भारत की जलवायु एवं वर्षा वितरण | Climate of India in Hindi

भारत की जलवायु एवं वर्षा वितरण types of Climate of India in Hindi: मौसम अथवा जलवायु एक ही शब्द हैं जिसका अर्थ एक क्षेत्र विशेष की वायुमंडलीय दशा से है, मौसम की दीर्घकालीन अवस्था को जलवायु कहते हैं. मौसम अल्प कालिक होता हैं जब जलवायु एक लम्बी अवधि के लिए स्थायी तत्व हैं. आज हम भारत की जलवायु, भारत की जलवायु के प्रकार अर्थ परिभाषा निबंध, प्रभावित करने वाले तत्वों तथा विभिन्न प्रकार के मौसम व ऋतुओं को इस अध्याय में विस्तार से जानेगे.

भारत की जलवायु एवं वर्षा वितरण | Climate of India in Hindi

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भारत की जलवायु क्या हैं

अत्यधिक विस्तार व भू आकारों की भिन्नता के कारण भारत के विभिन्न भागों में जलवायु संबंधी विविधता पाई जाती है. भारत की जलवायु पर मानसूनी हवाओं का अत्यधिक प्रभाव होने के कारण भारत की जलवायु को मानसूनी जलवायु या जुआ भी कहा जाता है. एक नजर भारत की जलवायु (India’s climate) पर.

जलवायु का अर्थ क्या होता है (What Is Meaning Of Climate of India in Hindi)

ये मानसून अरबी शब्द मौसिम से बना है. जिसका अर्थ मौसमी हवाओं या ऋतु से है. भारत में ऋतुओं के अनुसार मानसूनी हवाओं की दिशा में परिवर्तन होता है. ऐसी मानसूनी हवाएं भारत की जलवायु की निर्धारक है. भारत की जलवायु अक्षांशीय स्थति, समुद्र तल से ऊँचाई, समुद्र से दूरी, पर्वतों की स्थति व दिशा, पवनों की दिशा तथा धरातल की बनावट आदि तत्वों से प्रभावित है.

मानसून की उत्पत्ति एवं विकास (Origin and development ofClimate of India)

मानसूनी हवाओं की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रचलित परम्परागत विचारधारा सूर्य के कर्क रेखा व मकर रेखा पर लम्बवत चमकने से सम्बन्धित है. इस विचारधारा के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध विशेषत भारत में उस समय तेज गर्मी पडती है, जब सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर या इसके आसपास-लम्बवत पड़ती है. इसके कारण एक न्यून वायुदाब का ककेंद्र पाकिस्तान में मुल्तान के आसपास बन जाता है.

इसी समय हिन्द हिन्द महासागर व ऑस्ट्रेलिया में तथा जापान के दक्षिण में प्रशांत महासागर में उच्च वायुदाब का केंद्र बन जाता है. हवाओं का यह स्वभाव होता है कि वे उच्च वायु दाब से न्यून वायु दाब की ओर चलती है. समुद्र से चलने के कारण ये हवाएं वाष्प से भरी होती है. हिन्द महासागर के दक्षिण पश्चिमी हवाएं भारत की ओर आती है. यहाँ पर हिमालय के अवरोध के कारण वर्षा करती है, इन्हें ही दक्षिणी पश्चिमी मानसून कहा जाता है. इसे ग्रीष्मकालीन मानसून भी नाम दिया गया है.

इस दिशा के विपरीत दक्षिणी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें मकर रेखा व उसके आस-पास के क्षेत्र पर लम्बवत पड़ने पर मध्य एशिया में बेकाल झील के पास व मुल्तान के आस-पास उच्च दाब का केंद्र बन जाता है. जबकि समुद्री धरातल पर न्यून वायुदाब कायम हो जाता है.

ऐसी स्थति में हवाएं स्थल से समुद्र की ओर बहती है. ये स्थल से आने के कारण प्राय शुष्क होती है. इन्हें ही शीतकालीन शुष्क हवायें कहा जाता है. इनको शीतकालीन मानसून भी कहते है. डॉक्टर कोटेश्वरम की खोजो तक मानसून की उत्पत्ति के सन्दर्भ में उपर्युक्त विचारधारा ही मान्य व प्रचलित थी. डॉक्टर कोटेश्वरम के अलावा रामास्वामी, राममूर्ति तथा जम्बूनाथ, अनन्तकृष्णन, फ्लोन आदि विशेष्यज्ञों ने मानसून की उत्पत्ति पर नवीनतम विचार प्रकट किये है.

