Co Education Essay In Hindi | सहशिक्षा पर निबंध व भाषण

Co Education Essay In Hindi सहशिक्षा पर निबंध व भाषण
Co Education Essay In Hindi

Co Education Essay In Hindi सहशिक्षा पर निबंध व भाषण

सह शिक्षा का अर्थ व परिभाषा (co education meaning in hindi language)

सह शिक्षा का आशय यह है कि एक ही छत के तले लड़के और लड़कियों को एक साथ बिठाकर शिक्षा देना है. आजादी के बाद से ही भारत में बच्चें व बच्चियों को एक ही स्कूल में एक ही कक्षा में साथ शिक्षा देने की व्यवस्था की गयी, जो आज तक जारी हैं. मगर कुछ रुढ़िवादी विचारधारा से ग्रस्त लोग इसका विरोध करते रहे हैं.

आजकल कई सरकारी और निजी बालिका विद्यालय भी खोले गये हैं, जहाँ केवल लड़कियों को ही शिक्षा दी जाती हैं. समाज भी धीरे धीरे बदलावों को स्वीकार करते हुए सह शिक्षा के सम्बन्ध में स्वीकृति दे रहा हैं.

सह शिक्षा के लाभ व फायदे (points advantages &benefits of co education)

आज के वैज्ञानिक युग में जहाँ एक तरह स्त्री पुरुष समानता की बाते कही जाती हैं तो दूसरी तरफ वे ही लोग सहशिक्षा की व्यवस्था को सवाल करते हैं. सहशिक्षा की व्यवस्था हमारे देश में सदियों से चली आ रही हैं. जिसके तहत बच्चें बच्चियां साथ साथ गुरुकुलों में पढ़ा करते थे.

भारत में मध्यकाल से पूर्व तक स्त्री पुरुष के विषय में इतना भेदभाव नहीं था. मगर मुस्लिम आक्रान्ताओं की बुरी नजर का शिकार बनी बालिकाओं को घर में पर्दा प्रथा तक सिमित कर दिया. एक लम्बे दौर तक सहशिक्षा के इस विराम के चलते स्त्री पुरुष के भेद को जन्म दिया जो आज तक लोगों के दिमाग में रसी बसी हैं.

सहशिक्षा के नुक्सान व आलोचक (co education disadvantages in hindi)

सह शिक्षा प्रणाली की आलोचना करने वाले न सिर्फ भारत में ही बल्कि दुनियां के कई हिस्सों में इस सिस्टम को चुनौती मिलती रही हैं. पूर्वाग्रह की मानसिकता से ग्रस्त लोगों का तर्क होता हैं कि सहशिक्षा के चलते लड़के लड़की एक दूसरे से आकर्षित होने लगेगे इससे उनका शिक्षा में मन नहीं लगता हैं.

वे पढ़ाई का त्याग कर प्रेम प्रसंग में पड़ जाएगे और कुछ लोग मानते हैं कि लड़कियाँ बेहद शर्मीले स्वभाव की होती हैं जिसके कारण व कक्षा में आजादी के साथ नहीं पढ़ सकती हैं. उनका मानना है कि लड़कियों के लिए अलग से विद्यालयों की स्थापना हो जिससे वे पूर्ण स्वतंत्रता के साथ शिक्षा प्राप्त कर सके.

सहशिक्षा पर अनुच्छेद भाषण (school group discussion co education speech paragraph)

स्त्री और पुरुष मिलकर ही समाज बनाते हैं हम घर परिवार में साथ साथ रहते हैं. यही समावेशी पद्धति भारतीय शिक्षा प्रणाली में सहशिक्षा के रूप में देखने को मिलती हैं. जिसके तहत एक ही क्लाश में लड़के लड़की साथ बैठकर पढ़ते हैं. जिनमें भी दोनों की कतार अलग अलग होती हैं.

