Dr Br Ambedkar In Hindi | भीमराव अम्बेडकर के विचार और सम्पूर्ण जीवन

Dr Br Ambedkar In Hindi | भीमराव अम्बेडकर के विचार 

एक बिंदु, परिपूर्ण सिन्धु,
हैं ये मेरा हिन्दू समाज |
मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का,
करता सकता बलिदान अभय ||

Ambedkar In Hindi ये चंद लाइनें जो भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयीजी की हैं, जो भीमराव अम्बेडकर के सम्पूर्ण जीवन और विचारों का सार बया कर जाती हैं. कुछ लोग पहली बार में उखड़ जाते हैं. आपत्ति जता सकते हैं. विवाद खड़ा करने का प्रयास भी कर सकते हैं. परन्तु ठहरिये भीमराव अम्बेडकर का जीवन सरस सपाट और समतल नही हैं. यह बार-बार अपमान की चिंगारियों से तपता हैं, और जगह-जगह सम्मान के छिटो से शांत होता ऐसा व्यक्तित्व हैं, जिसकी द्रढ़ता विपरीत अनुभवों को सहते-समझते हुए कदम-दर-कदम बढ़ जाती हैं. भीमराव अम्बेडकर को यह मजबूती तत्कालीन परिस्थतियो ने दी हैं. खुद उस समाज ने दी हैं, जिसका हिस्सा थे. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर.

इस द्रढ़ता का विलक्षण पक्ष यह हैं कि भीमराव अम्बेडकर चोट खाते हैं और हर चोट के साथ सामाजिक मजबूती के काम में अधिक जोश-खरोश से जुट जाते हैं. समाज की व्यवस्थागत गलन और गंदगी पर बडबडाते हैं. लेकिन जहाँ राष्ट्र और समाज की अखंडता पर कोई हमला होता हैं, डॉक्टर अम्बेडकर बाबासाहेब बन जाते हैं. इस समाज के अनुभवी बुजुर्ग की तरह व्यवहार करते हैं. एकरस समाज और मजबूत राष्ट्र के प्रबल पक्षधर हो जाते हैं, उनका कवच बनकर खड़ा हो जाते हैं.

बालक भीम का भीमराव अम्बेडकर होने से बाबासाहेब रूपी राष्ट्र रक्षक कवच में ढालना ऐसी परिघटना हैं, जो सबके जीवन में नही घटती हैं. यदि घटती हैं तो उस यन्त्रणा को झेलना सबके बस की बात नही हैं. इस महामानव के जीवन की छोटी,छोटी घटनाएँ को तत्कालीन परिस्थितियों के सन्दर्भ में खुद को बाबासाहेब की नजर से देखना जरुरी हैं.

डा भीमराव अम्बेडकर का जीवन परिचय (Introduction of Dr. Bhimrao Ambedkar)

छोटे से बच्चों का अन्य बच्चों के साथ खेलने के लिए मचलना और विवशता से भरी माँ द्वारा उसे यह कहकर उठा लेना कि सूबेदार मेजर का बेटा होने के साथ तू म्हार भी हैं, बालमन पर कैसी चोट लगी होगी. बन्धनों में जकड़े बचपन की इस छटपटाहट और आसुओं में डूबे इस सबक को बच्चे की नजर से समझना होगा. बच्चे तो बच्चे हैं. पालकों में फर्क होता हैं क्या ? यह जीवन का पहला झटका, पहला सवाल हैं, जो भीमराव अम्बेडकर के मन में उथल-पुथल मचाता हैं.और उसे इस नन्ही उम्र में प्रश्नों की बजाय उत्तर खोजने की तरफ मोड़ देता हैं.

अन्य छात्रो-शिक्षकों के जूतों के पास बैठकर पढने की शर्त पर विद्यालय में दाखिला मिलना,पिता अपमान और ग्लानी से भरे हैं, माँ की आँखों में आसूं हैं. किन्तु छ वर्ष का बच्चा कह्ता हैं. माँ मेरा दाखिला करा दो, मै जूतों के पास बैठकर पढ़ लुगा. बच्चों में फर्क देखने वाले तथाकथित बड़े लोगों के समाज को भीमराव अम्बेडकर का यह पहला उत्तर हैं.

