दशहरे से जुड़ी कहानियां Dussehra Full Story In Hindi

दशहरे से जुड़ी कहानियां Dussehra Full Story In Hindi: 8 अक्टूबर 2019 को हमारे देश में दशहरा अर्थात विजयादशमी का पर्व मनाया जा रहा हैं. माँ दुर्गा के नवरात्र के बाद दसवें दिन दशहरा का उत्सव मनाया जाता है बंगाल में इस दिन दुर्गा पूजा होती हैं. हिन्दू धर्म की धार्मिक कथाओं के अनुसार भगवान राम ने इस दिन राक्षस राज रावण का वध किया था. इसी उपलक्ष्य में आज भी हर साल दसवीं तिथि को दशहरा मनाते है तथा रावण कुंभकर्ण एवं मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं, हम दशहरा की पौराणिक कहानी फुल शोर्ट स्टोरी को जानते हैं.

Dussehra Full Story In Hindi

Dussehra Full Story In Hindi

Dussehra Story: विजयादशमी का पर्व एक ऐतिहासिक विजय का दिन है जिसके पीछे कई कहानियां सुनाई जाती हैं. इसे दशहरा भी कहते है जो एक संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है दस शीश वाला हारा. अर्थात रामायण के अनुसार हुए राम रावण के युद्ध में आज ही के दिन रावण की पराजय हुई थी.

Full Story Of Dussehra: हिन्दू धर्म के प्रत्येक देवी देवता का अपना महत्व है जिसके चलते उन्हें माना जाता है उसकी पूजा अर्चना की जाती हैं. माँ दुर्गा को शक्ति की देवी माना गया हैं. आश्विन नवरात्र के 9 दिनों तक भक्त उनकी पूजा करते है उपवास रखते है.

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दशहरा मनाने की मूल कथा भगवान राम और रावण से जुडी हुई हैं. इसमें प्रभु श्री राम एक महान यौद्धा एवं सत्य के प्रतीक की भूमिका में होते हैं. सीता हरण के बाद राम उनकी तलाश में लंका तक पहुँच जाते हैं. 9 दिन तक चले युद्ध के दौरान श्रीराम माँ दुर्गा की आराधना करते रहे और दसवें दिन उन्होंने रावण का वध कर विजय प्राप्त की.

एक आदर्श पुत्र, राजा, पति, भाई के रूप में राम को आदर्श पुरुष माना गया. सर्वगुण सम्पन्न प्रभु श्रीराम जितने विनम्र थे उतने साहसी भी थे. एक मनुष्य में इस तरह के सभी गुणों का मिलना कठिन है, अतः उन्हें पुरुषोत्तम के रूप में हम याद कर उनके बताएं रास्ते पर चलने का प्रयास करते हैं.

रामजी के लंका अभियान में उनके साथ भाई, लक्षमण, राजा सुग्रीव व हनुमान जैसा सेवक था. रामायण हिन्दू धर्म के इतिहास के एक युद्ध की कथा भर नहीं हैं बल्कि यह एक सम्पूर्ण मानव के चरित्र की कहानी है जिसमें जीवन भर सत्य और धर्म की राह पर चलते समय आने वाली बाधाओं तथा उनके समाधान से जुड़े प्रसंग भी हैं.

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रामायण की कथा के अनुसार सीता को लेकर राम और रावण के मध्य हुआ युद्ध दस दिनों तक चला जिसमें दसवें दिन राम को विजय मिली जो दशहरा या विजयादशमी के दिन के रूप में जाना जाता हैं. युद्ध के दौरान राम जी को कई बार लगा कि रावण की शक्ति अधिक प्रभावशाली हैं.

अतः श्रीराम ने देवी दुर्गा की उपासना करनी शुरू की तथा उनसे शक्ति मांगी, महानवमी के दिन देवी दुर्गा सच्चे मन राम की भक्ति से प्रसन्न हुई और समस्त देवी देवता भगवान राम के साथ आए. इस तरह शक्ति के सहयोग से श्रीराम को युद्ध में विजय हासिल हुई और रावण समेत कुम्भकर्ण और मेघनाद जैसे महारथी मारे गये.

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दशहरा मनाने के पीछे एक और पौराणिक कथा बताई जाती हैं यह कहानी है भगवान ब्रह्मा और राक्षस महिषासुर की. इसके अनुसार महिषासुर ने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर लिया. इस पर ब्रह्माजी महिषासुर को वरदान देते है कि मेरे दिए हथियार से तेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

महिषासुर को अपार शक्ति मिलने के बाद उस पर राक्षस प्रवृत्ति हावी होने लगी और उसने देवताओं को युद्ध में बुरी तरह परा जित कर देवलोक पर अधिकार कर लिया. विष्णु के कहने पर समस्त देवताओं ने माँ भगवती की पूजा की और उनसे इस संकट में मदद करने का आव्हान किया.

देवताओं की प्रार्थना सफल हुई और भगवान शिव के ह्रदय से एक दिव्य चमक जन्मी जिसके बाद देवी भगवती सभी देवों के ह्रदय में विराजमान हुई और सिंह की सवारी करने वाली दुर्गा ने समस्त राक्षसों का नाश कर दिया और देवताओं को अपना राज्य दिलाया. इस तरह आज भी नवरात्र में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा अर्चना होती है तथा दसवें दिन दशहरा का पर्व मनाया जाता हैं.

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दशहरे की एक कहानी कौरवों एवं पांडवों से भी जुडी हुई हैं. बताया जाता है कि जुएँ में पांडवों द्वारा सब कुछ हार जाने के बाद जब वे 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष के लिए अज्ञातवास दिया जाता हैं तब उन्होंने अपने अंतिम वर्षों में हथियारों को सुरक्षित रखने के लिए एक शमी के वृक्ष की जड़ों में छिपा दिया और अपना रूप बदलकर विराट के शासक के यहाँ चले गये थे.

उसी दौरान दुर्योधन के विराट के राज्य पर धावा बोल दिया. तब पांडवों ने अपने हथियार निकालकर इस युद्ध में भी भाग लिया, बताते है कि यह महाभारत के कारणों में से एक था. इस प्रसंग का महाभारत के युद्ध से कोई लेना देना नहीं हैं मगर इससे जुडी एक और कहानी ब्राह्मण युवक कौत्सा की हैं.

उसने अपने गुरु ऋषि वारातन्तु को दक्षिणा लेने की प्रार्थना की तो ऋषि ने 14 सौ लाख सोने की सिक्कों की मांग कर डाली. इस पर कौत्सा दानवीर राजा रघु के पास जाता है मगर तब तक वे अपना राजकोष दान में दे चुके थे. रघु ने कुबेर देव से प्रार्थना की कुबेर ने धन की वर्षा की.

रघु ने उस समस्त धन को कौत्सा को दे दिया जिसे उसने अपने गुरु के चरणों में गुरुदाक्षिणा के रूप में रख दिया. गुरु ने अपनी कही गई मुद्राएं अपने पास रख दी तथा शेष युवक को लौटा दी. कौत्सा ने उस बचे धन को अयोध्या की प्रजा में बाँट दिया. इस तरह आज भी दशहरा के दिन अयोध्या में आपाति के पत्ते वितरित किये जाते हैं.

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