राजनीति का अपराधीकरण | Criminalization Of Politics In Hindi

Criminalization of Politics– देश की आजादी के बाद लोकतंत्र कों भारत शासन व्यवस्था का आधार बनाने का मुख्य उद्देश्य यही था, कि राष्ट्रीय और निकाय शासन व्यवस्था में आमजन की भागीदारी सुनिश्चित की जाए. स्वतंत्रता प्राप्ति के 72 साल बाद भारत आज विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भले ही कहा जाए, मगर जिस तरीके से हमारी राजनीति का अपराधीकरण बढ़ रहा हैं. यक़ीनन भारतीय लोकतंत्र के लिए आगामी आने वाली सबसे बड़ी चुनौती की आहट हैं.

राजनीति का अर्थ आदर्श शासन व्यवस्था माना जाता है, मगर  आज के परिपेक्ष्य में यह अपनी मर्यादा और नैतिक मूल्यों का विस्मरण कर चुकी हैं. यही वजह हैं आए दिन हम साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाई-भतीजावाद,वंशवाद और कलंकित चरित्र वाले राजनेताओं के बारे में पढ़ने को मिल ही जाता हैं.

Criminalization Of Politics In Hindi (राजनीति का अपराधीकरण)

आज के नेता लोग साम, दान, भेद, दण्ड किसी भी उपाय के जरिये सत्ता और पद प्राप्ति की होड़ में बने रहते हैं. सरकारी तन्त्र के क्लर्क से लेकर शासन दल के नेता तक पर भ्रष्टाचार, और कुचरित्र के आरोंप लगते हैं. राजनीति में इस अपराधीकरण की परम्परा ने लोकतंत्र का अर्थ जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा की परिभाषा को बदल कर स्वय का, स्वय के परिवार के लिए, जनता द्वारा चुने जाने वाले शासन का पर्याय बन चूका हैं.

अब तक के छोटे-बड़े घोटालों में किसी न किसी रूप से हमारे राजनेताओ से जुड़े हुए हैं, चाहे वो सीधे तौर पर हो, या अप्रत्यक्ष तरीके से. जो राजनीती में अपराध की अधिकतम सीमा हैं. कुकर्म इंसान के चरित्र का हिस्सा ही होता हैं, गलत उम्मीदवार चयन एवं समाज में व्याप्त जातिवाद के कारण के तरह के अपराधी तत्व राजनीती में अपने पैर पसारने में सफल हो जाते हैं.

यदि किसी विभाग का शीर्ष अधिकारी अच्छे चरित्र का न हो, अपराधी प्रवृति में यकीन करने वाले इस तरह के नेता या अधिकारी के विभाग से स्व्छ्द, जनहित और कार्यो की पारदर्शिता की उम्मीद नही की जा सकती. चाहे हमारा सिस्टम कितना भी क्यों न बदल दिया जाए, यदि इस तरह के लोग सिस्टम का हिस्सा होंगे तो परिस्थतियों को पूरी तरह बदलना आसान नही होता हैं.

भ्रष्ट तन्त्र और भाई-भतीजेवाद के कारण आज योग्य जन सरकारी सेवा के विशिष्ट पदों तक नही पहुच पाते हैं. राजनीती में धाक रखने वाले नेता किसी राजकीय भर्ती कों सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं. उस भर्ती प्रक्रिया में कुछ लोग बिना उस पद के योग्य होते हुए भी ऐसे नेताओ के सहयोग और सिफारिश के दम पर सिस्टम में आ जाते हैं, दूसरी तरफ जो व्यक्ति इस प्रकार के पदों के असली हकदार होते हैं, उन्हें वचित होना पड़ता हैं.

आवश्यक योग्यता होने के उपरान्त भी न चुने जाने वाले युवाओं में हमारे सिस्टम के प्रति कुंठा और विद्रोह के भाव भर जाते हैं, नतिजेजन हमारी व्यवस्था से उनका विशवास उठ जाता हैं और लोग अपराध की दुनियाँ में चले जाते हैं. राजनीति में अपराधीकरण की इसी व्याधि के कारण हमारा देश कई क्षेत्रों में पिछड़ रहा हैं.

अब वक्त आ चूका हैं, सभी लोग जाति, धर्म और वर्ग की न्यून परिधियों का त्याग करते हुए एकजुट हो. राजनीती में व्याप्त अपराधीकरण को जड़ से मिटाने के लिए प्रयास करे. सदियों पुरानी इस व्यवस्था को रातोंरात तो नही बदला जा सकता, मगर निरंतर प्रयास से इसका निदान सम्भव हैं.

