भाषा किसे कहते हैं Definition Of Language In Hindi

भाषा किसे कहते हैं Definition Of Language In Hindi: नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत है आज के आर्टिकल में हम भाषा के बारें में जानेगे. भाषा/ मातृभाषा क्या है इसका अर्थ परिभाषा, महत्व, आवश्यकता प्रकृति, उत्पत्ति और भाषा के प्रकार के बारें में यहाँ विस्तार से जानकारी दी गई हैं.

Definition Of Language In Hindi

भाषा किसे कहते हैं Definition Of Language In Hindi

भाषा का अर्थ क्या हैं (What is the meaning of language)

वह माध्यम जिससे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के सामने अपने विचार अनुभवों तथा अपने मन के भावों को प्रकट कर सके. अपने भावों को हम आँख, कान, नाक, पैर तथा शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से प्रकट कर सकते हैं. वस्तु प्रदर्शन, चित्र प्रदर्शन एवं भिन्न भिन्न क्रियाओं द्वारा भिन्न संकेतों द्वारा व्यापक अर्थ में भाव प्रकाशन के इन सभी साधनों को भाषा कहते हैं.

वर्तमान युग में अधिकतर विद्वान्, विचार तथा अनुभवों को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होने वाले ध्वनि संकेतों को ही भाषा की संज्ञा देते है. इसलिए शास्त्रीय धर्म में विचार की अभिव्यक्ति के लिए किसी समाज द्वारा स्वीकृत जिन ध्वनि संकेतों का व्यवहार होता है उसे भाषा कहते हैं.

सामान्यतः भाषा मनुष्य की सार्थक वाणी को कहते है. भाषा शब्द संस्कृत के भाष धातु से बना है. इसका अर्थ वाणी को व्यक्त करना होता है. इसके द्वारा मनुष्यों के भावों, विचारों और भावनाओं को व्यक्त किया जाता हैं. यह भाव प्रकाशन अनेक प्रकार से किया जाता हैं. जैसे पशु पक्षियों की बोली, संकेत विभिन्न संकेत और मानव की भाषा शब्द द्वारा ग्रहण किया जाता हैं.

  • पशु पक्षियों की बोली– पशु पक्षियों की बोली के लिए भी भाषा शब्द का प्रयोग किया जाता हैं. जैसे कुत्तों व बंदरों की भाषा. गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामायण में कहा है कि समुझई खग खग ही के भाषा.
  • सांकेतिक– हाथ, आँख, सिर आदि के हिलाने से विभिन्न अर्थों की अभिव्यक्ति की जाती है. इस प्रकार आंगिक संचालन या संकेतों की भाषा कहा जाता हैं.

भाषा की परिभाषा Definition Of Language In Hindi

भाषा के सम्बन्ध में पाश्चात्य व भारतीय विद्वानों में पर्याप्त मतभेद भी हैं. पशुपक्षियों की भाषा अव्यक्त है और मनुष्यों की व्यक्त क्योंकि मनुष्यों की भाषा वाणी के रूप में प्रयुक्त वर्ण स्पष्ट होते हैं. अतएव महाभाष्यकार ने व्यक्त वर्णनात्मक वाणी को ही भाषा माना हैं.

आचार्य किशोरीदास वाजपेयी के अनुसार- विभिन्न अर्थों में सांकेतिक शब्द समूह की भाषा है, जिसके द्वारा हम अपने विचार या मनोभाव दूसरों के प्रति बहुत सरलता से प्रकट करते हैं.

डॉ भोलानाथ तिवारी के अनुसार भाषा उच्चारणव्यवों से उच्चारित अध्ययन विश्लेष्णणीय याद्रछिक ध्वनि प्रतीकों की वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा एक समाज के लोग आपस में भावों और विचारों का आदान प्रदान करते हैं.

इस प्रकार संघटनात्मक दृष्टि से भाषा शास्त्रियों ने भाषा की जो परिभाषा दी है, उसे इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता हैं. भाषा याद्रच्चिक वाचिक ध्वनि संकेतों की वह पद्धति हैं जिसके द्वारा मानव परस्पर विचारों का आदान प्रदान करता हैं. प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पन्त के अनुसार भाषा संसार का नादमय चित्र है ध्वनिमय स्वरूप है यह विश्व की ह्रदयतंत्र की झंकार है जिसके स्वर में यह अभिव्यक्ति पाई जाती हैं.

