हल्दीघाटी युद्ध पर निबंध | Essay On Battle Of Haldighati In Hindi

हल्दीघाटी युद्ध पर निबंध | Essay On Battle Of Haldighati In Hindi: हल्दीघाटी युद्ध(details of haldighati war) – राजस्थान के राजसमन्द जिले में नाथद्वारा से लगभग 11 किलोमीटर पश्चिम में मेवाड़ में इतिहास प्रसिद्ध रणस्थली हल्दीघाटी स्थित हैं. हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ई को मेवाड़ के महाराणा प्रताप एवं मुगल बादशाह अकबर के सेनापति मानसिंह के मध्य हुआ था. Battle Of Haldighati Essay.

हल्दीघाटी युद्ध पर निबंध Essay On Battle Of Haldighati In Hindi

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हल्दीघाटी युद्ध का उद्देश्य (maharana pratap haldighati story)– 1570 ई में मुगल बादशाह अकबर ने नागौर में दरबार लगाया जिसमें मेवाड़ के अतिरिक्त अधिकांश राजपूत शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली. वहीं मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने हेतु भेजे गये 4 दलों के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया.

इससे अकबर नाराज हो गया. उसे महाराणा प्रताप को युद्ध में बंदी बनाने की योजना बनाई. अकबर महाराणा प्रताप को जीवित पकड़कर मुगल दरबार में खड़ा करना अथवा मार देना चाहता था. तथा उनके सम्पूर्ण राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लेना चाहता था. अपने इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु मुगल बादशाह अकबर ने हल्दीघाटी युद्ध हेतु मानसिंह को मुख्य सेनापति बनाया और उसके सहयोग हेतु आसिफ खान को नियुक्त किया.

दोनों सेनाओं का युद्ध स्थल पर पहुचना (who is akbar in maharana pratap)– मुगल सेनापति मानसिंह 3 अप्रैल 1576 ई को मुगल सेना लेकर अजमेर से रवाना हुआ. उसने पहला पड़ाव मांडलगढ़ में डाला जहाँ पर वह दो माह तक रहा. इसके पश्चात उसने नाथद्वारा के पास खमनौर के मोलेला गाँव के समीप अपना पड़ाव डाला. मुगल सेना के आगमन की सूचना महाराणा प्रताप को मिल गई थी.

महाराणा प्रताप भी अपने सरदारों व सेना के साथ गोगुन्दा व खमनौर की पहाड़ियों के मध्य स्थित हल्दीघाटी में पहुच गये. 18 जून 1576 ई को प्रातःकाल रणभेरी गूंज उठी. दोनों सेनाएं आमने सामने हुई. यही हल्दीघाटी का युद्ध कहा जाता हैं. कर्नल जेम्स टॉड ने इसको मेवाड़ का थर्मोपल्ली, अबुल फजल ने खमनौर का युद्ध और बदायूनी ने गोगुन्दा का युद्ध कहा हैं. यह युद्ध हल्दीघाटी के दर्रे के मुहाने से लेकर खमनौर गाँव के मध्यवर्ती क्षेत्र में लड़ा गया.

महाराणा की विजय (maharana pratap’s history)– महाराणा प्रताप की सेना प्रतिशोध की ज्वाला से शत्रु मुगल सेना पर बिजली की तरह टूट पड़ी, मेवाड़ी सेना के इस भीषण प्रहार को मुगल सेना झेल न सकी और उसकी अग्रिम पंक्ति ध्वस्त हो गई. मेवाड़ी सरदारों ने मुगल सेना प्राण रक्षा के लिए लगभग 10-12 मील तक पीछे मुड़कर भागती हुई और बनास नदी के तट पर जाकर रुकी. इस प्रथम चरण युद्ध में महाराणा प्रताप के सेनापति हकीम खान सूर का नेतृत्व सफल रहा.

मानसिंह पर आक्रमण (maharana pratap war with marwar) – दूसरे चरण में युद्ध से भागे हुए सैनिकों को जोश दिलाने के लिए मुगलों की आरक्षित फौज के प्रभारी मिहतर खान ने यह झूठी अपवाह फैला दी कि बाद्शाह अकबर स्वयं शाही सेना लेकर आ रहे हैं. अकबर के आने की बात सुनकर मुगल सेना की हिम्मत बंधी और वे पुनः युद्ध के लिए तत्पर होकर आगे बढ़ी, महाराणा प्रताप के नेतृत्व में राजपूत भी प्रथम चरण में युद्ध में सफल होने के पश्चात बनास नदी के किनारे वाले मैदान में आ गये.

इस युद्ध में महाराणा प्रताप की ओर से पुणा व रामप्रसाद हाथी तथा मुगलों की ओर से गजमुक्ता व गजराज के मध्य युद्ध हुआ. महाराणा प्रताप की नजर मुगल सेना के सेनापति मानसिंह पर पड़ी. मुगल सेनापति मानसिंह मरदाना नामक हाथी पर बैठा हुआ था. महाराणा प्रताप के स्वामिभक्त घोड़े चेतक ने अपने पैर हाथी के सिर पर टिका दिए. महाराणा प्रताप ने अपने भाले का भरपूर प्रहार मानसिंह पर किया परन्तु मानसिंह हौदे के पीछे छिप गया और उसके पीछे बैठा अंगरक्षक मारा गया व हौदे की छतरी का एक खम्भा टूट गया. इसी समय हाथी की सूंड में बंधे हुए जहरीले खंजर से चेतक की टांग कट गई और वह मारा गया.

युद्ध का परिणाम (results of haldighati war)– राजस्थानी स्रोत, राजप्रशस्ति, राज विलास स्पष्ट रूप से महाराणा प्रताप की विजय का उल्लेख करते हैं. वहीं फ़ारसी इतिहासकार मुगलों की विजय का उल्लेख करते हैं. वास्तविकता यह हैं कि मुगल बादशाह अकबर मेवाड़ पर अधिकार करना चाहता था. उसकी यह अभिलाषा कभी पूर्ण नहीं हुई और उसने युद्ध इसलिए किया था कि वह महाराणा प्रताप को जिन्दा या मुर्दा अपने दरबार में देखना चाहता था.

उसकी यह अभिलाषा पूर्ण नहीं हुई. हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात भयभीत, आतंकित एवं रसद के अभाव में मुगल सेना की बड़ी दुर्दशा हो रही थी. ऐसी स्थिति में महराणा प्रताप के छापामार दस्ते, मुगल सेना पर धावा बोलने लगे, अन्तः यह मुगल सेना भीलों की लुकती छिपती, लड़ती भिड़ती अजमेर पहुची.

हल्दीघाटी के युद्ध का महत्व– हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप का पलड़ा भारी रहा. यह युद्ध अकबर की साम्राज्यवादी नीति के विरुद्ध महाराणा प्रताप का प्रादेशिक स्वतंत्रता का संघर्ष था. महाराणा प्रताप ने न तो अकबर को कोई चुनौती दी और न ही उस पर कोई आक्रमण किया था. बल्कि अकबर ने उन पर अपनी सर्वोच्चता आरोपित करने के लिए युद्ध छेड़ा.

ऐसी स्थिति में महाराणा प्रताप द्वारा अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ना अनिवार्य हो गया था. इस युद्ध से महाराणा प्रताप की कीर्ति उज्ज्वल हो गई तथा हल्दीघाटी का क्षेत्र स्वतंत्रता प्रेमियों के लिए एक पवित्र तीर्थ बन गया.

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