नील्स बोहर साथ काम किया था। उन्होंने इंग्लैंड में अपने सभी पांच बेटों को अध्ययन करने के लिए भेजा। जलीयानवाला बाग हत्याकांड के साथ-साथ ब्रह्मा समाज आंदोलन के बाद से रुची राम गैर- सहभागिता आंदोलन में शामिल थे।

साहनी का घर बड़े बड़े राजनेताओं के उठने बैठने की जगह रहा, यहाँ पर मोतीलाल नेहरू , गोपाल कृष्ण गोखले , सरोजिनी नायडू और मदन मोहन मालवीया जैसे नेता मेहमाननवाजी में आया करते थे.

बीरबल साहनी की शिक्षा एवं वैज्ञानिक जीवन (Birbal Sahni’s education and scientific life Biography)

पंजाब विश्विद्यालय लाहौर से बीए पास करके वह ब्रिटेन के लन्दन विश्वविद्यालय से डी.एस.सी. की डीग्री प्राप्त की. लंदन की रॉयल सोसायटी ने उन्हें अपना फैलो (एफ आर सी एस) निर्वाचित कर सम्मानित एवं गौरवान्वित किया. इस अत्यंत गौरवपूर्ण सम्मान को प्राप्त करने वाले डॉक्टर बीरबल साहनी पांचवें भारतीय थे.

डॉ. साहनी भारत के एक महान पुरा वनस्पति शास्त्री (पेलियो बोटेनिस्ट) थे. प्राचीन युग की वनस्पतियों का अध्ययन भारत के लिए एक नया विज्ञान था. इसे पुरावनस्पति विज्ञान या पेलियोबॉटनी कहते है.

बीरबल साहनी के योगदान, अनुसंधान, उपलब्धियां (Birbal Sahni’s contributions, research, achievements)

डॉ साहनी ने एक नये समूह के जीवाश्म पौधें की खोज की. ये जिम्नोस्पर्म (नग्नबीजी/अनावृतबीजी) है. चीड़ तथा उसकी जाति के दूसरे पेड़ जिन्हें पेंटोंजाइलिन कहते है. इससे सारे संसार का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ. उनके पुरा वनस्पति विज्ञान के अध्ययन ने महाद्वीपों के एक दूसरे से खिचकने के सिद्धांत को बल मिला.

इस सिद्धांत के अनुसार महाद्वीप पृथ्वी की सतह पर सदा उस तरह खिचकते रहे है, जैसे कोई नाव नदी के जल सतह पर खिचकती है. डॉ साहनी ने सर्वप्रथम जीवित वनस्पतियों पर अनुसंधान किया. तत्पश्चात भारतीय वनस्पति अवशेषों पर दुबारा जांच शुरू की.

बीरबल साहनी के कार्य और सिद्धांत (Birbal Sahni’s work and theory)

इन्होनें कई भारतीय वनस्पति अवशेषों का अन्वेषण किया, जिसका विस्तृत विवरण फिलोसोफिकल ट्रांजेक्शन और कई अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ. उनकें अन्य अनुसंधान कार्य – महाद्वीप विभाजन सिद्धांत, दक्षिण पठार की आयु, ग्लोसीपिटरिस वनस्पतियों की उत्पत्ति के बाद हिमालय का उत्थान आदि.

इसके अतिरिक्त कई जटिल व्यवस्थाओं को हल करने में बीरबल साहनी के ये सिद्धांत कारगर साबित हुए. इनके द्वारा स्थापित संस्था बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोबॉटनी दुनिया की पहली संस्था है.

सम्मान

साहनी को उनके शोध के लिए भारत और विदेशों में कई अकादमियों और संस्थानों द्वारा मान्यता प्राप्त थी। उन्हें 1 9 36 में रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन (एफआरएस) के फेलो चुना गया , जो उच्चतम ब्रिटिश वैज्ञानिक सम्मान था, जिसे भारतीय वनस्पतिविद के लिए पहली बार सम्मानित किया गया था।

उन्हें क्रमश: 1930 और 19 35 की 5 वीं और 6 वीं अंतर्राष्ट्रीय वनस्पति कांग्रेस के उपराष्ट्रपति, पालेबोबोटनी सेक्शन चुने गए 1940 के लिए भारतीय विज्ञान कांग्रेस के जनरल प्रेसिडेंट राष्ट्रपति, राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, भारत , 1937-19 39 और 1943-1944, 1948 में उन्हें अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज के मानद सदस्य चुने गए । उनके पास एक और उच्च सम्मान था

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