माँ भीमाबाई स्थति को समझती हैं और उसकी आखे अपने नन्हे बेटे की असीम सम्भावनाओं को पहचानती भी हैं. वह कहती हैं. बेटा तुम्हे समाज में बहुत अपमान झेलना पड़ेगा. बड़ी घ्रणा झेलनी पड़ेगी. इस सबकी परवाह ना करना. तुम्हे पढना हैं, बिना पढ़े कोई आदमी बड़ा नही बन सकता. जब तुम बड़े आदमी बन जाओगे तो समाज इस गंदी रीत को बदल डालना ,यही मेरी इच्छा हैं. माँ का सपना भीमराव अम्बेडकर के मन का संकल्प बनता हैं. घर से अपनी अलग टाट-पट्टी ले जाना, जूतों के बिच दहलीज पर बैठना. आधी छुट्टी में दीवार की ओर मुह करके पेट भरना.. उलह्नो को पीते, विषमताओ में जीते हुए अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित किये भीमराव अम्बेडकर समाज को दूसरा उत्तर हैं- परिस्थति से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. परिणाम

भीमराव अम्बेडकर की शिक्षा & समाज को संदेश (Education and thought of Bhimrao Ambedkar)

जिस माँ की अपने भीम को पढ़ाने और बड़ा आदमी बनाने का सपना था. उस माँ को इस कारण रोग से प्राण छोड़ते देखना कि तथाकथित के घर श्रेष्ट वेद्ध्य आने को तैयार नही, दिल बैठने लगता हैं. आँसू सुख जाते हैं. भूख मर जाती हैं, बच्चे भीमराव अम्बेडकर के लिए मानो पूरी दुनियाँ निष्प्राण हो जाती हैं. मगर वह खड़ा होता हैं, यह भीमराव अम्बेडकर की जिजीविषा हैं. उसने मन में संकल्प किया होगा कि निम्न और कुलीन के अन्यायपूर्ण प्रश्नों में झूलते समाज को उत्तर देना ही होगा.बैठने से काम नही चलेगा. माँ जिस रोग से गईं उससे बड़ा रोग समाज को लगा हैं. मै समाज के रोग का इलाज करुगा, भीमराव अम्बेडकर का यह मूक प्रण सामाजिक निष्ठुरताओ को तीसरा उत्तर हैं.

भीमराव अम्बेडकर बड़े हैं,तो बाधाएं पार करने के कारण. बाबासाहेब का व्यक्तित्व विराट हैं तो इस कारण कि कदम-कदम पर अपमान का विष पीने के बाद भी मन में घर्णा नही उपजी. ऐसा नही कि भीमराव अम्बेडकर को क्रोध नही आता. वे परिस्थतियो पर झुझलाते हैं, मुट्ठिया भिचते हैं, अकेले में रोते हैं, जाति की छोटी-बड़ी जंजीरों को तोड़ना चाहते थे. जो गलत करता उसे खुलकर फटकारते भी थे. लेकिन इन सभी मानवीय गुणों के साथ वे विलक्ष्ण हैं, तो इसलिए कि वे कभी भी अपनी सदाशयता छोड़ते नही, शब्द कैसे भी हो, उनका आशय सदा अच्छा बना रहता हैं. जिन्होंने अच्छा किया भीमराव अम्बेडकर उनकी अच्छाई नही भूलते थे.

