Essay on Bal Gangadhar Tilak in Hindi | बाल गंगाधर तिलक पर निबंध

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Essay on Bal Gangadhar Tilak in Hindi बाल गंगाधर तिलक पर निबंध

Essay on Bal Gangadhar Tilak in Hindi | बाल गंगाधर तिलक पर निबंध

बाल गंगाधर तिलक का जन्म महाराष्ट्र के रत्नगिरि जिले में 23 जुलाई 1856 को हुआ था. स्वतंत्रता प्राप्ति के अभियान में भारतीय में भारतीय राजनीति के सबसे जोशीले नेता थे. उनके इसी गुण के कारण उन्हें लोकमान्य की उपाधि से विभूषित किया गया, दक्कन कॉलेज से स्नातक डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन पूना के न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना शुरू किया.

Bal Gangadhar Tilak Essay in Hindi

जनसमुदाय को शिक्षा के माध्यम से जागृत करने के लिए पत्रिका मराठा का अंग्रेजी में तथा केसरी का मराठी में प्रकाशन किया, 1981 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सम्मिलित होने के बाद उन्होंने इसके वार्षिक अधिवेशन में आर्मी एक्ट रिसोल्यूशन को परिवर्तन करने पर बल दिया ताकि आर्मी में भारतीयों को भर्ती करने व बंदूक करने की मनाही पर से प्रतिबंध हटाया जा सके.

वे समाज सुधार की अपेक्षा राजनैतिक जनाधार को बढ़ावा देने में काफी सक्रियतापूर्वक भाग लेते रहे. ब्रिटिश सरकार की नीति फूट डालो व राज करो जिसके चलते हिन्दू व मुसलमान में वैमनस्यता बढ़ती गई, का उन्होंने काफी जोर शोर से प्रतिरोध किया. वह सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से भारतीयों को आधुनिकता के साथ ढालते हुए राष्ट्र के प्रति समर्पित होने हेतु प्रेरित करते रहे.

उन्होंने भारतीयों की चेतना को गौरवपूर्ण रूप में ढालने के लिए गणपति पूजा त्यौहार को विशेष रूप से मनाने का आग्रह किया, तिलक को 1897 में 18 महीने के लिए तथा पुनः 1908 में 6 वर्ष के लिए जेल में भेज दिया गया था. इस दौरान उन्होंने पूरा ध्यान भगवद्गीता पर टीका स्वरूप अपने चिन्तन व विचारों को लिखने में लगाया तथा विश्व चर्चित पुस्तक गीता रहस्य उन्होंने मांडले जेल में रहने के दौरान लिखी.

भारत की समस्याओं से निपटने के लिए उन्होंने होमरूल लीग की स्थापना 1916 में की. उसी वर्ष उन्होंने लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस व मुस्लिम लीग के बिच समझौता कराने में प्रमुख भूमिका निभाई. बाल गंगाधर तिलक गांधीजी के असहयोग आंदोलन के प्रबल समर्थक थे, 1919 के कांग्रेस अधिवेशन में तिलक का प्रयास यह रहा कि सुधार कानून के प्रस्ताव  को   ब्रिटिश   शासन द्वारा उचित उत्तरदायित्व के साथ करवाया जा सके.

बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय व विपिनचंद्र पाल के सम्पर्क में आने के बाद इन तीनो व्यक्तियों ने मिलकर बाल, पाल, लाल नामक समूह बनाकर संयुक्त रूप में स्वाधीनता संग्राम को एक नई दिशा दी, उनके इन संयुक्त स्वर से स्वदेशी आंदोलन, राष्ट्रीय शिक्षा और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार आदि कार्यों से ब्रिटिश सरकार बैचेन हो गई. तिलक का प्रसिद्ध नारा था स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार हैं.