अपराधीकरण की इस प्रवृति पर रोक लगाने में हमारा राष्ट्रिय चुनाव आयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं. क्युकि अधिकतर राजनेता वंशवाद और अपने धन के बल पर ही चुनावों में उतरते हैं, तथा इसका अनियंत्रित उपयोग करते हुए चुनाव जीतकर सत्ता पर काबिज हो जाते हैं.

पैसे के प्रभाव की अधिकता के कारण स्वेच्छा से जनसेवा की इच्छा रखने वाले कर्तव्यनिष्ट नवयुवक आगे नही बढ़ पाते हैं, या उन्हें धन प्रभाव से परास्त कर दिया जाता हैं. हार की कुंठा से ईमानदारी लोग राजनीती की राह छोड़ देते हैं, जिससे ऐसे भ्रष्ट लोगों को अच्छा अवसर मिल जाता हैं.

दूसरी तरफ सता के लोभी राजनेता वोटबैंक और साम्प्रदायिक राजनीती का सहारा लेते हैं. आम-जन को जरुरी चुनावी मुद्दों से भटकाकर धर्म और जातीय मामलों में उलझा देते हैं, आज की राजनितिक पार्टिया भी किसी चुनावी क्षेत्र में अपना प्रत्याशी चयनित करने के लिए उम्मीदवार की आयु, योग्यता और चरित्र पर ध्यान देने की बजाय वहाँ के राजनितिक समीकरण को विशेष वरीयता देती हैं. इस कारण भी लोग जातिवाद की मानसिकता पर अपना मतदान करते हुए, उन दलों के राजनितिक उद्देश्यों कों पूरा करते हैं.

हमारे सविधान का आधार धर्मनिरपेक्षता मानी जाती हैं, जो चुनावी क्षेत्र में तो बिलकुल व्यवहार में नजर नही आती हैं. भारत के सविधान और देश की अखंडता की शपथ लेने वाले यही राजनेता चुनावी समय में धर्मनिरपेक्षता कों डेस्क में रखकर जातिवाद का मुखोटा धारण कर जनता से जाति के नाम पर वोट मागते हैं.

जीप घोटाला, बीएचयू फंड घोटाला, हरिश्चंद्र मूंदड़ा कांड, तेजा लोन घोटाला, नागरवाला कांड, कुओ तेल कांड, बोफोर्स तोप घोटाला, प्रतिभूति शेयर घोटाला, हवाला कांड, यूरिया खाद घोटाला, बिहार का चारा घोटाला, केतन पारिख शेयर घोटाला, तहलका काण्ड, स्टाम्प पेपर घोटाला, हसन अली खान टैक्स चोरी घोटाला, सत्यम घोटाला, खाद्यान्न घोटाला, हाउसिंग लोन घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला आदि.

हालाँकि वर्तमान सरकार के तीन वर्षो में कोई हेराफेरी की घटना न घटित होना एक बदलते भारत का प्रतीक हो सकती हैं. इस प्रकार के सकारात्मक कार्यो और प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए. हमारे शासन तन्त्र में आज भी कई बड़े बाहुबलियों का वर्चस्व कायम हैं. जो अपने अपराधिक इतिहास को सफेद शोला पहनाकर आज शासक बने हुए हैं, प्रत्येक वयस्क मतदाता को चाहिए, कि वो अपने मताधिकार का सोच समझकर और बिना प्रलोभ में आए, इस अधिकार का अपने विवेक से उपयोग करे.

राष्ट्रिय चुनाव आयोग भी अपनी अचार सहिंता में आवश्यक बदलाव करते हुए, जहाँ तक संभव हो अपराधी प्रवृति तथा भ्रष्ट चरित्र के लोगों को राजनीती में प्रवेश से पूर्व रोकथाम के लिए आवश्यक पहल करे. किसी तरह अपने कुकर्मो को छुपाकर यदि कोई शासन व्यवस्था का हिस्सा बन जाता हैं, तो उनके खिलाफ सबूत की मौजूदगी पर कठिन से कठिन यातना का प्रावधान हो तो हमारी राजनितिक व्यवस्था से अपराधीकरण की प्रवृति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता हैं.

कहा जा सकता हैं. अब वक्त आ चूका हैं, देश के प्रत्येक जागरूक मतदाता, चुनाव आयोग और सभी राजनितिक दलों को पुनः एक बार हमारी राजनितिक व्यवस्था का अवलोकन करना होगा. राजनीति का अपराधीकरण में कमी लाने के लिए जागरूकता के साथ-साथ हमारी आचार सहिंता में बदलाव लाकर बहुत बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता हैं.

Criminalization Of Politics पर आज का यह निबंध (Essay) कैसा लगा, कमेंट कर जरुर बताए.criminalisation in politics इस टॉपिक से सम्बन्धित आपकों किसी प्रकार की जानकारी चाहिए, तो कमेंट कर अवश्य बताए.

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