नवीनतम विचारधाराओं के अनुसार मानसून की उत्पत्ति क्षोभमंडल में विकसित सामयिक आँधियों से मानी जाती है. वायुमंडल की वाष्प वाली हवाएं क्षोभमंडल में उत्पन्न होने वाली आँधियों के कारण एक ही दिशा में प्रवाहित होते हुए ऊपरी क्षोभमंडल में पहुच जाती है. इनका प्रवाह अनेक दिशाओं में हो जाता है. हवाओं का ऐसा प्रवाह जो निम्न क्षोभमंडल में पहुचता है, उसी जेट स्ट्रीम से धरातल पर वर्षा होती है. इस जेट स्ट्रीम को क्षेत्र अनुसार उष्णकटिबंधीय, पूर्वी जेट तथा अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय पश्चिम जेट नाम दिया गया है.

भारत की जलवायु परिस्थितियों (Different Types OfClimate of India)

भारत की जलवायु मानसूनी जलवायु है, यहाँ की जलवायु परिस्थियाँ को सामान्य रूप से मानसून पूर्व की स्थति, मानसून काल एवं मानसून वापसी के कालक्रम में बांटा जा सकता है. मानसून पूर्व की स्थति में भारत में भयंकर गर्मी पड़ती है. कई स्थानों पर तेज आंधियाँ एवं गरम हवाएं चलती है.

उत्तरी भारत में निम्न वायुदाब विकसित हो जाता है. इससे पवनों की दिशा में परिवर्तन हो जाता है. पवनें तीव्र वेग से समुद्र से स्थल की ओर बढ़ने लगती है. मानसून काल आने पर दक्षिणी पश्चिम से आने वाली पवनें अरब सागर के मानसून एवं बंगाल की खाड़ी के मानसून के रूप में भारत में वर्षा करती है.

भारत में मानसून का यह काल वर्षा काल कहा जाता है. मानसून वापसी का समय शीत ऋतु और ग्रीष्म ऋतु से सम्बन्धित है. भारत की जलवायु को अनेक भौगोलिक कारक प्रभावित करते है यथा.

भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक (factors affecting indian climate in hindi)

समुद्र तल से ऊँचाई

किसी भी स्थान की ऊँचाई से वहां के तापमान से विपरीत सम्बन्ध है. सामान्यत प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान कम होता जाता है. इसके फलस्वरूप हिमालय जैसे उच्च स्थानों पर सदैव बर्फ जमी रहती है. एक ही अक्षांश पर स्थित होते हुए भी ऊँचाई की भिन्नता के कारण ग्रीष्मकालीन औसत तापमान मंसूरी में 24 डिग्री सेंटीग्रेड देहरादून में 32 डिग्री सेंटीग्रेड तथा अम्बाला में 40 डिग्री सेंटीग्रेड रहता है.

समुद्र से दूरी

समुद्र तट पर स्थित नगरों में तापमान अति न्यून रहता है और जलवायु नम रहती है. जैसे जैसे समुद्र से दुरी बढ़ती जाती है, वैसे वैसे विषमता अर्थात तापान्तर व शुष्कता बढ़ती जाती है. पश्चिम तटीय क्षेत्रों में वर्षा का वार्षिक औसत 200 सेमी से अधिक रहता है, जबकि जैसलमेर में यह औसत घटते घटते 5 सेमी रह जाता है.

अक्षांशीय स्थति

यह तापमान को प्रभावित करने वाला सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है,बढ़ते हुए अक्षांश के साथ तापमान में कमी आ जाती है, क्योंकि सूर्य की किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है. इससे सौर्यताप की मात्रा प्रभावित होती है. कर्करेखा लगभग भारत के मध्य से गुजरती है. अतः उतरी भारत शीतोष्ण प्रदेश में तथा दक्षिणी भारत उष्ण प्रदेश में सम्मिलित किया जाता है.

पर्वतों की स्थति का प्रभाव

जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों में पर्वतों की स्थति एक महत्वपूर्ण कारक है. पश्चिम घाट की स्थति प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिमी तट के निकट है. इस कारण दक्षिणी पश्चिमी मानसून से इनके पश्चिमी ढालों पर प्रचुर वर्षा होती है. जबकि इसके विपरीत ढाल एवं प्रायद्वीपीय पठार दक्षिणी पश्चिमी मानसून की स्रष्टि छाया क्षेत्र में अंतर है.