तिलक के स्वराज का यह अभिप्राय था. लोगों का यह दैवी अधिकार है कि बुरे प्रशासक को दूर भगा दिया जाए या हटा दिया जाए, स्वराज का यह भी अर्थ था कि प्रजा व शासक को एक देश, एक जाति व धर्म का होना चाहिए. आगे वे कहते हैं. कि स्वराज के अंतर्गत एक ऐसी सुव्यवस्थित शासन व्यवस्था का प्रबंधन होता हैं जिसमें आम लोगों के कल्याण को सबसे अधिक महत्व दिया जाता हो. स्वराज सिर्फ राजनैतिक अधिकार को ही नहीं ग्रहण किये रहता बल्कि इसका आध्यात्मिक व भावनात्मक महत्व भी हैं.

तिलक के राष्ट्रवाद के सिद्धांत में भारत के गौरवमयी अतीत के साथ साथ पश्चिम के कला व विज्ञान को जोड़ना था. राष्ट्रवाद की गरिमा को बरकरार रखने के लिए उन्होंने राजनैतिक आंदोलन को प्रबल रूप में महत्व देते हुए कहा कि लोगों एकता के सूत्र में बांधकर ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सभी अत्याचारपूर्ण बंधन को तोडा जा सकता हैं.

तथा उनको देश से बाहर भगाया जा सकता हैं. आगे वे कहते हैं राष्ट्रवाद के इस सिद्धांत में वेदान्त के आदर्शों की आध्यात्मिक शक्ति तथा पश्चिम विचारकों व विद्वानों के राष्ट्रवाद की व्याख्या को सामजस्य कर पूरे राष्ट्र को एक धरातल पर लाना हैं.

बाल गंगाधर तिलक पर निबंध (bal gangadhar tilak essay in hindi)

भारत में उग्र राष्ट्रवाद का जन्म तिलक के नेतृत्व में हुआ. उन्हें ही उग्र राष्ट्रवादियों का जन्मदाता कहा जाता हैं. इनकी निस्वार्थ, देश भक्ति, अदम्य साहस, स्वतंत्र और सबल राष्ट्रीय प्रवृति और इन सबके ऊपर अपने देश और देशवासियों की एकनिष्ठ सेवा के कारण उन्हें स्वतंत्र भारत के निर्माताओं में बहुत अधिक उच्च स्थान प्राप्त हैं.

डॉ आर सी मजूमदार लिखते है अपने देश प्रेम और अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप बालगंगाधर तिलक लोकमान्य कहलाये जाने लगे और उनकी एक देवता के समान पूजा होने लगी. जहाँ भी कहीं जाते थे, उनका राजकीय सम्मान तथा स्वागत किया गया था.

राष्ट्रीय आंदोलन में तिलक का योगदान

राष्ट्रीय आंदोलन में तिलक का योगदान महान और सराहनीय था. अपने अग्र कार्यों द्वारा राष्ट्रीय जागृति में योग दिया था.

राष्ट्रीय आंदोलन में पत्रकारिता के माध्यम से प्रवेश– तिलक ने अपने मित्र आगरकर से मिलकर दो साप्ताहिक पत्र मराठी भाषा में केसरी और अंग्रेजी भाषा में मराठा प्रकाशित किये. इन पत्रों के प्रकाशन के साथ ही उनका सार्वजनिक प्रारम्भ होता हैं. इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने लगभग 40 वर्ष देश में राष्ट्रीय भावनाओं का प्रसार किया.

कांग्रेस में प्रवेश– लोकमान्य तिलक ने 1889 ई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में प्रवेश किया और अपने क्रांतिकारी विचार कांग्रेस सदस्यों के सम्मुख रखे. उस समय कांग्रेस पर उदारवादियों का नियंत्रण था. उन्होंने उदार दल वालों की भिक्षावृति से असंतोष प्रकट किया और कहा कि सरकार केवल शक्ति के आधार पर ही भारतीयों की मांगें मान सकती हैं. धीरे धीरे तिलक के अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी और ये लोग उग्रवादी कहलाने लगे. इस प्रकार उन्होंने कांग्रेस के स्वरूप का स्थान्तरण किया.

