बाल विवाह रोकने का कानून व उपाय | Child Marriage Low & Measures to Stop

Child Marriage Low & Measures to Stop In Hindi बाल विवाह पुरातन प्रेमी समाज द्वारा बालक बालिकाओं पर थोपा गया सामाजिक रिवाज है. आज इसका महत्व शून्य के बराबर है. बल्कि कई भावी कर्णधारों के भविष्य के सपनों को धूमिल करने का कार्य बाल विवाह एवं इस बुराई का समर्थन करने वालों ने किया है. भारत में 1929 में बाल विवाह निषेध एक्ट पारित हुआ था. भारतीय शासन स्थापना के बाद भी कई प्रभावी कानून बनाए गये. मगर आज भी यह समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है.

बाल विवाह रोकने का कानून व उपाय | Child Marriage Low & Measures to Stop In Hindi Child Marriage Low & Measures to Stop In Hindi

बाल विवाह रोकने के उपाय व सुझाव (Measures to Stop child marriage)

बालिकाओं को शिक्षित करना इस कुप्रथा को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय है. जब लड़कियां शिक्षित होने लगेगी तो वे स्वयं ही बाल विवाह की बुराई को ठुकरा देगी. अतः बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए.

दूरस्थ क्षेत्रों में मोबाइल शिक्षा प्रणाली लागू की जानी चाहिए तथा बच्चों को व्यवसायपरक शिक्षा देने की व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए. साथ ही इस प्रथा को समाप्त करने का दूसरा अहम उपाय समाज में जागरूकता पैदा करना है.

बाल विवाह की प्रथा को समाप्त करने के लिए इस कुप्रथा के विरुद्ध समाज में जागरूकता लानी चाहिए. माँ बाप व अभिभावकों को इस कुप्रथा के नुकसान के बारे में बताना चाहिए. इस कार्य के लिए समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों, साधु-सज्जनों व धर्म से जुड़े हुए व्यक्तियों तथा ngo की मदद ली जा सकती है.

फिल्मों रंगमंच, वृतचित्र व नुक्कड़ नाटकों आदि के द्वारा इस कुप्रथा के दुष्परिणामों का प्रदर्शन भी समाज में जागरूकता लाने में अहम भूमिका निभाता है.

इसके अतिरिक्त गरीब व निम्न जातियों को सरकार द्वारा विशेष सहायता राशि के प्रावधान करने चाहिए, क्योंकि यह कुप्रथा इस वर्ग के लोगों में अधिकतर व्याप्त है. सरकार द्वारा इन जातियों के लोगों को प्रलोभन के रूप में इस प्रकार की योजनाएं शुरू करनी चाहिए, जिसमें बेटी का विवाह उसके योग्य होने पर ही करने पर आर्थिक सहायता व रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकेगे.

बाल विवाह की समस्या को रोकने के लिए व्यापक कानून व्यवस्थाएं तथा दृढ राजनितिक इच्छा शक्ति व जनसहभागिता की विशेष आवश्यकता है.

बाल विवाह रोकने के लिए बने कानून (Laws to Stop Child Marriage in india in hindi)

सरकार ने बाल विवाह की रोकथाम के लिए सजा का भी प्रावधान किया गया है. लेकिन अभी तक ये कानून पूर्ण रूप से प्रभावी नही हुए है. अतः इस कुप्रथा को सामाजिक स्तर पर ही समाप्त किया जाना चाहिए.

भारत बाल विवाह व सती प्रथा के इतिहास में कानून निर्मित करवाने व जागरूकता फैलाने में राजा राममोहन राय एवं ईश्वरचंद विधासागर का नाम महत्वपूर्ण है. राजा राममोहन रॉय के प्रयासों से 1829 में सती प्रथा रोकथाम कानून बनाया गया. 1891 में एक संशोधन के लिए लड़की की न्यूनतम आयु 12 वर्ष की गई.

यह अधिनियम भारत सरकार द्वारा 1891 में age of consent act नाम से 19 मार्च 1891 को लागू किया गया. जिसमें लड़की के लिए न्यूनतम वैवाहिक आयु 12 वर्ष रखी गई थी. महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने इस कानून का विरोध भी किया था.

भारत में बाल विवाह कानून की जानकारी व इतिहास (Information and History of Child Marriage Law in India)

भारत में बाल विवाह रोकथाम के लिए अजमेर राजस्थान के हरविलास शारदा ने 1929 में बाल विवाह निरोधक अधिनियम प्रस्तावित किया, जो गर्वनर जनरल व वायसराय लार्ड इरविन के समय में सितम्बर 1929 में भारतीय की केन्द्रीय असेम्बली से पारित किया गया था. तथा शारदा एक्ट के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

यह अधिनियम 1 अप्रैल 1930 से पूरे भारत में लागू हुआ. इस कानून से पहले वाल्टरकृत राजपूत हितकारिणी सभा के निर्णयानुसार जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह ने 1885 में बाल विवाह प्रतिबंधक कानून बनाया था.

बाल विवाह रोकने के लिए शारदा एक्ट (sharda act in hindi)

शारदा एक्ट में शुरुआत में बालिकाओं के विवाह की न्यूनतम आयु 14 वर्ष व बालक की न्यूनतम आयु 18 वर्ष तय की गई थी. 1940 में बालिका की न्यूनतम आयु को बढ़ाकर 15 साल कर दिया गया था. 1978 में संशोधन द्वारा इस कानून के तहत बालिकाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष तथा बालकों के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गई.

इस कानून में 1992 में संशोधन कर ऐसे माता-पिता व अभिभावकों को जो बाल विवाह का समर्थन प्रदान करते है, उन्हें दंडित करने का प्रावधान भी किया गया है.

बाल विवाह उन्मूलन के लिए वर्तमान में भारत में कानून (Laws in India for the Elimination of Child Marriage)

2006 में शारदा एक्ट को समाप्त कर नये अधिनियम ”बाल विवाह निरोध अधिनियम 2006” को 1 नवम्बर 2007 से लागू किया गया है. इस अधिनियम के द्वारा यह प्रावधान किया गया है कि बाल विवाह को वयस्क होने के दो साल के भीतर व्यर्थ (void) घोषित किया जा सकता है.

इस अधिनियम में बाल विवाह के लिए दोषी सभी व्यक्तियों को 2 साल का कठोर कारावास या एक लाख रुपयें का जुर्माना या दोनों से दंडित किये जाने का प्रावधान है. इस अधिनियम में बालकों की न्यूनतम विवाह योग्य आयु 21 वर्ष एवं बालिकाओं की 18 वर्ष निर्धारित की गई है.

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