पर्वतों की दिशा

हिमालय पर्वत की स्थति व दशा के कारण ही भारत की जलवायु सौम्य है. एक और हिमालय साइबेरियन ठंडी पवनों से हमारे देश की रक्षा करते है तो दूसरी ओर ग्रीष्मकालीन मानसून को रोककर भारत में ही वर्षा करने के लिए बाध्य करते है. पश्चिमी राजस्थान की शुष्क जलवायु का एक कारण यह भी है कि अरावली श्रेणी की दिशा दक्षिणी पश्चिमी मानसून के समांतर है. अतः यह पवनों के मार्ग में अवरोध उपस्थित नही करती.

पवनों की दिशा

पवनें अपनें उत्पत्ति के स्थान एवं मार्ग के साथ गुण लाती है. ग्रीष्मकालीन मानसून हिंद महासागर से चलने के कारण उष्ण व आद्र होते है, अतः वर्षा करते है. शरदकालीन मानसून स्थली व शीत क्षेत्रों से चलते है, अतः सामान्यत शीत व शुष्कता लाते है.

उच्च स्तरीय वायु संचरण

उच्च स्तरीय वायु संचरण का भी भारत की जलवायु से गहरा सम्बन्ध है. भारत की जलवायु मानसूनी होने से काफी हद तक क्षोभमंडल की गतिविधियों से प्रभावित होती है. मानसून की कालिक व मात्रात्मक अनिश्चिनता भी उच्च स्तरीय संचरण की दिशाओं पर निर्भर करती है.

इसके अतिरिक्त मेघाच्छादन की मात्रा, वनस्पति आवरण, समुद्री धारा आदि भी भारत की जलवायु को आंशिक रूप से प्रभावित करती है. भारत सरकार के मौसम विभाग के अनुसार भारत की जलवायु परिस्थियों को चार विभिन्न ऋतुओं में बांटा गया है.

भारत की जलवायु का प्रकार वर्गीकरण (Types Of Climate of India)

  • उत्तरी पूर्वी या शीतकालीन मानसून काल

  1. शीत ऋतु- दिसम्बर से फरवरी तक
  2. ग्रीष्म ऋतू- मार्च से मध्य जून तक
  • दक्षिणी पश्चिमी या ग्रीष्मकालीन मानसूनी काल
  1. वर्षा ऋतु- मध्य जून से मध्य सितम्बर तक
  2. शरद ऋतू- मध्य सितम्बर से मध्य दिसम्बर तक

भारतीय संस्कृति के अनुसार छ ऋतुएँ मानी गई है.

भारतीय जलवायु व ऋतुएँ (Six Seasons In Climate of India In Hindi)

  1. बंसत ऋतु- चैत्र बैशाख
  2. ग्रीष्म ऋतु- ज्येष्ठ- आषाढ़
  3. वर्षा ऋतु- श्रावण-भाद्रपद
  4. शरद ऋतु- आश्विन-कार्तिक
  5. शीत ऋतु- मार्गशीर्ष-पोष
  6. हेमन्त ऋतु- माघ-फाल्गुन

विभिन्न ऋतुओं के उपर्युक्त काल में देश की विशालता के कारण, स्थानिक विभिन्नताएँ पायी जाती है. प्रत्येक ऋतु में तापमान, वायुदाब, पवनों व वर्षा की मात्रा में भिन्नता मिलती है.

भारत का उत्तर-पूर्वी या शीतकालीन मानसून काल (north east Climate of India)

  • शीत ऋतु (winter season)

तापमान- उत्तर से दक्षिण जाने पर इस ऋतु में तापमान में वृद्धि होती जाती है. भूमध्य रेखा व समुद्र से दूरी तथा समुद्र तल से ऊँचाई में वृद्धि से उत्तरी भारत में तापमान कम तथा तेज सर्दी होती है. दक्षिणी भारत में भूमध्य रेखा से निकटता व समुद्री प्रभाव से तापमान अधिक रहता है. इस ऋतु में उत्तरी भारत में कई स्थानों पर तापमान हिमांक से भी नीचे चला जाता है. इस कारण उत्तरी भारत में औसत तापमान 21 डिग्री सेंटीग्रेड से कम तथा दक्षिणी भारत में इससे अधिक रहता है.

वायु दाब व पवनें

इस ऋतु में उच्च दाब मध्य एशिया तथा निम्न दाब हिन्द महासागर क्षेत्र में केन्द्रित होता है. इससे पवनें मध्य एशिया के उच्च दाब क्षेत्र से महासागरीय निम्न दाब क्षेत्र की ओर चलने लगती है, इन्हें उत्तरी पूर्वी मानसूनी पवनें कहा जाता है.