तिलक के सामाजिक धार्मिक जागरण आंदोलन– तिलक ने नवयुवकों को साहस, उत्साह और देशप्रेम की शिक्षा देने के लिए गणपूर्ति उत्सव संगठित किया. 1895 ई में तिलक ने शिवाजी उत्सव मनाना शुरू किया. आपका उद्देश्य भारत के नवयुवकों को शिवाजी के पदचिह्नों पर चलने के लिए प्रेरित करना था. जिससे भारत की राजनीतिक दासता का अंत किया जा सके.

1897 ई की कारावास यात्रा– 1897 ई में तिलक को राजद्रोह के अपराध में गिरफ्तार किया गया और उन्हें 18 मास का कठोर कारावास किया गया. सम्पूर्ण देश में ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति का विरोध किया गया.

1908 ई का कारावास-तिलक अपनी उग्रवादिता के कारण ब्रिटिश शासन के सबसे बड़े शत्रु बन गये. अतः 1908 ई में केसरी में प्रकाशित उनके कुछ लेखों के आधार पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें बंदी बना लिया गया न्यायधीशों ने तथा 9 में से 7 जूरियों उन्हें अपराधी ठहराकर 6 वर्ष का कारावास तथा 1000 रू जुर्माने का दंड दिया. तिलकजी ने बर्मा के मांडले जेल में भेज दिया गया. जेल में रहते हुए तिलक ने अपनी दो प्रसिद्ध पुस्तकों गीता रहस्य तथा आर्कटिक होम इन दि वेदाज की रचना की.

होमरूल आंदोलन– मांडले जेल से लौटने पर उन्होंने भारतीय जनता को चेतना प्रदान करने के लिए श्रीमती एनीबेसेंट के साथ मिलकर होमरूल आंदोलन में भाग लिया. तिलक ने नारा लगाया स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार हैं और मैं इसे लेकर रहूगा. इस सम्बन्ध में तिलक का विचार यह था कि प्रगति स्वराज्य में ही निहित हैं. यदि हम स्वराज्य प्राप्त नहीं कर सकते  किसी भी राष्ट्र के लिए उपयोगी शिक्षा व्यवस्था की कोई सम्भावना नहीं हैं.

तिलक का व्यक्तित्व तथा दृष्टिकोण– तिलक देशप्रेम की ज्योति जगाने वाले प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने स्वराज्य की प्राप्ति को अपना जन्मसिद्ध अधिकार घोषित किया. उन्होंने अपने विचारों और कार्यों के लिए समकालीन राजनीतिज्ञों में सबसे अधिक कष्ट सहे. उनमें संगठन की अपूर्व क्षमता थी और वे ब्रिटिश सरकार के लिए साक्षात संकट थे.

उच्च कोटि के विद्वान्– तिलक स्वतंत्रता संग्राम के सेनापति और राजनीतिज्ञ ही नहीं वरन उच्च कोटि के विद्वान् भी थे. 1908 से 1914 तक के 6 वर्षीय कारावास में उन्होंने गीता रहस्य तथा दि आर्कटिक होम इन दि वेदाज नामक दो ग्रंथों की रचना की. इसी प्रकार उन्होंने दि ओरियन नामक अन्वेषणात्मक ग्रंथ की रचना की.

दूरदर्शी राजनीतिज्ञ- लोकमान्य तिलक अत्यंत उच्च कोटि के दूरदर्शी राजनीतिज्ञ थे. वे युगद्रष्टा थे. वास्तव मे तिलक महात्मा गांधी के पूर्ववर्ती थे. गांधीजी तथा अन्य राष्ट्रवादी नेताओं ने तिलक के विचारों और सिद्धांतों पर आचरण कर उनके द्वारा छोड़े हुए अधूरे कार्यों को पूरा किया.