रामजी सकपाल के पुत्र का नाम हैं भीमराव अम्बेडकर, उपनाम सकपाल . किन्तु प्राथमिक शाला के जिन ब्रह्मण्य मुख्यअध्यापक ने भीम के लिए सबसे पहले शिक्षा मन्दिर के दरवाजे खोले, इस छात्र की अनुपम मेघा को पहचाना, प्यार से अपना उपनाम दिया, बाबासाहेब ने उस ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर को अंत तक अपने ह्रदय से लगाए रखा.

dr ambedkar history ( बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर का इतिहास)

बड़ोदा नरेश महाराज गायकवाड का पूरा सहयोग इस मेधावी छात्र को मिला. उच्च शिक्षा के लिए भीमराव अम्बेडकर को छात्रवृति भी मिली, रियासत को सेवा देते हुए लेफ्टिनेंट का पद प्राप्त हुआ. अगर जब मृत्यु शैया पर पड़े पिता की सेवा के लिए छुट्टी न देने वाले अधिकारी से कड़वा व्यवहार मिलता हैं तो भीमराव अम्बेडकर महाराज से गुहार नही लगाते हैं. सम्बन्धो का लाभ नही उठाते हैं, कोई कटुता नही पालते. वे पिता की सेवा के लिए रियासत की रौबदारी नौकरी सहज ही छोड़ देते हैं. मान-अपमान की लड़ाई की बजाय वे अनुशासन और भारतीय संस्कारो की लीक पकड़ते हैं.

बाद में महाराज गायकवाड से मुलाक़ात होती हैं परन्तु दोनों ओर से वही सजगता, वही सहयोग और सम्मान मिलता हैं. विषम परिस्थितियों से जूझने के बाद भी चीजों को बिगड़ने ना देना. यह भीमराव अम्बेडकर की विशेषता हैं. सोचिए जो लोग बराबर बाबासाहेब के वर्ग हितेषी,सवर्ण शत्रु और विरोधी व्यक्तित्व के चित्र खीचते हैं, उनका चित्र कितना अधुरा हैं. कुछ लोग भीमराव अम्बेडकर को सिर्फ तत्कालीन तथाकथित वर्ग का क्रन्तिकारी नेता सिद्ध करने की कोशिश करते हैं. यह बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर की विराट सर्व समावेशी द्रष्टि कोसंकीर्ण दायरे में बाँधने का असफल प्रयास हैं.

यह उस व्यक्ति के साथ सरासर अन्याय हैं, जिन्होंने सामाजिक विषमताओ के दंश झेलने के बावजूद इस समाज की सामूहिक शक्ति को पहचाना और राष्ट्रहित में सबसे एक रहने का आवहान किया. सबसे पहले देश भीमराव अम्बेडकर की यही सोच थी. यहाँ जाति, वर्ग, धर्म औ पंथो के विभाजन की नही एकात्म की कल्पना हैं. देश की एकता और स्वतंत्रता के लिए छोटी-बड़ी जातियों में बटे सभी को एकजुट होना चाहिये.

भीमराव अम्बेडकर की जीवनी (Biography of Bhimrao Ambedkar)

मजहब पन्थ जाति किसी देश से बड़े नही हो सकते. बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर का स्पष्ट मत था. यह विचार बाबा साहेब ने वर्ष 1949 के अंत में एक भाषण में सामने रखा. इस भाषण का शीर्षक था- देश को समुदाय से उपर रखना चाहिए’ सामाजिक कटुता बाटती हैं और नुकसान पुरे देश को, पुरे समाज को होता हैं. यह बात अंबेडकर ने अपमान के घूट पीने के बाद कैसे मन में बैठाई होगी! क्या यह आसान था.