भाषा की प्रकृति ( Meaning and nature of language in hindi)

भाषा संसार , सागर की तरह सदैव चलती बहती है भाषा के गुण या स्वभाव को उसकी प्रकृति कहते है. हर भाषा की प्रकृति, आंतरिक गुण अवगुण होते है. भाषा एक सामाजिक शक्ति है जो मनुष्य को प्राप्त होती है. मनुष्य उसे अपने पूर्वजों से सीखता हैं. और विकास करता है. यह परम्परागत व अर्जित दोनों हैं. जीवंत भाषा बहते नीर की तरह सदैव प्रवाहित होती रहती है भाषा की प्रकृति को निम्न बिन्दुओं में समझा जा सकता हैं.

  1. भाषा पैतृक सम्पति नहीं होती हैं.
  2. भाषा एक अर्जित सम्पति होती हैं.
  3. भाषा एक सामाजिक उपयोग की भावनात्मक वस्तु होती हैं.
  4. भाषा परम्परागत होती है, व्यक्ति उसका अर्जन कर सकता हैं. उसे उत्पन्न नहीं कर सकता.
  5. भाषा का अर्जन अनुकरण के माध्यम से होता हैं.
  6. भाषा चिरपरिवर्तनशील होती है अर्थात भाषा का कोई रूप अंतिम स्वरूप नहीं होता अर्थात भाषा में समय के साथ विकास होता रहता हैं. वह नयें शब्दों को ग्रहण करती है व पुराने शब्दों का त्याग करती है. इस परिवर्तनशील भाषा को सजीव भाषा कहते हैं, लेकिन जिस भाषा में कोई परिवर्तन या विकास नहीं होता वह मृत भाषा कहलाती हैं.
  7. प्रत्येक भाषा की एक भौगोलिक सीमा होती हैं.
  8. प्रत्येक भाषा की सरंचना अलग होती हैं.
  9. भाषा के दो आधार होते हैं. 1. लिखित और 2. मौखिक.

भौतिक/ लिखित भाषा या स्थायी भाषा: अपने लिखित रूप में भाषा सदा स्थायी रह सकती है, क्योंकि इनका प्रयोग आने वाली पीढ़ियों के लिए किया जा सकता हैं. हमारा परम्परागत साहित्य लिखित रूप में ही हमें प्राप्त हुआ हैं.

अभौतिक/ मौखिक अथवा अस्थायी भाषा: अपने उच्चरित रूप में भाषा अस्थायी या क्षणिक होती है तथा अपने मूक रूप में मौखिक अवस्था में होती हैं.

भाषा का महत्व (importance of language in hindi)

मनुष्य के द्वारा अर्जित किया गया सबसे महत्वपूर्ण उपागम भाषा ही है. जिसके द्वारा मनुष्य ने विभिन्न प्रकार के अविष्कार तथा वैचारिक प्रगति की है, भाषा के माध्यम से ही मनुष्य अपने दम पर इस सृष्टि में एक बुद्धिमान प्राणी के रूप में जाना जाता है. लिपि का वरदान पाकर तो हमारी भाषा पूर्णरूपेण स्थायित्व आ गया हैं.

 मातृभाषा शिक्षण का महत्व (Importance of mother tongue in teaching)

  • मातृभाषा शिक्षण से सरसता एवं पूर्णता की अनुभूति होती हैं.
  • मातृभाषा शिक्षण से अभिव्यक्ति में स्वाभाविकता एवं प्रभावोत्पादकता सम्भव हुई हैं.
  • मातृभाषा शिक्षक से सामाजिक एकता में सहायता प्राप्त होती हैं.
  • ज्ञानोपार्जन का साधन हैं.

भाषा की उत्पत्ति (Origin of language in hindi)

भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अत्यंत प्राचीन काल से विभिन्न विद्वानों ने विचार प्रदान किये हैं. इन्ही विद्वानों के द्वारा भाषा की उत्पति के सम्बन्ध में निम्न सिद्धांत प्रदान किये हैं.

