दहेज प्रथा पर निबंध | Essay On Dahej Pratha In Hindi

Essay On Dahej Pratha In Hindi भारतीय संस्कृति में मंगलमय भावनाओं की प्रधानता रही है. इन भावनाओं की अभिव्यक्ति संस्कारों के रूप में, शिष्टाचार के रूप में व अन्य कई रूपों में होती रही है. प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति में अन्नदान, विद्यादान, धन दान आदि को महत्व दिया गया है. इन दानो के अंतर्गत कन्यादान भी एक प्रमुख दान माना जाता था. माता-पिता अपने सामर्थ्य के अनुसार कन्या को आभूष्ण, वस्त्र व आवश्यक वस्तुएं देते थे, जिससे कन्या को गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते समय समुचित सहायता मिल जाती थी. उस समय माता पिता अपने सामर्थ्य के अनुसार दहेज देते थे.

दहेज प्रथा पर निबंध | Essay On Dahej Pratha In Hindi

दहेज प्रथा एक सामाजिक कलंक (Dowry is a social stigma)

प्रारम्भ में दहेज प्रथा के साथ जो मंगलमय भावना थी, उसका धीरे धीरे लोप होने लगा है. शुरू में दहेज स्वैछिक था, परन्तु कालान्तर में यह परमावश्यक हो गया, फलस्वरूप कन्या का जन्म ही अशुभ माना जाने लगा. कन्यादान माता पिता के लिए बोझ बन गया है.

धर्म के ठेकेदारों ने इसे धार्मिक मान्यता भी प्रदान कर दी है. धर्म भीरु भारतीय जनता के पास इसका कोई विकल्प शेष नही था. दहेज के इस विकृत रूप से बाल विवाह, अनमेल विवाह और बहुविवाह प्रथाओं का जन्म हुआ.

दहेज प्रथा की समस्या (Problem of Dahej Pratha)

बीसवी शताब्दी में मध्यकाल से वर्तमान काल तक दहेज प्रथा ने विकराल रूप धारण कर लिया है. और इसके फलस्वरूप नारी समाज के साथ अमानवीय व्यवहार होता है. कन्या का विवाह एक विकराल समस्या बन गई है. माता पिता अपने सामर्थ्य के अनुसार दहेज देना चाहते है. जबकि वर पक्ष वाले मुंहमांगा दहेज लेना चाहते है. वे लड़के के जन्म से लेकर शादी तक का पूरा खर्चा वसूलना चाहते है. माता पिता महंगाई के इस युग में पेट काटकर लडकियों को शिक्षित करते है, उन्हें योग्य बनाते है.

फिर दहेज के चक्कर में आजीवन कर्ज के भार से दब जाते है. कई बार मुह्मांगे दहेज की व्यवस्था नही होने पर दुल्हे सहित बरात लौट जाती है उस समय कन्या के माता पिता, रिश्तेदारों और उस कन्या की दशा क्या होती होगी.

दहेज प्रथा के दुष्परिणाम (Side effects of Dahej Pratha)

इस प्रथा के कारण कन्या व उसके माता पिता को अनेक असहनीय यातनाएं भोगनी पडती है. आज का युवा वर्ग मानवीय द्रष्टिकोण अपनाना चाहता है, परन्तु कुछ तो लालची अपने माता पिता का विरोध नही कर पाते है. और कुछ लोग शादी का रिश्ता तय करते समय सुधारवादी बनने का ढोंग रचते है, परन्तु शादी में इच्छित दहेज नही मिलने पर बहू को परेशान किया जाता है.

उसे अनेक यातनाएं दी जाती है. उसे कई बार मार दिया जाता है. इनमे बहु को जलाकर मार डालने का प्रतिशत अधिक होता है. रसोई घर में स्टोव से जलने की बात कह दी जाती है. ससुराल में जब जुल्मों की हद हो जाती है तो मुक्ति पाने के लिए वह आत्महत्या करने को विवश हो जाती है.

दहेज प्रथा को रोकने के उपाय (Measures to stop Dahej Pratha)

सन 1975 में दहेज उन्मूलन कानून भी बनाया गया. कानून के अनुसार दहेज लेना व देना कानूनी अपराध है. सरकार ने दहेज विरोधी कानून को प्रभावी बनाने के लिए एक संसदीय समिति का गठन किया है. सन 1983 में दहेज से सम्बन्धित नए कानून प्रस्तावित किये गये, इसके अनुसार जो दहेज के लालच में युवती को आत्महत्या के लिए विवश करे, उस व्यक्ति को दंडित किया जाए.