1917 में कोलम्बिया विश्विद्यालय से पढ़कर लौटे भीमराव अम्बेडकर को महाराज गायकवाड़ सैन्य सचिव का उचा ओहदा देते लेकिन जातिगत श्रेष्टता के झूठे बन्धनों को ढोते उनके अमलदारो में से कोई बाबासाहेब को लेने रेलवे स्टेशन नही पहुचता. उच्च जाति का चपरासी, सैन्य सचिव को फाइलें पकड़ता नही, दूर से पटकता हैं. इस अधिकारी के पानी मागने पर मातहत साफ़-साफ़ मना कर देते हैं. कोई घर देने को तैयार नही, पहचान छुपाकर कमरा ले लिया तो सामान सडक पर पटक दिया जाता हैं. दिल में दर्द उमड़ता हैं, आँखों में आसू आते हैं. किन्तु भीमराव अम्बेडकर बड़पन्न कि वे ऐसी तुच्छाओ को अपनी क्षमा की चादर से ढक देते हैं. यही भीमराव अम्बेडकर 1918 में बम्बई के सीडनहम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक में राजनीती और अर्थशास्त्र के शिक्षक होकर आते हैं तो एक रोज प्यास से गला सूखने पर घड़ा छूते भर हैं कि बवाल हो जाता हैं.

मेधा, शिक्षा, डिग्री सब व्यर्थ! क्या सनातनी कस्बे, क्या फ़ारसी धर्मशाला, क्या इसाई कॉलेज? सब जगह सोच का वही छोटापन, वही विष! यह महामानव हर कदम पर हलाहल पीता हैं मगर अपने भीतर किसी के लिए जहर नही पालता हैं. उपर्युक्त घटनाओं के संग- संग कालान्तर में भीमराव अम्बेडकर की प्रतिक्रियाओं के रूप में सामने आता हैं.उनका व्यक्तित्व स्वत अपना स्थान बनाता हैं.

बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर (Books of Baba Saheb Bhimrao Ambedkar)

किन्तु इन सबके साथ 25 नवम्बर 1949 को भीमराव अम्बेडकर का एक भाषण तुलनात्मक सन्दर्भ के तौर पर जरुर पढ़ा जाना चाहिए. यह भाषण बाबासाहेब की सांस्कृतिक चेतना का दस्तावेज तो हैं ही, यह भी दिखाता हैं की तुच्छ व्यवहार ने बाबासाहेब को आहत जरुर किया था. परन्तु उनकी समझ को कुंठित करने में असफल रहा था. इस रोज सविधान सभा के जरिए भीमराव अम्बेडकर ने देश को झकझोरा था. वह आवहान, वह चेतावनी आज भी पूरी तरह प्रांसगिक हैं. इस भाषण में देश के सांस्कृतिक आतीत और इस पर आक्रमणों का पूरा लेखा उन्होंने देश के सामने रखा था. अंबेडकर ने याद दिलाया कि जब मुहमद बिन कासिम भारत पर आक्रमण करने के लिए उत्तर-पश्चिम की सीमा पर आया.

तब राजा दाहिर ने मुकाबला करने का निर्णय किया, कितु दुर्भाग्य से राजा दाहिर पराजित हुए और मुहमद बिन कासिम जीत गया. वीर होने के बावजूद दाहिरसेन की हार हुई क्युकि उनका सेनापति देशद्रोही निकला. उस महामानव के जीवन की घटनाओं, घटनाओं की प्रतिक्रिया और इस सबसे पककर बात यह निकली सोच के सामने रखती ये कुछ झलकियाँ भर हैं. वास्तव में भीमराव अम्बेडकर का सारा जीवन समाज के कटुतम सवालों का सरल और सटीक उत्तर हैं.

मनोवैज्ञानिक तौर पर ‘जैसे को तैसा’ यह सहज मानवीय व्यवहार हैं. लेकिन भीमराव अम्बेडकर ने कैसा हैं, के सामने रखते हुए आम वैज्ञानिक धारणाएं झुटला दी. वे जुझारू थे. दबते नही थे. इसलिए इन्होने ‘अखिल भारतीय शेड्यूल कास्ट फेडरेशन’ बनाई थी. यह राजनितिक फैसला था. उनका साफ मानना था कि अस्प्रश्यता और अन्याय के विरुद्ध लड़ना हैं. तो यह घर के भीतर की बात हैं और यह लड़ाई बाकी हिन्दू समाज से कटे रहकर नही लड़ी जा सकती और न ही दलितों को हास्ये पर पड़े रहने देना इसका इलाज हैं.