  • दैवी उत्पत्ति सिद्धांत– भाषोतप्ति का यह सर्वाधिक प्राचीन मत है, जिसके अंतर्गत संस्कृत भाषा को सबसे प्राचीन भाषा माना गया.
  • विकासात्मक सिद्धांत– इस सिद्धांत के अनुसार भाषा का विभिन्न कालों में विकास होता रहता हैं.
  • धातु या डिंग डोंग सिद्धांत – इसे डिंग डोंग वाद या भाषा का रणन सिद्धांत कहा जाता हैं. इस सिद्धांत के अनुसार संसार की हर वस्तु की अपनी उच्चारण ध्वनि होती हैं तथा इसी ध्वनि से शब्दों तथा भाषा की उत्पत्ति हुई हैं.
  • अनुकरण सिद्धांत– मनुष्य के द्वारा अपने आसपास की वस्तुओं का अनुकरण करके नवीन शब्दों की रचना तथा उन्ही शब्दों से धीरे धीरे भाषा का विकास हुआ हैं.
  • यो हे हो सिद्धांत– इसे परिश्रम ध्वनि या थकान परिहरण, श्रमापहार मूलकतावाद भी कहते है, इस सिद्धांत के प्रवर्तक न्यावर नामक विद्वान् हैं. इस सिद्धांत में भाषा की उत्पति श्रमिकों के द्वारा परिश्रम किये जाने के समय निकलते शब्द हो हो, हु हु, हैया हैया आदि के कारण माना गया हैं.
  • टा टा सिद्धांत- इस सिद्धांत के अनुसार आदि मानव काम करते समय अनजाने में कई ध्वनियों व संयोगवश उच्चारण करता था तथा इन्ही ध्वनियों व शब्दों से ही धीरे धीरे भाषा का विकास हुआ.
  • संगीत सिद्धांत– इस सिद्धांत के अनुसार गाने से प्रारम्भिक अर्थ विहीन अक्षर बनें तथा विशेष स्थतियों में उनका प्रयोग होने से उन अक्षरों हो गया हैं.
  • सम्पर्क सिद्धांत– इस सिद्धांत के प्रवर्तक जी रैवेज महोदय के अनुसार मनुष्य के विभिन्न समूहों के परस्पर सम्पर्क से भाषा की व्युत्पत्ति एवं विकास हुआ हैं.

भाषा के प्रकार (Type of language in hindi)

भाषा को निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया.

मातृभाषा: बच्चा जन्म लेते ही जिस भाषा को अपने माता पिता या अन्य परिवार जनों द्वारा सुनता है. वह भी बोलने योग्य होने पर उसी भाषा का प्रयोग करने लगता हैं. यही मातृभाषा होती हैं. गांधीजी ने मातृभाषा की श्रेष्ठता को समझाते हुए कहा हैं.

“मनुष्य के मानसिक विकास के लिए मातृभाषा उतनी ही आवश्यक है जितनी कि बच्चे के विकास के लिए माँ का दूध. बालक पहला पाठ अपनी माँ से ही पढ़ता हैं. इसलिए उसके मानसिक विकास के लिए उसके ऊपर मातृभाषा के अतिरिक्त कोई दूसरी भाषा लादना, मैं मातृभाषा के विरुद्ध पाप समझता हूँ.”

राजभाषा: जिस भाषा का व्यवहार राज कार्यों में किया जाता है वह राजभाषा कहलाती हैं. हिंदी अपने विकास काल से ही किसी न किसी रूप में राजकार्य का माध्यम रही हैं. स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत संविधान में हिंदी को राजभाषा का पद अनुच्छेद 343 में प्राप्त हुआ. 14 सितम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने हिंदी को भारत संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया है. संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत संघ की राजभाषा हिंदी व लिपि देवनागरी हैं.

राष्ट्रभाषा: राष्ट्रभाषा का शाब्दिक अर्थ होता है वह भाषा जिसे सम्पूर्ण देश में थोडा बहुत समझने की शक्ति रखता हो, अर्थात सम्पूर्ण देश थोडा बहुत समझने की शक्ति रखता हो, अर्थात किसी देश में कम अधिक रूप से बोली जाने वाली अधिकतर नागरिकों की भाषा को राष्ट्रभाषा कहते हैं.

राष्ट्रभाषा को समझने का प्रयास तो देश के प्रत्येक नागरिक को ही करना होता हैं. हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा हैं, जिसे पूरे भारत देश में अधिकांश जनता बोलती समझती हैं. बहुधा राष्ट्रभाषा ही राजभाषा का स्थान ग्रहण करती हैं.

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