ब्रिटिश शासन का भारतीय समाज पर प्रभाव | British Rule in India

British Rule (भारत में अंग्रेजी शासन) हमारे इतिहास के अध्ययन ने हमे यह दर्शाया है कि जीवन प्राय बहुत कठिन और क्रूर है. इसके लिए उतेजित होना या लोगों को दोषी ठहराना मुर्खता है. और उसका कोइ लाभ भी नही है. गरीबी दुःख और शोषण के कारण को समझने और उन्हें दूर करने के प्रयत्नों में ही समझदारी है.

ब्रिटिश शासन का भारतीय समाज पर प्रभाव | British Rule in India

यदि हम ऐसा करने में असफल हो जाते है तो और घटनाओं की दौड़ में पीछे रह जाते है. तो हम कष्ट पाते है.भारत इस तरह से पीछे रह गया. इसके समाज ने पुरातन परम्परा को धारण कर लिया, इसके सामाजिक ढाँचे ने अपने जीवन और शक्ति को खो दिया और निष्क्रिय होने लगा.

यह आश्चर्यजनक नही है कि भारत ने कष्ट पाया है अंग्रेज इसका कारण रहे है. यदि अंग्रेज ऐसा नही करते तो शायद कोई ओर लोग ऐसा करते.

अंग्रेजो ने भारत का एक बहुत बड़ा हित भी किया, उनके नए और हष्ट पुष्ट जीवन के प्रभाव ने भारत को हिला दिया और उनमें राजनितिक एकता और उनके राष्ट्रीयता की भावना पैदा हो गई.

शायद यह बड़ा दुखदायी था. कि हमारे प्राचीन देश और लोगों में नवजीवन लाने की आवश्यकता थी. अंग्रेजी शिक्षा का केवल उद्देश्य क्लर्क बनना और तत्कालीन पश्चिमी विचारों से लोगों को परिचित करवाना था. एक नया वर्ग बनने लगा, अंग्रेजी शिक्षित वर्ग, संख्या में कम तथा लोगों से कटा हुआ, परन्तु जिनके भाग्य में नए राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व था.

यह वर्ग पहले इंग्लैंड और अंग्रेजी स्वतंत्रता के विचारों का पूरी तरह प्रशंसक था. तब ही लोग स्वतंत्रता और प्रजातंत्र के बारे में बाते कर रहे थे. यह सब निश्चिंत था. और इंग्लैंड भारत में अपने लाभ के लिए निरंकुशता से शासन कर रहा था.

परन्तु यह आशा की जाती थी कि इंग्लैंड ठीक समय पर भारत को स्वतंत्रता दे देगा.

भारत में पशिचमी विचारों का प्रभाव कुछ सीमा तक हिन्दू धर्म पर भी पड़ा. जनसमूह तो प्रभावित नही था. परन्तु जैसा मै आपकों पहले बता चूका हु, अंग्रेजी सरकार की निति ने रुढ़िवादी लोगों की वास्तव में सहायता की, परन्तु नया मध्यम वर्ग जो अभी उभर रहा था. जिसमे सरकारी कर्मचारी और व्यावसायिक लोग थे, प्रभावित हो गये थे.

उन्नीसवी शताब्दी के आरम्भ में पशिचमी तरीकों से हिन्दू धर्म में सुधार लाने का प्रयत्न बंगाल में सबसे पहले हुआ. हिन्दू धर्म के अनगिनत सुधारक अतीत में थे.

द्वितीय प्रयत्न निश्चिंत ही इसईवाद और पशिचमी विचारों से प्रेरित था. इस प्रयत्न के निर्माता राजा राममोहन राय थे, एक महान व्यक्ति और एक महान विद्वान जिसका नाम सती प्रथा की समाप्ति के सम्बन्ध में लिया जाता है. वे संस्कृत, अरबी और दूसरी अन्य कई भाषाएँ अच्छी तरह से जानते थे. और उन्होंने ध्यान से कई धर्मो का अध्य्यन भी किया था.

वे धार्मिक समारोह और पूजा और आदि के विरोध में थे. उन्होंने समाज सुधार और स्त्री शिक्षा का समर्थन किया. जिस समाज की उन्होंने स्थापना की वह ब्रह्मा समाज कहलाया.

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