Autobiography Of Ambedkar In Hindi

प्रसिद्ध कामगार मैदान सभा में उन्होंने कहा था कि इच्छा से हो या अनिच्छा से, दलित हिन्दू समाज का ही अंग हैं. हमने महाड और नासिक में जो सत्याग्रह संघर्ष किया हैं, वह हिन्दुओ पर इस बात का दवाब डालने के लिए ही था. कि वे दलितों को बराबरी के स्तर पर स्वीकार करे. उनकी व्यस्थावादी सोच में अस्पष्टता नही थी. न्याय व्यवस्था के बारे में राष्ट्रीय स्तर पर मन्तैक्य स्थापित करना उनकी चाह थी. भले ही उन्होंने स्वय कुछ भी झेला हो लेकिन इसके बाद भी समाज से अन्याय को दूर करने के लिए सबको सहमती तक पहुचाने का प्रयास करते रहना, निरंतर जूझना, यही उनके लिए ध्येय था.

यकीनन भीमराव अम्बेडकर बहुत बड़े हैं. लेकिन वे बड़े हैं बड़ी बाधाएँ पार करने के कारण, बाबा साहेब का व्यक्तित्व विराट हैं तो इस कारण कि कदम-कदम पर विष पीने के बाद भी मन में घ्राण नही उपजती. कुछ लोग बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर का जीवन कुछ लोगों की चिंता और अन्य से नफरत का पुलिंदा बनाकर पेश करते हैं. ऐसे प्रयास अपने आप में घ्रणित हैं. क्युकि यह एक बड़े आदमी को बौना साबित करने की कोशिश हैं. चिंदियो को तस्वीर की तरह दिखाना उस विराट चित्र का अपमान हैं. भीमराव अम्बेडकर इस सम्पूर्ण राष्ट्र इसकी चुनोतियो और अपने सहोदर समाज की परिस्थतियो का स्पंदन हैं.

समझने वाली बात यह हैं. कि भीमराव अम्बेडकर के जीवन में सामाजिक उठापठक और उलझाव तो खूब हैं. लेकिन दुराव नही हैं. यदि भीमराव अम्बेडकर तत्कालीन भारतीय समाज की बुराइयों को काटने वाली तलवार की तरह तीखे हैं तो इस समाज की साझा शक्ति को बचाने वाली ढाल हैं.

बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर पर निबंध (Essay on Bhimrao Ambedkar)

भारतीय संस्कृती में तप बड़ी चीज हैं. व्यक्ति को शक्ति और तेज देने वाली तपस्या की राह कभी आसान नही होती हैं. भीमराव अम्बेडकर का जीवन सरलताओ का सुगम पथ नही हैं. वही विपरीतताओ के कांटो और अपमान के अंगारों पर चलकर उन्हें कुचलकर तय की गईं यह एक दुर्गम यात्रा हैं. भौगोलिक और अखंडता को समाज का अभिन्न अंग और समाज हित को सर्वोपरी मानते हुए. खुद को गला देना कम बात नही हैं. यह तपस्या हैं, व्यष्टि यानि व्यक्ति समष्टि यानि सम्पूर्ण समाज के लिए कैसे अपना जीवन होम कर सकता हैं. इस बात की झांकी हैं भीमराव अम्बेडकर का तपमय जीवन.

-हितेश शंकर

मित्रों Dr Br Ambedkar In Hindi का ये लेख आपकों कैसा लगा, हमारे लिए भीमराव अम्बेडकर के विचार इस लेख के बारे में कोई सुझाव या सलाह के लिए हमे आपके कमेंट का इन्तजार रहेगा. आप भी अपनी रचित कोई कविता, लेख, निबंध, कहानी अथवा कोई अन्य सामग्री आपकी इस साईट पर अधिक लोगों तक पहुचाना चाहते हैं. तो आपका स्वागत हैं. आप हमे अपने लेख merisamgari@gmail.com पर भेज सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *