नाई पर निबंध | Essay on Barber in Hindi

Essay on Barber in Hindi: नमस्कार दोस्तों आज हम नाई पर निबंध लेकर आए हैं. हिन्दू धार्मिक संस्कारों में इनका अहम कार्य हैं. भारत में बाल काटने एवं संवारने का कार्य नाई जाति के लोगों द्वारा ही किया जाता हैं. आज के निबंध, भाषण, स्पीच, अनुच्छेद, लेख में हम नाई जाति इसके कार्य, इतिहास, उत्पत्ति व व्यवसाय के बारें में विस्तार से यहाँ जानेंगे.

Essay on Barber in Hindi

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वर्ण व्यवस्था आधारित भारतीय समाज में जिस तरह लौहार, सुनार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, बढ़ई के अपने परम्परागत काम थे उसी तरह नाई जाति के लोगों का काम काम काटने एवं सेव करने का था, ये आम दिनों, विवाह मृत्यु त्यौहार आदि अवसरों पर अपने जजमानों के घर जाकर बाल काटने का काम किया करते थे, आज यह व्यवस्था ढीली हो चुकी हैं. नाई अपनी दुकान लगा बैठे है जहाँ आने वाले ग्राहकों की बाल दाड़ी करते हैं. इस व्यवसाय में अब अन्य जातियों से सम्बन्धित लोग भी प्रशिक्षित होकर आने लगे है इस तरह प्राचीन व परम्परागत व्यवसाय जातियों के बंधन से मुक्त होकर सभी के लिए खुल चुके हैं.

नाई जाति उत्पत्ति – ऐसा माना जाता है कि न्यायी शब्द से नाई बना है इसकी उत्पत्ति संस्कृति की नाय धातु से हुई है जिसका आशय है जो न्याय करे अथवा नेतृत्व प्रदान करे. इस तरह प्राचीन समय में नाई एक क्षत्रिय जाति थी. महापद्म नन्द को इस जाति का महान शासक माना जाता है जिसने मगध समेत 16 महाजनपदों पर अपना सम्राज्य स्थापित किया था. नंद वंश का अंतिम सम्राट घनानन्द था जिसके शासन को चन्द्रगुप्त ने समाप्त किया था. (जानकारी अप्रमाणित है इंटरनेट से ली गई है.)

प्रस्तावना– एक व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक नाई की आवश्यकता पड़ती हैं. नाई हमारे समाज का महत्वपूर्ण सदस्य होता हैं. प्राचीन कहावतों में माना गया है इंसानों में सबसे चालाक नाई होता हैं कुछ भोले एवं सरल स्वभाव के भी होते है जो दिन रात सेवा कर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं. कैंची, कंघी, ब्रश, रेजर के सहारे वह अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर देता है ये साधन उन्हें जीवन भर आजीविका कमाने में सहायता देते हैं.

कार्य करने का ढंग– बदलते दौर में नाई ने स्वयं तथा अपने कामकाज के तरीके को भी बदला हैं. एक जमाने में वह घर घर जाकर बाल दाड़ी करता था, मगर आज उसने अपनी दूकान तक स्वयं को सिमित कर दिया था. एक मलिन कपड़ा, पुरानी ब्लेड आदि से वह दाड़ी करता था, मगर आज नई टेक को अपनाकर शीशेयुक्त आरामदायक सीट पर ग्राहक को बिठाकर, ठंडे जल के स्प्रे से कर पूर्ण सहानुभूति से व्यवहार करता हैं. इससे ग्राहक भी प्रसन्न रहता है तथा नाई का धंधा भी बढ़ता हैं.

नाई पर निर्भरता- सभी मनुष्य समाज के लिए समर्पित भाव से अपने दायित्वों का निर्वहन करते है उसी तरह नाई भी एक सेवक की भूमिका में नित्य लोगों के बाल काटता हैं. गाँव के सभी पुरुष बच्चें उस पर निर्भर रहते हैं, कई बार उन्हें घंटों तक बाल कटवाने या दाड़ी करवाने का इन्तजार करना पड़ता हैं. पहले के जमाने में नाई प्रत्येक घर से तय मात्रा में अनाज लेता था, मगर आज वह मूल्य के बदले काम करता हैं.

एक निर्धन व्यक्ति– आज भी गाँवों में घर घर जाकर बाल काटने वाले नाई गरीबी का जीवन जीते हैं. वही बड़े शहर में सैलून की दूकान लगाने वाला नाई रोजाना कई हजार की कमाई करता हैं. शहरों में सेव बाल की कीमते अत्यधिक है जबकि गाँवों में आज भी छोटी कीमत पर ही यह कार्य करते हैं. गाँवों में रहने वाले नाई समाज के धार्मिक एवं अन्य कार्यक्रमों में अपनी भूमिका का आज भी निर्वहन करते हैं. प्रत्येक व्यक्ति को नाई तथा उनके व्यवसाय को पूर्ण सम्मान देना चाहिए तथा इस प्रथा को लम्बे समय तक जीवित रखना होगा.

राजा महाराजाओं के दौर में नाई केवल राजपरिवार के बाल काटते थे. नित्य सवेरे वह राजा के बाल काटने, दाड़ी करने तथा बाल सवारने का काम करते थे, नाई राजा के पसंद की आकर्षक मूंछे रखते थे जिसके प्रति प्राचीन समय के लोगों का गहरा भावनात्मक सम्बन्ध था.

मूंछे उस समय के लोगों के व्यक्तित्व की परिचायक थी. अधिक मूंछ रखने वाले को शक्तिशाली माना जाता था, मूंछ को व्यक्ति की आन बान और शान का प्रतीक माना जाता था. दुनियां भर में आज जितनी भी आकर्षक दाड़ी, मूंछ और बाल की डिजाइन देखने को मिलती है उसमें नाई का ही प्रभाव हैं.

वर्तमान में सलून तथा ब्यूटी पार्लर के क्षेत्र इतने विस्तृत हो चुके है जहाँ काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की आजीविका आसानी से चल सकती हैं. अब तो पश्चिम की देखादेखी महिलाएं भी कम बाल रखने लगी है अब पुराने समय से अधिक नाईयों की मांग बढ़ी है.

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