सरकार ने इस प्रथा के उन्मूलन के लिए सचेष्ट है. तथा कुछ सामाजिक संगठन भी इस समस्या के उन्मूलन का प्रयास कर रहे है. इस समस्या के कारण नारी समाज पर अत्याचार हो रहे है. नवयुवतियों के अरमानों को रौदा जा रहा है. अतः भारत के भावी नागरिकों को इस विषय पर आगे आकर दहेज प्रथा को रोकने के लिए इनोवेटिव उपाय करने होंगे.

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वर्तमान स्थिति- प्राचीन समय में दहेज नव दम्पति को नवजीवन प्रारम्भ करने के उपकरण देने का और सद्भावना का चिह्न था. राजा महाराजा और धनवान लोग धूमधाम से दहेज देते थे. परन्तु सामान्य गृहस्थी का काम तो दो चार बर्तन या गौदान से ही चल जाता था.

आज दहेज अपने निकृष्टतम रूप को प्राप्त कर चूका हैं. काले धन से सम्पन्न समाज का धनी वर्ग, अपनी लाड़ली के विवाह में धन का जो अपव्यय और प्रदर्शन करता हैं. वह औरों के लिए होड़ का कारण बनता हैं. अपने परिवार का भविष्य दांव पर लगाकर समाज के सामान्य व्यक्ति भी इस मूर्खतापूर्ण होड़ में सम्मिलित हो जाते हैं. इसी धन प्रदर्शन के कारण वर पक्ष भी कन्या पक्ष के पूरे शोषण पर उतारु रहता हैं.

कन्या पक्ष की हीनता- प्राचीनकाल में को वर चुनने की स्वतंत्रता थी किन्तु जबसे माता पिता ने उसको गले से बाँधने का कार्य अपने हाथों में लिया, तब से कन्या अकारण ही हीनता की पात्र बन गई हैं. आज तो स्थिति यह है कि बेटी वालो को बेटे की उचीत अनुचित मांगे माननी पड़ती हैं.

इस भावना का अनुचित लाभ वर पक्ष पूरा पूरा उठाता हैं. घर में चाहे साइकिल भी न हो परन्तु वह स्कूटर पाए बिना तोरण स्पर्श न करेगे. बेटी का बाप होना मानों पुनर्जन्म और वर्तमान का भीषण पाप हो.

कुपरिणाम- दहेज के दानव ने भारतीय संस्कृति की मनोवृति को इस हद तक दूषित किया हैं कि एक साधारण परिवार की कन्या और कन्या के पिता का जीना कठिन हो गया हैं. इस प्रथा की बलिवेदी न जाने कितने कन्या कुसुम बलिदान हो चुके हैं. लाखों परिवारों के जीवन की शांति को नष्ट करने का अपराध इस प्रथा ने किया हैं.

मुक्ति के उपाय- इस कुरीति से मुक्ति का उपाय क्या हैं. इसके दो पक्ष है जनता और शासन. शासन कानून बनाकर इसे समाप्त कर सकता हैं और कर भी रहा हैं. किन्तु बिना जन सहयोग के ये कानून फलदायी नही हो सकते. इसलिए महिला वर्ग को और कन्याओं को स्वयं संघर्षशील बनना होगा, स्वावलंबी बनना होगा. ऐसे वरों का तिरस्कार करना होगा, जो उन्हें केवल धन प्राप्ति का माध्यम समझते हैं.

उपसंहार- हमारी सरकार ने दहेज विरोधी कानून बनाकर इस कुरीति के उन्मूलन की चेष्टा की हैं. लेकिन वर्तमान दहेज कानून में अनेक कमियां हैं. इसे कठोर से कठोर बनाया जाना चाहिए. परन्तु सामाजिक चेतना के बिना केवल कानून के बल पर इस समस्या से छुटकारा नही पाया जा सकता.

आशा करता हूँ फ्रेड्स आपकों दहेज प्रथा पर निबंध में दी गई जानकारी समझ में आई, एवं अच्छी लगी होगी. यदि आपकों हमारे द्वारा ऊपर लिखा गया Essay On Dahej Pratha In Hindi का यह आर्टिकल पसंद आया हो तो प्लीज इसे अपने फ्रेड्स के साथ शेयर करे, आपका कोई सवाल या सुझाव हो तो कमेंट कर जरुर बताएं.

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