श्री रामगोपाल के अनुसार महात्मा गांधी ने तिलक की मृत्यु के बाद जितने आंदोलन किये वे सब तिलक ने पहले ही कर दिए थे. लगान न देने का आंदोलन, सरकारी नौकरियों का बहिष्कार, शराबबंदी और स्वदेशी इन सबका तिलक ने प्रचार किया था. उनका जीवन दिव्य था और उनके देशवासियों ने उन्हें न केवल लोकमान्य की उपाधि दी वरन उन्हें तिलक भगवान कहकर भी पुकारा. वे चारो ओर के अँधेरे में प्रकाश की ज्योति की तरह सामने आए.

अद्वितीय विचारक भारत में असंतोष के जनक– लोकमान्य तिलक भारतीय राजनीतिक एवं सामाजिक चिंतन के अद्वितीय विचारक थे. शिरोल ने उन्हें भारत में असंतोष के जनक के रूप में सम्बोधित करके भारतीयों की सेवा ही की थी. तिलक ने न केवल भारतीयों को शासन के रवैये के प्रति असंतुष्ट बनाया बल्कि उन्हें अपने आपके विकास के प्रति भी असंतुष्ट होकर नहीं बैठने दिया. तिलक ने उन्हें नया जीवन नई प्रेरणाएं दी. तिलक ने न केवल राजनीति सिखाई, न केवल धर्म का उपदेश दिया बल्कि देश के लिए सहर्ष यातनाएं सहन करने का मार्ग भी दिखाया.

स्वराज्य और एकता की अलख– तिलक ने स्वराज्य की मान्यता को सैद्धांतिक शब्दावली से लाकर भारतीय होठों पर ला बिठाया. तिलक स्वराज्य के संदेश वाहक ही नहीं थे, उन्होंने इसे एक संकल्प एक अवधारणा के रूप में लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया था.स्वराज्य स्वदेशी स्वधर्म, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के पंचकोणात्मक कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संचालित करके तिलक ने विदेशी शासन की नीव हिला दी.

सामुदायिक एकता के हामी और भारतीय राष्ट्रवाद के जनक– तिलक के राष्ट्रवाद की एक अन्य विशेषता उनकी सब समुदायों में एकता हैं. तिलक का राष्ट्रवाद राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा देता हैं. किसी संकीर्ण वर्गीय साम्प्रदायिक या धार्मिक भावना की प्रेरणा नहीं देता. उनका स्वराज्य किसी विशेष वर्ग या जाति के लिए नहीं था. वह भारत में रहने वाले सभी निवासियों के लिए था.

तिलक का कथन था मैं जिस स्वराज्य की मांग कर रहा हूँ, वह केवल हिन्दुओं के लिए, मुसलमानों के लिए अथवा किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं होगा. वह समस्त भारतीय जनता के लिए होगा.

आंदोलनों की राजनीति के जनक– तिलक ने भारतीय राजनीति में नये साधनों का प्रयोग किया. स्वराज्य प्राप्ति के लिए तिलक ने आंदोलन, लगातार आंदोलन और जनमत एवं जनशक्ति पर आधारित आंदोलन के साधनों का प्रयोग किया. प्रमुख अस्त्र स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा, धरना, पंचायती अदालतें ये सभी राजनीतिक अस्त्र थे. ये ऐसे सांविधानिक अस्त्र थे, जिनमें हिंसा का कोई स्थान नहीं था.

मूल्यांकन– लोकमान्य तिलक ने राष्ट्रीय आंदोलन में भारतीय जनता को अवज्ञा का दर्शन प्रदान किया. इस दृष्टि से उन्हें भारतीय जागृति का अग्रदूत कहा जा सकता हैं.

वस्तुतः भारत के किसी व्यक्ति ने अपने देश के लिए इतने कष्ट नहीं सहे. किसी ने कुर्बानियों और कष्टों को इतने शांत भाव से और रोज की मामूली चीज समझते हुए ग्रहण नहीं किया, जितना तिलक ने.

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