वर्षा

इस ऋतु में भारत के उत्तरी भाग के उत्तर पश्चिम भाग में भूमध्यसागरीय चक्रवातों तथा दक्षिण में लौटते मानसून से वर्षा होती है. भूमध्यसागरीय चक्रवातों (पश्चिमी विक्षोभ) से होने वाली वर्षा रबी की फसल के लिए वरदान होती है. इसे स्थानीय भाषा में मावठ कहा जाता है. यह वर्षा जम्मू कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उतराखंड, उत्तरप्रदेश में होती है. दक्षिण में उत्तरी पूर्वी मानसून से होने वाली वर्षा तमिलनाडू में होती है.

भारत में ग्रीष्म ऋतु (Summer season in india)

इस ऋतू में तापमान अधिक होने से अत्यधिक गर्मी पडती है. उत्तरी भारत में ऋतु में तापमान अधिक होने के तीन प्रमुख कारण है.

  1. सूर्य की किरणों का उत्तरी गोलार्द्ध में लम्बवत पड़ना.
  2. समुद्र से दूरी
  3. प्रति चक्रवातों के कारण तापमान में वर्द्धि.

ग्रीष्म ऋतु में उत्तरी भारत में तापमान 50 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुच जाता है. दक्षिण भारत में सागरीय प्रभावों से अपेक्षाकृत कम तापमान रहता है. इस समय के निकटवर्ती तथा पहाड़ी भाग ठंडे रहते है.

वायुदाब व पवनें- इस समय भारत में अत्यधिक गर्मी के कारण निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है. राजस्थान के मरुस्थल क्षेत्र तथा पंजाब में अति निम्न दाब हो जाता है. इसके विपरीत हिन्द महासागरीय में अधिक दाब रहता है. इस ऋतु में उत्तरी भारत में पवनें चलती है, जिन्हें लू कहा जाता है, कभी कभी तेज आँधियाँ व उनके साथ साधारण वर्षा भी हो जाती है. पश्चिम बंगाल में इन आँधी तूफानों को काल बैसाखी (kal baisakhi) कहते है.

वर्षा- इस ऋतु में वर्षा बहुत कम मात्रा में होती है, पश्चिम बंगाल में kal baisakhi तूफानों के साथ वर्षा होती है. दक्षिण भारत में मालाबार तट के पास होने वाली वर्षा को amar varsha तथा कहवा उत्पादन वाले क्षेत्रों की वर्षा को फूलों की बौछार कहते है. पंजाब हरियाणा, उतराखंड, असम में तूफानों के साथ ओला वृष्टि हो जाती है.

भारत का दक्षिण पश्चिमी या ग्रीष्मकालीन मानसून (south west monsoon season in india, Indian Climate)

वर्षा ऋतु (Rainy Season)

यह ऋतु भारत की कृषि को जीवन प्रदान करती है, देश के अधिकांश भागों में वर्षा इसी समय होती है. वर्षा ऋतू का काल पूर्णत मानसून पर निर्भर करता है.

तापमान (Temperature)-मानसूनी वर्षा में वृद्धि के साथ साथ तापमान में भी कमी आने लगती है, जुलाई अगस्त के बाद कुछ क्षेत्रों में सितम्बर में तापमान में वृद्धि हो जाती है. राजस्थान में सितम्बर में तापमान 38 डिग्री सेंटीग्रेड तक हो जाता है.

वायुदाब व पवनें- इस समय निम्न वायुदाब घने रूप में राजस्थान के थार मरुस्थल व पंजाब में केन्द्रित हो जाता है. उच्च वायुदाब दक्षिणी में हिन्द महासागर में केन्द्रित होता है. इससे हवाओं की दिशा दक्षिण पश्चिम से बनने के कारण ही यह दक्षिणी पश्चिमी मानसून (Southwest monsoon) के नाम से जाना जाता है. वायुदाब का केंद्र सरकने के साथ ही मानसून पवनें आगे बढ़ती है.

वर्षा- दक्षिणी पश्चिमी मानसून (Southwest monsoon) दक्षिणी प्रायद्वीप की स्थति के कारण दो शाखाओं में बंटकर भारत में वर्षा करता है, Southwest monsoon की दो शाखाएँ ये है.

  1. अरब सागरीय शाखा
  2. बंगाल की खाड़ी की शाखा

अरब सागरीय शाखा (Arabian Sea Branch)– यह शाखा बंगाल की खाड़ी की शाखा से अधिक शक्तिशाली है. यह सबसे पहले पश्चिमी घाट से सीधी टकराती है, यहाँ पर इससे 250 से 300 सेंटीमीटर तक वर्षा होती है. इस शाखा का वेग यही पर समाप्त हो जाता है. इससे पठार के भीतरी भागों में अल्प वर्षा होती है, क्योंकि यह क्षेत्र वृष्टि छाया क्षेत्र होता है.