एक अंग्रेज महोदय का मानना है कि स्त्री के पास बैठकर पुरुष अध्ययन नहीं कर सकता, यौन आकर्षण के चलते दोनों शिक्षा की तरफ ध्यान नहीं दे पाते हैं. उन्ही की बात को माना जाए तो क्या यह सम्भव है कि एक पुरुष को वही अध्ययन करना चाहिए जहाँ कोई स्त्री नहीं हो, ऐसे घर में बसना चाहिए जहाँ स्त्री का नाम तक न हो.

पांच से दस साल के बच्चें जो अपने भाई बहिनों या पड़ोसियों के साथ एक पारिवारिक वातावरण में शिक्षा पाते हैं. इस उमरह के बच्चों के लिए ध्यान भटकने जैसा कोई विषय नहीं हो सकता, हाँ उच्च शिक्षा में सह शिक्षा के विषय इस तरह के तर्क अवश्य माने व समझे जा सकते हैं.

हम कई बार अपने आस-पास तथा समाचार पत्रों में भी खबरे पढ़ते है जिनमें छात्र छात्राओं के प्रेम के किस्से सह शिक्षा व्यवस्था पर सवाल करने के अवसर पैदा करते हैं. जबकि ऐसा तो विद्यालयों के बाहर भी बड़ी संख्या में होता हैं  साथ ही  बालिकाओं  के लिए अलग विद्यालयों में भी शर्मनाक घटनाएं होती आई हैं. विद्यालय प्रशासन की खामियों के चलते इस प्रकार की शर्मसार घटनाएं अवश्य ही बच्चों के मस्तिष्क में संशय पैदा करती हैं.

सह शिक्षा के महत्व के सम्बन्ध में भी लोगों के अलग अलग विचार हैं. कुछ लोग मानते है कि सह शिक्षा के चलते लम्बे समय तक साथ पढने से विपरीत लिंगी आकर्षण खत्म होने लगता है और उदासीनता आने लगती है और बच्चें अपने साथियो की ओर ध्यान देने की बजाय अपने भविष्य के प्रति चिंतित रहता हैं.

भारत जैसे देश में जहाँ विद्यालय पहले से कम हैं यदि भवन भी बने है तो वहां शिक्षकों तथा उचित शिक्षण व्यवस्था की कमी हैं ऐसे में लड़के तथा लड़कियों के लिए अलग विद्यालयों की स्थापना आर्थिक दृष्टि से फिजूल हैं. तथा भारत में सह शिक्षा की व्यवस्था के लिए भी कोई मध्यम मार्ग निकालना चाहिए.

बुद्धिजीवियों का मत है कि लड़के लड़कियों के साथ पढने से उनकी आपसी समझ बढ़ती हैं. जो आगे चलकर जीवन में बेहद सहायक सिद्ध होती हैं. यदि किसी माता पिता के बेटे बेटियां एक ही विद्यालय में पढ़ती है तो अभिभावकों के लिए भी समस्याएँ कम हो जाती हैं. बच्चे भी साथ पढने आने जाने में सुरक्षित महसूस करते हैं.

सह शिक्षा के विषय में उठ रहे सवालों के दो निदान हो सकते हैं एक तो यह कि रुढ़िवादी सोच के लोग अपनी सोच में बदलाव लाए कि समाज तभी प्रगति कर पाएगा. जब बेटे बेटी का भेद खत्म हो. दूसरा यह कि सह शिक्षा के विषय में कुछ सुधार कर मध्यम मार्ग को अपनाया जाए जो सभी को स्वीकार्य भी हो.

प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक कक्षाओं तक सहशिक्षा की व्यवस्था को बरकरार रखते हुए उच्च शिक्षा में बालिकाओं के लिए अलग विद्यालय खोलकर भी आलोचकों को संतुष्ट किया जा सकता हैं. तेजी से बदलता समाज सहशिक्षा के विचार को वैसे भी स्वीकार कर चुका हैं. जिसका नतीजा हमें छात्रों के समान ही छात्राओं की सहभागिता तथा विभिन्न बोर्ड कक्षाओं के टोपर में बालिकाओं का शुमार होना निश्चय ही भारत में सह शिक्षा की अभूतपूर्व सफलता हैं.

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