इसकी नागपुर उपशाखा नर्मदा ताप्ती घाटियों के मध्य होती हुई, आगे जाकर बंगाल की खाड़ी की शाखा में मिल जाती है. एक अन्य उपशाखा गुजरात, राजस्थान होते हुए, सीधी पश्चिमी हिमालय तक पहुच जाती है. राजस्थान अरावली श्रेणियों की स्थति मानसून पवनों के समानंतर होने के कारण यहाँ इनमें कम वर्षा प्राप्त होती है.

बंगाल की खाड़ी की शाखा (Branch of bay of bengal) यह शाखा अवरोध के कारण दो उपशाखाओं में बंट जाती है. एक शाखा अरुणाचल प्रदेश व असम की ओर चली जाती है. यह उपशाखा गारो पहाडियों से टकराकर इस क्षेत्र में वर्षा करती है. यह पर मनसिराम में सर्वाधिक वर्षा होती है.

भारतीय जलवायु में बंगाल की खाड़ी की दूसरी उपशाखा हिमालय की तराई के साथ आगे बढ़ती है. इससे बिहार, उत्तर प्रदेश, छतीसगढ़, झारखंड, उतराखंड में अधिक वर्षा होती है, पश्चिम में जाने के साथ साथ इसमें वर्षा की प्राप्ति की मात्रा घटती जाती है, इससे पश्चिमी पंजाब व राजस्थान में बहुत कम वर्षा होती है.

भारत में शरद ऋतु में जलवायु (The climate in the autumn in India)

यह भारत में मानसून लौटने का समय है. इस समय मानसून लौटने के पूर्व से ही सूर्य से एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में जाने से तापमान में कमी आ जाती है. तापमान में परिवर्तन से वायुदाब का क्षेत्र भी दक्षिण की ओर खिसकता रहता है. पवनों की दिशा दक्षिण पश्चिम से बदलकर उत्तरी पूर्वी हो जाती है. इनके द्वारा तमिलनाडू का पठार तथा कुछ आंतरिक भागों में वर्षा होती है.

भारत में वर्षा का वितरण (Rainfall Distribution in India In Hindi)

हमारे देश में वर्षा का वितरण समान नही है. वर्षा के क्षेत्रीय वितरण के आधार पर भारत की जलवायु को चार भागों में बांटा जा सकता है.

अधिक वर्षा वाले क्षेत्र (areas with heavy rainfall in india)

इसमें असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, नागालैण्ड, मिजोरम व हिमालय के दक्षिणवर्ती तलहटी, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उतराखंड, पश्चिम तटीय मैदान तथा पश्चिम घाट का पश्चिम घाट वाला भाग शामिल है. यहाँ 200 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा प्राप्त होती है. अधिक वर्षा के कारण यहाँ उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन पाये जाते है.

साधारण वर्षा वाले भाग (second highest rainfall in india)

इसके अंतर्गत पश्चिम घाट के पूर्वोत्तर ढाल, दक्षिणी पश्चिमी बंगाल, छतीसगढ़,झारखंड, उड़ीसा, दक्षिणी पूर्वी उत्तरप्रदेश, हिमालय के तराई के क्षेत्र, पूर्वी तमिलनाडु आदि शामिल है. यहाँ वर्षा 100 से 200 सेंटीमीटर के मध्य होती है. यहाँ पर मानसूनी वन मिलते है.

भारत के न्यून वर्षा वाले भाग (lowest rainfall states in india)

इसके अंतर्गत दक्षिणी प्रायद्वीप का आंतरिक भाग, मध्यप्रदेश, पूर्वी राजस्थान, पंजाब हरियाणा, दक्षिणी उत्तरप्रदेश, उत्तरी व दक्षिणी आंध्रप्रदेश तथा मध्य पूर्वी महाराष्ट्र शामिल है. इस भाग में वर्षा 50 से 100 सेंटीमीटर के मध्य होती है.

अपर्याप्त वर्षा वाले भाग (Inadequate Rainfall states in india)

इस भाग में तमिलनाडु का रायलसीमा क्षेत्र, कच्छ, पश्चिमी राजस्थान, पश्चिमी पंजाब ब लद्दाख आदि क्षेत्र शामिल है, यहाँ पर वर्षा 50 सेंटीमीटर से भी कम होती है.

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